काश! ऐसे ही पूरे होते मेरे भी सपने

विश्वत सेन प्रभात खबर, रांची अंतर्देशीय. शब्द एक है, पर अर्थ दो हैं. यह मेरी समझ में तब आया, जब मैंने एक अंतर्देशीय पत्र अपने दफ्तर में देखा. तुरंत दिमाग के घोड़े दौड़ने लगे. एक अंतर्देशीय मोदीजी वाला. मेक इन इंडिया के अभियान वाला, जिसमें निवेश के लिए वे दुनिया भर में हाथ फैलाये घूम […]
विश्वत सेन
प्रभात खबर, रांची
अंतर्देशीय. शब्द एक है, पर अर्थ दो हैं. यह मेरी समझ में तब आया, जब मैंने एक अंतर्देशीय पत्र अपने दफ्तर में देखा. तुरंत दिमाग के घोड़े दौड़ने लगे. एक अंतर्देशीय मोदीजी वाला. मेक इन इंडिया के अभियान वाला, जिसमें निवेश के लिए वे दुनिया भर में हाथ फैलाये घूम रहे हैं.
प्रवासी भारतीयों के पास जा-जा कर कहते हैं, ‘भाइयो-बहनो! देश की समृद्धि के लिए घर वापसी करो. निवेश करो, भरपूर लाभ पाओ.’ इस मुहिम में देश की जनता के लिए, जनता के खर्च पर, जनता के वोटों के द्वारा, जनतांत्रिक तरीके से, चुनी गयी जनतांत्रिक गंठबंधन की सरकार के मुखिया युद्ध स्तर पर लगे हुए हैं.
देश में सत्ता परिवर्तन को एक साल हो गये. इस एक साल में मोदीजी ने जितना अपने देश के राज्यों का दौरा नहीं किया, उससे कहीं अधिक अंतर्देशीय निवेश को आकर्षित करने के नाम पर विदेशों का दौरा किया. एक पैर भारत में, तो दूसरा विदेश में. मनमोहन सिंह ने अपने 10 कार्यकाल के दौरान दूसरे पांच सालों में जितना विदेश दौरा नहीं किया होगा, उससे कहीं ज्यादा मोदीजी ने एक साल में कर लिया. चुन-चुन कर उन देशों का दौरा किया, जहां जाने का सपना था.
या यूं कहें कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते जिन देशों ने उन्हें ङिाड़का था, अपनी शक्ति दिखाने के लिए वे न केवल वहां गये, बल्कि बराक ओबामा की तर्ज पर ‘वी कैन’(हम कर सकते हैं.) के नारे लगाये और लगवाये भी. भला बताइये, उस राष्ट्र का भला कैसे नहीं हो सकता, जिस देश का प्रधान सेवक सवा सौ करोड़ की आबादी के सपने की सवारी करते हुए अपने सपने को पूरा करने के लिए विदेश भ्रमण पर गया हो?
अब अंतर्देशीय के दूसरे अर्थ की जमीन पर उतरते हैं. इसका मायने मैंने ‘देश के अंदर’ समझा है. अंतर्देशीय कंपनियां यानी कि अपनी देसी कंपनियां हैं, जिनकी कमाई जनता की मूर्खता पर होती है. कंपनियां बड़ी हों या छोटी, सब होशियार हैं. मूर्ख तो जनता है.
तभी तो हमारे आधुनिक अकबर साहब अपनी लेखनी से भारतीय कंपनियों की होशियारी पर कशीदे पढ़ने में कोई चूक नहीं करते. कंपनियों का एकदम कालिदास से भी ज्यादा उपमा, भास से भी अधिक अलंकार व शेक्सपीयर से भी अधिक प्रेमालाप से परिपूर्ण गुणगान. अच्छे दिनों का ढिंढोरा पीटने के दौरान वे कंपनियों व मुनाफाखोरों को होशियार नहीं बतायेंगे, तो आधुनिक अकबर साहब की दुकानदारी कहां से चलेगी? आखिर उन्हें भी तो राजनीति और बुद्धिजीवियों की दुनिया पर पकड़ बरकरार रखनी है.
जिस समय मुङो अंतर्देशीय शब्द के ये दोनों अर्थ समझ में आ गये, तभी से मैंने भी ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सिद्धांत को अपना लिया है. शायद मेरा सपना भी नरेंद्र दामोदर भाई मोदी की तरह सपना पूरा हो जाये. मैं भी दुनिया भर में उड़ सकूं.
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