बिजली कंपनियों की धांधलेबाजी

Published at :12 May 2015 12:32 AM (IST)
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बिजली कंपनियों की धांधलेबाजी

डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री यदि बिजली के दाम न्यून रखे जाते हैं, तो मांग ज्यादा और सप्लाई कम होगी और पावर कट जारी रहेंगे. उपभोक्ता को जेनरेटर से उत्पादित महंगी बिजली खरीदनी होगी. दूसरी तरफ दाम बढ़ाये जाते हैं, तो बिजली कंपनियां मुनाफाखोरी में लिप्त हो जाती हैं. गरमी के इस मौसम में भी बिजली […]

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डॉ भरत झुनझुनवाला

अर्थशास्त्री

यदि बिजली के दाम न्यून रखे जाते हैं, तो मांग ज्यादा और सप्लाई कम होगी और पावर कट जारी रहेंगे. उपभोक्ता को जेनरेटर से उत्पादित महंगी बिजली खरीदनी होगी. दूसरी तरफ दाम बढ़ाये जाते हैं, तो बिजली कंपनियां मुनाफाखोरी में लिप्त हो जाती हैं.

गरमी के इस मौसम में भी बिजली का संकट बना हुआ है. इससे उबरने के लिए बिजली की मांग को कम करना होगा और उत्पादन बढ़ाना होगा. बिजली के मूल्य में वृद्धि करने से ये दोनों ही लक्ष्य हासिल हो सकते है. परंतु दाम में वृद्धि से उत्पादन में बढ़त होना जरूरी नहीं है. संभव है कि बिजली कंपनियां मुनाफाखोरी में लिप्त हों.

उत्तराखंड के श्रीनगर में जीवीके कंपनी द्वारा 330 मेगावॉट की जलविद्युत परियोजना लगायी जा रही है. सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी द्वारा इस परियोजना को वर्ष 2004 में 1,700 करोड़ की लागत पर स्वीकृति दी गयी थी. स्वीकृति में स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि परियोजना की लागत ‘किन्हीं भी परिस्थितियों में’ इससे अधिक नहीं होगी तथा इस अतिरिक्त लागत को उत्पादन कंपनी को स्वयं वहन करना होगा. इस शर्त के बावजूद कंपनी लागत को लगातार बढ़ाती गयी.

कंपनी ने उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन से विक्रय का अनुबंध कर रखा है. अनुबंध करते समय फिक्स कास्ट 2 रुपये प्रति यूनिट आती थी, जो अब 6 रुपये प्रति आ रही है. यह मूल्य उत्तर प्रदेश के उपभोक्ता को अदा करना पड़ेगा.

कंपनी ने लागत में वृद्धि के दो मुख्य कारण बताये. पहला, ‘भूगर्भीय आश्चर्य’. कहा कि परियोजना बनाते समय पहाड़ों की भूगर्भीय स्थिति पूर्व आकलन से भिन्न पायी गयी, जिसके कारण डिजाइन में परिवर्तन करना पड़ा. लेकिन कंपनी ने सरकार को भूगर्भीय आश्चर्य की सूचना नहीं दी थी, जिससे स्पष्ट है कि यह बढ़ी हुई लागत दिखाने का बहाना था.

मुनासिब जांच कमेटी ने भी इस पर ध्यान नहीं दिया और कंपनी द्वारा बढ़ायी गयी लागत को स्वीकार कर लिया. यह कमेटी महज ढकोसला थी. कंपनी ने दूसरा कारण वर्ष 2013 में आयी आपदा को बताया. कंपनी ने इंश्योरेंस कंपनी के सामने लगभग 400-500 करोड़ रुपये का क्लेम प्रस्तुत किया है. इंश्योरेंस कंपनी ने 35 करोड़ का भुगतान भी कर दिया है.

परंतु मुनासिब जांच कमेटी इस प्राप्ति पर मौन रही. यानी कंपनी ने इस नुकसान का दो स्थान पर क्लेम लगाया. एक तरफ इंश्योरेंस से लिया और दूसरी तरफ बढ़ी लागत दिखा कर उपभोक्ता से लिया. 400 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ कंपनी ने लेना चाहा.

कंपनी ने उपभोक्ता को निम्न प्रकार चपत लगायी. एक, सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी द्वारा स्वीकृत 1,700 करोड़ से अधिक लागत को कंपनी को वहन करना था, जिसे उपभोक्ता पर ढकेल दिया गया.

दो, फर्जी बिल लगा कर कंपनी मालिकों ने अपनी पूंजी वापस निकाल ली और बढ़ी हुई लागत को भूगर्भीय आश्चर्य का बहाना देकर उपभोक्ता पर पर ढकेल दिया. तीन, आपदा में हुए नुकसान का इंश्योरेंस से क्लेम लिया और उपभोक्ता से भी. इस प्रकार फिक्स कास्ट को 2 रुपये से बढ़ा कर 6 रुपये कर दिया. इसमें सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी की भी मिलीभगत रही. परियोजना की लागत में तीन गुना वृद्धि के बावजूद स्वीकृति को निरस्त नहीं किया गया.

ऐसा ही घपला वैरियेबल कास्ट में है. जलविद्युत की फिक्स कास्ट ज्यादा और वैरिऐबल कास्ट शून्य प्राय होती है.

जलविद्युत के उत्पादन में ईंधन नही लगता है. थर्मल पावर की फिक्स कास्ट कम और वैरिऐबल कास्ट ज्यादा आती है, चूंकि कोयला खरीदना पड़ता है. कंपनी ने उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन से जो अनुबंध किया है, उसमें व्यवस्था है कि उत्तरी क्षेत्र में जो थर्मल प्लांटों की न्यूनतम वैरिऐबल कास्ट आयेगी उसके बराबर वैरिएबल कास्ट कंपनी जलविद्युत के उत्पादन के लिए दी जायेगी. अर्थ हुआ कि फिक्स कास्ट जलविद्युत के अनुसार तथा वैरिएबल कास्ट थर्मल के अनुसार दी जायेगी. कंपनी के दोनों हाथ में लड्डू तथा उपभोक्ता के दोनों हाथ बैरंग.

परियोजना से स्थानीय लोगों को और पर्यावरण की भी भारी हानि हो रही है. झील के किनारे लोगों के घर धसक रहे हैं.

नदी से मछली समाप्त हो गयी है. पानी की गुणवत्ता का ह्रास हुआ है. झील से मीथेन गैस का उत्सजर्न हो रहा है. इन सब नुकसानों की भरपाई भी कंपनी को करनी थी. परंतु कंपनी ने इन खर्च को स्थानीय जनता पर ढकेल दिया. फलस्वरूप कंपनी एक तरफ उपभोक्ता को और दूसरी तरफ स्थानीय प्रभावितों को चूना लगा रही है और स्वयं भारी प्रॉफिट कमा रही है.

यदि बिजली के दाम न्यून रखे जाते हैं, तो मांग ज्यादा और सप्लाई कम होगी और पावर कट जारी रहेंगे. उपभोक्ता को जेनरेटर से उत्पादित महंगी बिजली खरीदनी होगी. दूसरी तरफ दाम बढ़ाये जाते हैं, तो बिजली कंपनियां मुनाफाखोरी में लिप्त हो जाती हैं.

उपभोक्ता को महंगी बिजली खरीदनी पड़ती है और पावर कट भी ङोलना पड़ता है. समस्या का एकमात्र समाधान है कि सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी जैसी सरकारी संस्थाएं अपनी जिम्मेवारी का निर्वाह करें तथा कंपनियों द्वारा मुनाफाखोरी पर अंकुश लगाएं.

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