‘लुक ईस्ट’ के बाद ‘लुक वेस्ट’ नीति
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :16 Apr 2015 1:55 AM (IST)
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प्रमोद जोशी वरिष्ठ पत्रकार राफेल सौदे के बाद एक उम्मीद यह भी है कि भारत और रूस मिल कर पांचवीं पीढ़ी के स्टैल्थ विमान पर फिर से काम करें. रूस सुखोई-35 में पांचवीं पीढ़ी की सुविधाएं विकसित करने को भी तैयार है. अभी सिर्फ अमेरिका के पास ही पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं. प्रधानमंत्री […]
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प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
राफेल सौदे के बाद एक उम्मीद यह भी है कि भारत और रूस मिल कर पांचवीं पीढ़ी के स्टैल्थ विमान पर फिर से काम करें. रूस सुखोई-35 में पांचवीं पीढ़ी की सुविधाएं विकसित करने को भी तैयार है. अभी सिर्फ अमेरिका के पास ही पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूरोप और कनाडा यात्र के राजनीतिक एवं आर्थिक महत्व के बरक्स तकनीकी, वैज्ञानिक और सामरिक महत्व भी कम नहीं है. इन देशों के पास भारत की ऊर्जा जरूरतों की कुंजी भी है. इस यात्र के दौरान ‘मेक इन इंडिया’ अभियान, स्मार्ट सिटी और ऊर्जा सहयोग महत्वपूर्ण विषय बन कर उभरे हैं. न्यूक्लियर ऊर्जा में फ्रांस और सोलर एनर्जी में जर्मनी आगे हैं. इन सबके अलावा अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद भी इन देशों की चिंता का विषय है.
कनाडा की आबादी में भारतीय मूल के नागरिकों का प्रतिशत काफी बड़ा है. अस्सी के दशक में खालिस्तान आंदोलन को वहां से काफी हवा मिली थी. 1985 में एयर इंडिया के यात्री विमान को कनाडा में बसे आतंकवादियों ने विस्फोट से उड़ाया था, जिसकी यादें आज भी ताजा हैं. सामरिक दृष्टि से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की पहलकदमी में कनाडा की भी महत्वपूर्ण भूमिका है.
आण्विक ऊर्जा को लेकर भारत का शुरुआती सहयोगी देश कनाडा था. साल 1974 में भारत के पहले आण्विक परीक्षण के लिए न्यूक्लियर सामग्री जिस ‘सायरस’ रिएक्टर से प्राप्त हुई थी, वह कनाडा के सहयोग से लगा था. इस विस्फोट के बाद अमेरिका और कनाडा के साथ भारत के नाभिकीय सहयोग में खटास आयी, जो 2008 के भारत-अमेरिका और 2010 के भारत-कनाडा न्यूक्लियर डील के बाद खत्म हुई.
सामरिक दृष्टि से फ्रांस के साथ राफेल लड़ाकू विमान का सौदा इस यात्र की सबसे महत्वपूर्ण घटना है. एक तरह से इस सौदे को नये ढंग से परिभाषित किया गया है. पहले इस सौदे के तहत 18 तैयारशुदा विमान फ्रांस से मिलते. शेष 108 विमानों के लिए फ्रांस तकनीकी जानकारी हमें उपलब्ध कराता. उन्हें एचएएल में बनाने की योजना थी.
अब 36 विमान सीधे वहीं से तैयार हो कर आयेंगे. तो क्या मोदी सरकार ‘मेक इन इंडिया’ नीति से हट रही है? जबकि फ्रांस सरकार किसी भारतीय कंपनी के सहयोग से निजी क्षेत्र में भी इस विमान को तैयार कर सकती है. इस व्यवस्था में भारतीय कंपनी की हिस्सेदारी 51 फीसदी की होगी.
राफेल विमानों को लेकर फिलहाल एक अनिश्चितता खत्म हुई, पर यह समस्या का समाधान नहीं है. हमारे फाइटर स्क्वॉड्रन कम होते जा रहे हैं. आदर्श रूप से हमारे पास 45 स्क्वॉड्रन होने चाहिए, पर उनकी संख्या 36 के आसपास हो जाने का अंदेशा है. मिग-21 विमानों की जगह लेने के लिए तेजस विमानों का विकास किया जा रहा है. हमें केवल विमान ही नहीं, बल्कि उसे बनाने की तकनीक भी चाहिए. और तकनीक केवल पैसे से नहीं, कूटनीति (डिप्लोमेसी) से मिलती है.
राफेल दो इंजन का फ्रंटलाइन फाइटर विमान है. इसके लिए टेंडर 2007 में निकला था. भारत अपनी सेनाओं के आधुनिकीकरण में लगा है. लगभग 100 अरब डॉलर के इस कार्यक्रम के लिए धन से ज्यादा तकनीक हासिल करने की चुनौती है. तकनीक पैसा देने पर भी नहीं मिलती. सैन्य तकनीक पर सरकारों का नियंत्रण होता है. उसे हासिल करने के दो ही तरीके हैं. पहला, हम अपनी तकनीकी शिक्षा का स्तर सुधारें. दूसरा, हम मित्र बनायें और तकनीक हासिल करें. यह तय है कि जब तक हमारे पास तकनीक नहीं होगी, हम स्वावलंबी नहीं हो पायेंगे.
भारत ने 50 के दशक में ही सुपरसोनिक लड़ाकू विमान तैयार करने का फैसला किया था. भारत ने आजादी के फौरन बाद वैमानिकी के विश्व प्रसिद्ध जर्मन डिजाइनर कुर्ट टैंक की सेवाएं ली थीं. कुर्ट पहले मद्रास इंस्टीटय़ूट ऑफ टेक्नोलॉजी में और फिर हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स की सेवा में आये. उन्होंने एचएफ-24 मरुत विमान का डिजाइन तैयार किया. उसके लिए अपेक्षित इंजन की तकनीक ब्रिटेन से ली जा रही थी कि वह काम अधूरा रह गया. एचएफ-24 विमान ने 1971 की लड़ाई में हिस्सा भी लिया, लेकिन हम उसके विकास पर ध्यान नहीं दे पाये. 1962 की लड़ाई के बाद हमें मिग-21 को अपना मुख्य विमान बनाना पड़ा और 80 के दशक के उत्तरार्ध में मरुत पूरी तरह विदा हो गये.
अस्सी के दशक में हमने फिर से अपना विमान विकसित करने के बारे में विचार किया. भारतीय लड़ाकू विमान एलसीए तेजस कंपोजिट फाइबर के फ्रेम, कलाबाजी के लिए उपयुक्त डिजाइन और नेविगेशन प्रणाली आदि के क्षेत्र में मिग-21 की तुलना में बेहतर है, लेकिन इसका विकास भी अवरोधों का शिकार होता रहा है.
उसमें अमेरिकी जीइ-404 इंजन लगा है. इसे बनानेवाली एजेंसी एडीए (एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी) ने वायुसेना से वादा किया था कि उसे 2010 तक बीस तेजस विमान सौंप दिये जायेंगे, पर 1998 के पोखरण आण्विक विस्फोट के कारण अमेरिका ने भारत पर जो पाबंदियां लगायी थीं, उनसे तेजस के विकास पर भी असर पड़ा. अमेरिकी इंजन नहीं मिला. विकल्प में कावेरी इंजन का विकास शुरू किया गया, पर वह इंजन अपेक्षित शक्ति तैयार नहीं कर पाया. बहरहाल अब राजनीतिक घटनाक्रम बदला है.
जनरल इलेक्ट्रिक ने न केवल जीइ-404 दिया है, उससे ज्यादा ताकतवर जीइ-414 इंजन देने की पेशकश भी की है. वायुसेना तेजस का मार्क-2 चाहती है, जिसमें जीइ-414 इंजन हो और विमान का आकार कुछ बड़ा हो, पर उसके डिजाइन में सुधार करने में समय लगेगा. भारत ने रूस के साथ मिल कर पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान विकसित करने का काम भी शुरू किया है. इस कार्यक्रम में भी अवरोध पैदा हो गये.
एफजीएफए (फिफ्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट) नाम से जाना जानेवाला टी-50 का प्रारूप भी बनाया जा चुका है. इस प्रारूप को एक ही पायलट चला सकता है. भारतीय वायुसेना पारंपरिक रूप से दो पायलटों द्वारा चालित विमानों को प्राथमिकता देती है.
राफेल सौदे के बाद एक उम्मीद यह भी है कि भारत और रूस मिल कर पांचवीं पीढ़ी के स्टैल्थ विमान पर फिर से काम करें. रूस सुखोई-35 में पांचवीं पीढ़ी की सुविधाएं विकसित करने को भी तैयार है. अभी सिर्फ अमेरिका के पास ही पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं. चीन भी इस दिशा में काम कर रहा है, पर इंजन के लिए वह रूस पर आश्रित है.
मसला केवल लड़ाकू विमानों का नहीं है. केवल रक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र के लिए हमें हाइ टेक्नोलॉजी की जरूरत है. तोपखाने, टैंकों, जहाजों तथा मिसाइल तकनीक में तेजी से काम करना है.
हाल में फ्रांस के सहयोग से बन रही स्कोर्पीन पनडुब्बी का जलावतरण किया गया है. परमाणु शक्ति चालित पनडुब्बी ‘अरिहंत’ का भी परीक्षण चल रहा है. विक्रांत वर्ग के विमानवाहक पोत का परीक्षण भी जारी है. संभवत: अगला विमानवाहक पोत परमाणु शक्ति चालित होगा, जिसके लिए अमेरिकी मदद ली जायेगी.
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