‘आप’ से ही तो है चाय पर चर्चा में रंग

Published at :04 Apr 2015 5:13 AM (IST)
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‘आप’ से ही तो है चाय पर चर्चा में रंग

कुणाल देव प्रभात खबर, जमशेदपुर खेत-खलिहान की चिंता और जीवन की आपाधापी के बीच बेबाक सिंह उदास मन से मुहल्ले के नुक्कड़ पर चाय पीने पहुंचे. क्रिकेट वर्ल्ड कप में मिली हार की चर्चा खत्म हो चुकी है. इससे पहले कि आइपीएल शुरू हो और चर्चा में फिर से क्रिकेट आ जाये, ‘आप’ ने लोगों […]

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कुणाल देव

प्रभात खबर, जमशेदपुर

खेत-खलिहान की चिंता और जीवन की आपाधापी के बीच बेबाक सिंह उदास मन से मुहल्ले के नुक्कड़ पर चाय पीने पहुंचे. क्रिकेट वर्ल्ड कप में मिली हार की चर्चा खत्म हो चुकी है. इससे पहले कि आइपीएल शुरू हो और चर्चा में फिर से क्रिकेट आ जाये, ‘आप’ ने लोगों को बेहतरीन मनोरंजन मुहैया करा दिया है.

चाय की दुकान पर चर्चा के केंद्र में आप ही थी. ‘आप’ के रुपल्ली सदस्य बखोरन काफी दुखी हैं. अच्छी-खासी चल रही किराने की दुकान में ताला मार कर आंदोलन में कूदे थे. उन्हें विश्वास था कि एक न एक दिन उनकी पार्टी जरूर कामयाब होगी. पार्टी नगर निगम का चुनाव लड़ेगी और वे वार्ड पार्षद बन जायेंगे. इसके बाद वे किराने की दुकान में अपना दफ्तर बनवा लेंगे. लेकिन, अब उनकी पार्टी के नेशनल लीडरान के बीच जो हो रहा है, उससे वह काफी दुखी हैं.

खास कर, दाढ़ीवाले ‘शक्कर पुरुष’ (क्योंकि उनकी बातों से मिठास बेहिसाब झड़ती है) से. चाय की चुस्की के साथ ही बखोरन का पारा चढ़ा जा रहा था और वे शक्कर पुरुष और उनकी मंडली को खूब जली-कटी सुना रहे थे, ‘‘अब यह क्या बात हुई भाई कि खून सुखाया बड़े भइया ने, शुगर बढ़ाई बड़े भइया ने, जहां-तहां थप्पड़ खाये बड़े भइया ने, मुंह पर कालिख पुतवायी बड़े भइया ने, जेल यात्र की बड़े भइया ने और जब मलाई खाने की बारी आयी तो शक्कर पुरुष ने जिद पकड़ ली.

पार्टी के भीतर ही सियासत करने लगे. बड़े भइया का ही स्टिंग करवाने लगे. ठीक किया भाई, ठीक किया. कोई भी वैसा ही करता. ठीक लात लगायी.’’ ‘‘अरे बखोरन! जरा रुको भाई, क्यों अपना ब्लड प्रेशर बढ़ा रहे हो?’’,बेबाक सिंह ने टोका. ‘‘अरे नहीं भाई साहेब. देखिये तो भला, कितनी चिकनी-चुपड़ी बातें करते थे, जैसे संत हों. नाम तो शांति और प्रशांत है, लेकिन, पार्टी को सबसे ज्यादा अशांत तो इन्होंने ही किया है.’’ बेबाक सिंह के लिए बात बर्दाश्त से बाहर हो गयी, ‘‘‘हां भाई, जैसे आपके बड़े भइया तो एकदम साधु-संन्यासी हैं. मोह-माया तो उन्हें छू तक नहीं गयी हे.

बस कोई उनकी बात न काटे. कोई अपनी बात न रखे. जहां किसी ने उनकी बात काट दी, अपने मन की बात उनके सामने रख दी, नियम-कायदे की बात कर दी तो, बस उनके अंदर का अंगुलीमाल जाग उठता है. फिर तो भइया, मुंह से ऐसे-ऐसे फूल झड़ते हैं कि सामने वाले की मां-बहनों की इज्जत पर बन आती है.

अरे उन्होंने राजनीतिक सम्मेलनों में बाउंसर रखने की नयी परिपाटी तक शुरू कर दी है. कितने मासूम हैं, जिद भी करते हैं तो बच्चों वाली- या तो पूरा ‘आप’ चाहिए या फिर कुछ भी नहीं. उन्होंने सफाई अभियान तो घर से ही शुरू कर दिया है. एक-एक कर नींव के पत्थरों को उखाड़ फेंक रहे हैं. आखिर पुराने जो हो गये हैं. बड़े भइया झाड़ू चुनाव निशान को सार्थक कर रहे हैं.’’ इसके बाद तो मानो बखोरन को सांप सूंघ गया.

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