न्याय प्रणाली पर बढ़े सबका भरोसा

Published at :12 May 2015 12:30 AM (IST)
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न्याय प्रणाली पर बढ़े सबका भरोसा

अभिनेता सलमान खान को निचली अदालत से सजा के तुरंत बाद हाइकोर्ट से जमानत मिलने और अब तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता को हाइकोर्ट से बरी कर दिये जाने के बाद देश की न्याय-प्रणाली के सामने कुछ विचारणीय प्रश्न उठ खड़े हुए हैं. यह सही है कि हर आरोपित को न्याय मांगने का हक […]

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अभिनेता सलमान खान को निचली अदालत से सजा के तुरंत बाद हाइकोर्ट से जमानत मिलने और अब तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता को हाइकोर्ट से बरी कर दिये जाने के बाद देश की न्याय-प्रणाली के सामने कुछ विचारणीय प्रश्न उठ खड़े हुए हैं.

यह सही है कि हर आरोपित को न्याय मांगने का हक है और अदालतें सबूतों-दलीलों के आधार पर ही फैसले देती हैं. जमानत के लिए सलमान खान के तर्क उचित हो सकते हैं या जयललिता पर लगे आरोप राजनीति से प्रेरित हो सकते हैं.

लेकिन, ऐसे मामलों को पूरी न्याय-प्रणाली के आईने में देखें, कुछ विरोधाभास भी सामने आते हैं. एक ओर जहां बहुचर्चित मामलों में भी निचली अदालतों की सुनवाई पूरी होने और फैसले आने में वर्षो लग जाते हैं, वहीं इन फैसले के खिलाफ जब राहत पाना हो, तो वकीलों ही नहीं, जजों तक में भी ऐसी तेजी दिखती है, मानो हमारी अदालतें दुनिया की सबसे सक्षम न्याय-प्रणाली का हिस्सा हों. जरा आंकड़ों पर नजर डालें. देशभर में तीन करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें करीब 65 हजार सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं.

ढाई लाख से अधिक विचाराधीन कैदी सलाखों के पीछे फैसले का इंतजार कर रहे हैं. कुल कैदियों में इनकी संख्या दो-तिहाई है. सरकारें भी मान चुकी हैं कि बड़ी संख्या में विचाराधीन कैदी सजा की अवधि से अधिक वक्त जेल में काट देते हैं. मामूली अपराधों के आरोप में हिरासत में लिये गये ज्यादातर कैदी आर्थिक तंगी के कारण जमानत नहीं ले पाते या अपनी पैरवी के लिए अच्छे वकील नहीं कर पाते.

पिछले वर्ष सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने उन विचाराधीन कैदियों, जो अपने खिलाफ लगे आरोपों में तय सजा की आधी अवधि जेल में काट चुके हैं, को दिसंबर तक रिहा करने का आदेश दिया था. पर, केंद्र के पास इसका राज्यवार ब्योरा उपलब्ध नहीं है. ऐसे मामले भी सामने आते हैं, जिनमें झूठे आरोपों में लोग सालों तक जेल में बंद रहते हैं.

महात्मा गांधी ने कहा था कि सभी अदालतों से बड़ी अदालत है हमारी अंतरात्मा. सरकार व जांच एजेंसियों के साथ न्यायाधीशों और न्यायविदों को अपनी-अपनी अंतररात्मा में इस प्रश्न पर गौर करना चाहिए कि क्या भारी धन खर्च किये बिना समय पर सभी के लिए न्याय उपलब्ध करा पाना संभव नहीं है?

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