फोटो है राजनीति की एक नयी भाषा

रवीश कुमार वरिष्ठ पत्रकार छत्तीसगढ़ के कलेक्टर को प्रधानमंत्री के सामने चश्मा पहनने पर नोटिस देने की खबर आते ही सोशल मीडिया पर उन तस्वीरों की तलाश शुरू हो गयी, जिनमें प्रधानमंत्री खुद चश्मा पहने हुए हैं. जमाने बाद प्रधानमंत्री चश्मे को ललाट के ऊपर सरका कर टिकाये नजर आये. एक और तस्वीर में वे […]
रवीश कुमार
वरिष्ठ पत्रकार
छत्तीसगढ़ के कलेक्टर को प्रधानमंत्री के सामने चश्मा पहनने पर नोटिस देने की खबर आते ही सोशल मीडिया पर उन तस्वीरों की तलाश शुरू हो गयी, जिनमें प्रधानमंत्री खुद चश्मा पहने हुए हैं.
जमाने बाद प्रधानमंत्री चश्मे को ललाट के ऊपर सरका कर टिकाये नजर आये. एक और तस्वीर में वे किसी राष्ट्र प्रमुख से मिलते वक्त चश्मे में हैं. इन तस्वीरों को पेश किया जा रहा था यह बताने के लिए खुद चश्मा पहनें तो ठीक, कलेक्टर पहने तो गुनाह. कहीं यह भी देखा कि जवाहर लाल नेहरू किसी योजना के निरीक्षण पर हैं. उनके साथ कलेक्टर बंद गला में नजर आ रहे हैं, पर काला चश्मा पहने हुए हैं. दिखाने का प्रयास किया गया कि इस मामले में नेहरू सहनशील हैं, मोदी असहनशील.
यह उदाहरण इसलिए नहीं दिया कि मुङो कलेक्टर के चश्मा पहनने पर कुछ कहना है, बल्कि इसलिए कि फोटो राजनीति की नयी भाषा के रूप में उभरने लगा है. किसी भी विवाद को सोशल मीडिया में दो तरीके से लड़ा जाने लगा है. एक टोली अगला-पिछला बयान और प्रमाण निकाल लाती है, तो दूसरी टोली विवाद के पक्ष-विपक्ष में तस्वीरें. एक-दूसरे को सही या गलत साबित करने के क्रम में असली-नकली तस्वीरें भी ठेल दी जाती हैं.
सियासी लड़ाई में फोटोशॉप तकनीक हथियार बन गया है. आपको सोशल मीडिया पर गांधी, नेहरू और मोदी की कई तस्वीरें मिलेंगी, जिनसे फोटोशॉप के जरिये छेड़छाड़ की गयी होती है.
फोटो के जरिये गांधी और नेहरू की छवि खराब करने का खूब अभियान चला, मानो ये नेता इतिहास की बारीकियों में नहीं, इन तस्वीरों में ही अच्छे-बुरे के तौर पर दर्ज हैं. अब आये दिन प्रधानमंत्री मोदी, राहुल गांधी और केजरीवाल को घेरने के लिए उनकी असली और बनावटी तस्वीरें पैदा की जाती हैं.
अब हर कोई फोटोग्राफर है. हमारे नेता भी. आप उनकी तस्वीर खीचेंगे, तो वे आपके साथ अपनी सेल्फी खींच लेंगे. वो इसलिए, क्योंकि फोटो सोशल मीडिया की सबसे बड़ी भाषा है.
फोटो के कारण सोशल मीडिया के लोगों का राजनीतिक व्यवहार बदल रहा है. वे नेता के साथ की तस्वीर लगाते हैं. इसलिए नेता भी रोचक तस्वीरें पैदा कर रहे हैं. कोई समर्थन के तौर पर किसी फोटो को लगाता है, तो कोई विरोध के लिए. एक ही फोटो का अलग-अलग इस्तमाल हो रहा है.
शब्दों की सीमा या लिखने के आलस के कारण तस्वीरों का व्यापक इस्तमाल होने लगा है. शब्दों की तुलना में तस्वीरें ज्यादा बोलने लगी हैं. आप ट्वीटर या व्हाट्स एप्प पर आसानी से एक फोटो अपलोड कर सकते हैं. बातें एक पलक और एक झलक में साफ हो जा रही हैं.
हमारे नेता भी इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए फोटो-उत्पादन पर खास ध्यान दे रहे हैं. कोई नेता एक गरीब के साथ तस्वीर खिंचा कर मसीहा बन जाता है, तो कोई अमीरों के बीच चलती हुई तस्वीरों से खलनायक. हर क्षण एक नयी छवि का उत्पादन हो रहा है.
कुल मिला कर इतनी छवियां बन जाती हैं कि एक सामान्य दिमाग इस लायक ही नहीं बचता होगा कि वह उस नेता के बारे में कोई तार्किक फैसला करे.
(एनडीटीवी इंडिया के ब्लॉग से साभार)
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