अपना घर फूंक ज्ञान की रोशनी की

अजय पांडेय प्रभात खबर, गया उनका कद चार फुट से ज्यादा नहीं रहा होगा, लेकिन 24 इंच की साइकिल चलाते थे. उनके पैर कभी पैडल तक नहीं पहुंच सके, लेकिन 18 किलोमीटर दूर से साइकिल चला कर स्कूल आते थे. 28 इंच की मोहरी का उनका पाजामा साइकिल की चेन में न फंस जाये, इसलिए […]
अजय पांडेय
प्रभात खबर, गया
उनका कद चार फुट से ज्यादा नहीं रहा होगा, लेकिन 24 इंच की साइकिल चलाते थे. उनके पैर कभी पैडल तक नहीं पहुंच सके, लेकिन 18 किलोमीटर दूर से साइकिल चला कर स्कूल आते थे. 28 इंच की मोहरी का उनका पाजामा साइकिल की चेन में न फंस जाये, इसलिए उसे घुटने तक मोड़ लेते थे.
स्कूल में तो वह साढ़े नौ की वॉर्निग घंटी थे. मैं उस स्कूल में आठवीं तक पढ़ा, लेकिन उनका नाम नहीं जान सका. सभी उन्हें ‘चश्मीली माटसाहेब’ कहते थे. कारण यह था कि स्कूल में वह अकेले थे, जो चश्मा लगाते थे. मुङो याद नहीं, जब वह किसी बच्चे पर नाराज हुए हों या उसे मारा हो. हालांकि, तब स्कूलों में मारना-पीटना आम था. बच्चों के मां-बाप भी शिकायत नहीं करते थे.
माटसाहेब उस स्कूल के संस्थापक शिक्षकों में से एक थे. मेरी जब भी उनसे बात होती, वह कहते- ‘‘चेला, ई स्कूल के बनावे में हमनी के मूड़ी पर गिलवा-माटी ले ढोयले बानी जा, चेमनी से साइकिल पर ईंटा लाद के लियाइल बानी जा. गांवे-गांवे घूम के बांस मंगाइल रहे. ओतना पइसो ना रहे कि पलानी बनावे खातिर जाना-मजदूर रखल जाव, मास्टर लोग अपने मिलके पलानी बनावे.
रात में काम होखे आ दिन में पढाई.’’ उस समय स्कूल में 400 बच्चों के नामांकन थे. एक दिन बातों ही बातों में गंभीर मुद्रा में उन्होंने कहा- ‘‘अपना घर से खाके केतना दिन गाड़ी चली.’’ मैं समझ नहीं पाया, सो इसका मतलब पूछ बैठा. उन्होंने बताया कि इस स्कूल के शिक्षकों को तनख्वाह नहीं मिलती. मैं चौंका. यह वाजिब भी था.
आखिर उन्होंने अपने जीवन के 35-40 साल यों ही ऐसे काम में क्यों लगा दिये, जहां से एक नया (पैसा) नहीं मिला? स्कूल बनाने के चक्कर में उनका घर नहीं बना? अपना घर फूंक कर औरों का घर रोशन किया? उन्होंने बताया कि स्कूल को सरकार से मान्यता दिलवाने व शिक्षकों को तनख्वाह देने के लिए वे कई बार जिला मुख्यालय व पटना गये.
अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों का दौरा भी हुआ. इसका असर रहा कि सरकार ने उसे प्रस्वीकृति दे दी और स्कूल वित्तरहित शिक्षा नीति के तहत सूचीबद्ध हो गया. शिक्षकों को तनख्वाह छोड़ कर सारी सुविधाएं मिलने लगीं. लेकिन, शिक्षकों को असली जरूरत तनख्वाह की थी. एक बार मास्टर लोगों ने विचार किया कि बच्चों से हर महीने पांच रुपये लिये जायें.
यही रुपये मास्टरों में बतौर तनख्वाह बटें. अगले दिन उन लोगों ने प्रार्थना के बाद इसकी घोषणा कर दी. अगले दिन एक भी बच्च पढ़ने नहीं आया. बाद में उनलोगों को अपना फैसला वापस लेना पड़ा और गांवों में जाकर बच्चों को वापस स्कूल में बुलाना पड़ा.
वह अक्सर कहते कि हमारी पीढ़ी तो पढ़ा कर रिटायर हो जायेगी. लेकिन, बाद की पीढ़ी इस नीति को शायद नहीं माने. या तो ऐसे कई स्कूल बंद हो जायेंगे या वे आंदोलन पर उतारू हो जायेंगे.. तब मुङो नहीं पता कि उनकी बातें कितनी सही थीं.
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