‘बस 2 मिनट’ पर एक बड़ा-सा बवाल

Published at :08 Jun 2015 5:19 AM (IST)
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‘बस 2 मिनट’ पर एक बड़ा-सा बवाल

प्रियंका स्वतंत्र टिप्पणीकार मेरी पहली मैगी बड़ी ही बेस्वाद थी. आज भी याद है, मां ने मैगी दूध में डाल कर बनायी थी. उन दिनों टीवी पर मैगी का एक विज्ञापन बहुत चर्चित था. जिसमें बच्चे स्कूल की छुट्टी होते ही भाग कर घर आते हैं और टेबल पर प्लेटें और चमच पीटते हुए मैगी-मैगी […]

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प्रियंका

स्वतंत्र टिप्पणीकार

मेरी पहली मैगी बड़ी ही बेस्वाद थी. आज भी याद है, मां ने मैगी दूध में डाल कर बनायी थी. उन दिनों टीवी पर मैगी का एक विज्ञापन बहुत चर्चित था. जिसमें बच्चे स्कूल की छुट्टी होते ही भाग कर घर आते हैं और टेबल पर प्लेटें और चमच पीटते हुए मैगी-मैगी गाते हैं और उनकी मां ‘बस 2 मिनट’ कह कर रसोई से मैगी लाकर देती है. स्कूली दिनों में यह 2 मिनट का जादू सर चढ़ के बोला था.

इस 2 मिनट की खुशियों की दास्तां 1947 से भी पुरानी है. मैगी भारत में तब आयी, जब नूडल्स भारत में पॉपुलर नहीं थे. मैगी को भारतीय अंदाज के साथ भारतीय संवेदनाओं से जोड़ कर पेश किया गया, जिससे मैगी ने जल्द ही हर घर में जगह बना ली. अब भारतीय बाजार में फास्टफूड में मैगी की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत है. मैगी नेस्ले का प्रोडक्ट है. भारत में नेस्ले के मुनाफे में मैगी 30 प्रतिशत हिस्सेदार है. मैगी के 90 प्रतिशत उत्पाद भारत को केंद्र में रख कर बनते हैं, लेकिन अचानक पैदा हुए इस ‘2 मिनट पर बवाल’ पर सभी हैरान हैं.

मामला उत्तर प्रदेश के खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण से शुरू हुआ, जहां मैगी के 12 अलग-अलग सैंपल लेकर केंद्र सरकार की कोलकाता स्थित लैब में टेस्ट कराया गया. मैगी में तय मात्र से 7 गुना अधिक लेड (सीसा) की मात्र पाया गया. यह मामला इतना बढ़ गया कि उत्तर प्रदेश की सरकार को मुकदमा दर्ज कराना पड़ा, जिसके चलते मैगी पर देशभर में बैन लगा दिया गया है.

यह शायद ‘मेक इन इंडिया’ की शुरुआत है, वरना वर्षो से जो कंपनी सिर्फ मैगी जैसे ‘क्विक फूड’ की वजह से पूरी दुनिया की नंबर एक कंपनी बनी हुई थी वो अचानक ही इतनी बड़ी लापरवाही कैसे कर सकती है? मैगी नेस्ले के सबसे बड़े ब्रांड में से एक है. इसका सालाना ग्लोबल कारोबार एक अरब डॉलर से भी ज्यादा है. गौरतलब है कि कुछ ऐसे भी प्रोडक्ट हैं, जो पूरी दुनिया में बैन हैं, लेकिन भारत में नहीं और हम सभी उनका लगातार उपभोग करते जा रहें हैं.

महिलाओं के कॉस्मेटिक्स जैसे फेयरनेस क्रीम्स में 44 प्रतिशत मरकरी मिली, लिपिस्टिक में 50 प्रतिशत क्रोमियम मिला और मसकारे में 43 प्रतिशत निकिल मिला. सीएसइ स्टेटमेंट के अनुसार, अरोमा मैजिक फेयर लोशन में सबसे ज्यादा 1.97 पीपीएम मरकरी मिली. ओले नैचुरल व्हाइट में 1.97 पीपीएम मरकरी और पॉन्ड्स व्हाइट ब्यूटी में 1.36 पीपीएम मरकरी मिली. इसी कतार में कई और बड़े ब्रांड भी हैं, लेकिन इन पर किसी भी तरह की कोई कार्यवाही नहीं की गयी.

ब्रांडेड शहद, जिनमें डाबर, पतंजलि, हिमालया, बैद्यनाथ, खादी और कुछ बाहर के ब्रांड शामिल हैं, जिनमें हानिकारक एंटीबायोटिक पाये जाते हैं, इन्हें बाहर बैन किया गया है, लेकिन भारत में नहीं.

दरअसल, 2 मिनट बवाल का अचानक होना कई सवाल पैदा करता है, जो न सिर्फ ब्रांड, ब्रांड अंबेसडर, ग्लोबल कारोबार से जुड़ा हुआ है, बल्कि भारत के बाजार के लिए भी प्रश्नचिह्न् है. देखना यह है कि मैगी की जांच के बाद यदि सचमुच यह सेहत को नुकसान पहुंचानेवाला हुआ, तो अब हमें कोई और विकल्प ढूंढ़ना होगा.

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