दुख जिनको मांजता है

Published at :23 May 2015 5:43 AM (IST)
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दुख जिनको मांजता है

प्रियदर्शन वरिष्ठ पत्रकार वह दूसरों के घर बर्तन मांजती रही. सीढ़ियों को मेज-कुर्सी बना कर पढ़ती रही. लेकिन, उसकी गरीबी ने, उसके अभाव ने, उसे इस तरह मांजा कि वह बोर्ड परीक्षा में 85 फीसदी अंक ले आयी. यह बेंगलुरु की शालिनी की कहानी है. वारंगल के सुरेश की कहानी तो और भी मार्मिक है. […]

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प्रियदर्शन

वरिष्ठ पत्रकार

वह दूसरों के घर बर्तन मांजती रही. सीढ़ियों को मेज-कुर्सी बना कर पढ़ती रही. लेकिन, उसकी गरीबी ने, उसके अभाव ने, उसे इस तरह मांजा कि वह बोर्ड परीक्षा में 85 फीसदी अंक ले आयी. यह बेंगलुरु की शालिनी की कहानी है. वारंगल के सुरेश की कहानी तो और भी मार्मिक है.

खराब फसल और कर्ज के दबाव में पिता ने बीते साल खुदकुशी कर ली. बड़ी बहन स्वप्ना को कॉलेज छोड़ना पड़ा, बेटे का स्कूल छूट गया. एनडीटीवी ने यह कहानी दिखायी, तो सब मदद को खड़े हो गये. देखते-देखते 45 लाख रुपये जमा हो गये. समाज खड़ा हुआ तो यह परिवार भी खड़ा हो गया. सुरेश का स्कूल शुरू हो गया और अब उसने 10वीं में 87 फीसदी अंक हासिल किये हैं.

इन कहानियों का सबक क्या है? एक तो वह जो अ™ोय बता गये हैं- दुख मांजता है, गरीबी और अभाव इंसान को जितना तोड़ते हैं, उससे ज्यादा कई बार ताकत दे जाते हैं. दूसरी बात यह कि समाज साथ दे तो टूटे हुए लोग भी खड़े हो सकते हैं. वे हमारे साथ चल पड़ते हैं. लेकिन एक तीसरी बात भी है, जो ये कहानियां नहीं बताती हैं. लोगों की जिंदगी में इतने अभाव, इतनी गरीबी क्यों है? इस सवाल का हम सामना नहीं करते. इससे आंख मिलाने से बचते हैं.

हमारी खाती-पीती अघाई हुई दुनिया बस अपनी तसल्ली के लिए संघर्षो के बीच कामयाबी की कुछ कहानियां चुन लेती है- बताती है कि हालात कैसे भी हों, इंसान आगे बढ़ सकता है. लेकिन ऐसे हालात बनाता कौन है, जिसमें एक बच्ची सीढ़ियों पर पढ़ने को मजबूर होती है और दूसरी लड़की अपने पिता की खुदकुशी के बाद कॉलेज छोड़ देती है?

हम 21वीं सदी की महाशक्ति होने का दावा करते हैं. हम ऐसी आर्थिक ताकत बनने का सपना देखते हैं, जो अमेरिका और यूरोप के समकक्ष खड़ी हो सके, जो चीन को चुनौती दे सके. लेकिन ऐसी आर्थिक ताकत होने के लिए हमें ढेर सारे संसाधन चाहिए.

अमेरिका और यूरोप ने ये संसाधन लूट कर जुटाये हैं. चीन पर अपनी बड़ी आबादी की उपेक्षा करने का आरोप है. भारत क्या कर सकता है? भारत अपने भीतर के एक भारत को उपनिवेश बना सकता है.

हमने यही किया है. एक देश के भीतर दो हिंदुस्तान बना डाले हैं- एक चमकता-दमकता, खाता- पीता इंडिया है, जिसके लिए कुछ भी पहुंच से बाहर नहीं, और दूसरा, संकट और अभाव का मारा, पत्तों की तरह कांपता, खुदकुशी को मजबूर भारत है, जिसके हाथ अक्सर कुछ भी आता नहीं. इन दोनों हिंदुस्तानों के बीच कभी-कभी पुल भी बनते हैं- कुछ नयी चिंताओं के पुल, कुछ पुराने सरोकारों के पुल.

लेकिन ऐसे ज्यादातर पुल हम उनकी नहीं, अपनी मदद के लिए बनाते हैं. आम तौर पर हम उनकी ओर नहीं देखते, पर जब सुरेश और शालिनी जैसे नौजवानों की मिसाल आती है, तब हमारे भीतर कुछ दरकता है, कुछ उमड़ता है और हम उन्हें एक रोल मॉडल की तरह पेश करते हैं.

सुरेश और शालिनी जैसे लड़के-लड़कियां, संघर्ष के बीच कुंदन की तरह तपनेवाले ये सितारे, अपनी जिंदगी ही नहीं संवारते, हमारी अंतरात्मा का बोझ भी कुछ कम करते हैं; हमें शायद इस बात के लिए भी इनका शुक्रगुजार होना चाहिए.

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