क्यों शिथिल है अर्थव्यवस्था!

Published at :19 May 2015 5:35 AM (IST)
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क्यों शिथिल है अर्थव्यवस्था!

डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को न तो आम आदमी के रोजगार की चिंता है, और न ही सेवा क्षेत्र में हमारी संभावनाओं की. उनके द्वारा लागू की जा रही गलत नीतियां ही अर्थव्यवस्था में शिथिलता का कारण हैं. मोदी सरकार का एक वर्ष पूरा होने को है, लेकिन अर्थव्यवस्था में गति नहीं […]

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डॉ भरत झुनझुनवाला

अर्थशास्त्री

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को न तो आम आदमी के रोजगार की चिंता है, और न ही सेवा क्षेत्र में हमारी संभावनाओं की. उनके द्वारा लागू की जा रही गलत नीतियां ही अर्थव्यवस्था में शिथिलता का कारण हैं.

मोदी सरकार का एक वर्ष पूरा होने को है, लेकिन अर्थव्यवस्था में गति नहीं दिख रही है. आंकड़ों में विकास दर में वृद्धि अवश्य बतायी जा रही है, परंतु जमीनी स्तर पर सब ठंडा है.

किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं. दुकानदारों के अनुसार, पिछले वर्ष से बिक्री 20 प्रतिशत नीचे है. शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार कम हुआ है. कोयला ब्लॉक तथा स्पेक्ट्रम की नीलामी से सरकार को भारी मात्र में राजस्व मिला है. फिर क्या कारण है कि अर्थव्यवस्था गति नहीं पकड़ रही है?

कारण सरकार की गलत नीतियों में निहित है. गलत नीतियों को ईमानदारी से लागू किया जा रहा है. बुनियादी संरचना में सरकारी निवेश शिथिल है. रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर सी रंगराजन के अनुसार, वर्तमान वर्ष में सरकार के पूंजी खर्च पिछले वर्ष के बराबर ही रहने का अनुमान है.

बुनियादी संरचना में सरकारी निवेश में जो मामूली वृद्धि की गयी है, वह महंगाई से कट जाती है. खर्च में बहुत जादा वृद्धि की जरूरत थी. महंगाई की तुलना में बुनियादी संरचना में खर्च कम ही बढ़ाया गया है. इससे बाजार में स्टील, सीमेंट तथा श्रम की मांग कम बनी हुई है और अर्थव्यवस्था शिथिल पड़ी हुई है.

इस समय विश्व बाजार में ईंधन तेल के दाम गिरे हुए हैं. विश्व अर्थव्यवस्था में मंदी गहरा रही है. अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष आदि संस्थाओं ने अगले वर्ष के ग्रोथ के अनुमान घटा दिये हैं. इस कारण तेल की मांग कम हो रही है और दाम गिरे हुए हैं. ऐसे में वित मंत्री के सामने दो रास्ते थे.

वे तेल के दाम की गिरावट को उपभोक्ता को दे सकते थे. ऐसे में तेल के घरेलू दाम कम होते और खपत बढ़ती. हम आयातित तेल पर ज्यादा निर्भर हो जायेंगे और हमारी ऊर्जा सुरक्षा नष्ट हो जायेगी. दूसरा रास्ता था कि तेल पर भारी टैक्स आरोपित किया जाता और वसूल की गयी रकम को थोरियम से ऊर्जा बनाने, न्यूक्लियर वेस्ट को रीसाइकिल करने अथवा सोलर पैनल बनाने के लिए किया जाता. इन रिसर्च में निवेश करने से नये उपकरणों आदि की मांग उत्पन्न होती.

वित्त मंत्री ने गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) को शीघ्र लागू करने पर जोर दिया है. परंतु कुछ समस्याएं हैं. पहली समस्या राज्यों की स्वायत्तता का है. वर्तमान में हर राज्य द्वारा माल पर लगनेवाले टैक्स को स्वयं निर्धारित किया जाता है. हर राज्य को उत्पादों पर अलग-अलग दर से टैक्स लगाने की छूट है. जीएसटी में राज्यों की यह स्वायत्तता छीन ली जाती है.

केंद्र सरकार द्वारा हर माल पर लगनेवाले टैक्स की दर को निर्धारित कर दिया जायेगा, जो कि पूरे देश पर लागू होगा. यह कदम सरकार के राज्यों के प्रति सकारात्मक दिखनेवाले मुखौटे का पर्दाफाश करता है. जबसे नरेंद्र मोदी दिल्ली पर पदासीन हुए हैं, वे राज्य-विरोधी हो गये हैं.

गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में वे राज्यों की स्वायत्तता के हिमायती थे. राज्यों की स्वायत्तता छीनने से अर्थव्यवस्था की जमीनी गति मंद पड़ती है, जैसे फैक्ट्री का केंद्रीय कंप्यूटर ठीक हो, लेकिन विभागों की मशीनरी खराब हो, तो उत्पादन नहीं बढ़ता.

दूसरी समस्या सेवा क्षेत्र पर प्रहार की है. देश का भविष्य सेवा क्षेत्र में है न कि मैन्यूफैरिंग में. हमारे पास मैन्यूफैरिंग के विस्तार के लिए भूमि, ऊर्जा तथा पानी नहीं है. मैन्यूफैरिंग द्वारा बनाये गये प्रदूषण को वहन करने की भी शक्ति हमारे में नहीं है. तुलना में सेवा में हम अव्वल हैं.

दूसरे देशों से कोयला, फर्टिलाइजर, गोबर आदि का आयात करके, इन संसाधनों को सॉफ्टवेयर में परिवर्तन करके इनका निर्यात् करना चाहिए. इस दिशा में मैन्यूफैरिंग पर टैक्स बढ़ा कर सेवा पर घटाना चाहिए था, जिससे कि अर्थव्यवस्था इस सुदिशा में मुड़े. परंतु हर माल पर एक दर से टैक्स लगाने के संकल्प में वित मंत्री ने सेवा पर टैक्स में वृद्धि की है. मोदी सरकार का ध्यान मैन्यूफैरिंग के विस्तार पर है. ‘मेक इन इंडिया’ के स्थान पर यदि मोदी ‘डिजाइन इन इंडिया’ का नारा देते, तो अर्थव्यवस्था चल निकलती. सिंचित खेत को छोड़ कर सूखे खेत की जुताई करने से किसान खुशहाल नहीं होता है.

बात वर्ष 2002 की है. प्रधानमंत्री वाजपेयी द्वारा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि द्वारा बनायी गयी पॉलिसी लागू की जा रही थी. आम आदमी त्रस्त था यद्यपि देश गोल्डेन क्वाडरेंगल तथा परमाणु विस्फोट जैसी योजनाओं के माध्यम से आगे बढ़ रहा था.

सलाहकारों द्वारा वाजपेयी के सामने रोजगार सृजन के फर्जी आंकड़े परोसे जा रहे थे. इन सलाहकारों द्वारा बनाये गये दलदल में वाजपेयी फंस गये. अंतत: जनता ने उन्हें उखाड़ फेंका. गोल्डेन क्वाडरैंगल जैसी अच्छी योजनाएं भी धीमी हो गयीं.

देश दस वर्ष पीछे पहुंच गया. मोदी उसी राह पर चल निकले हैं. उन्हें न आम आदमी के रोजगार की चिंता है, और न ही सेवा क्षेत्र में हमारी संभावनाओं की. उनके द्वारा लागू की जा रही गलत नीतियां ही अर्थव्यवस्था में शिथिलता का कारण हैं.

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