पार्टी की काया ही नहीं, दिल भी बड़ा हो
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :03 Apr 2015 5:32 AM (IST)
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उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार भारत को मात्रत्मकता की नहीं, गुणात्मकता की जरूरत है. हर क्षेत्र में और हर दिशा में. मात्रत्मकता हर समय नकारात्मक नहीं होती, पर वह गुणात्मकता की गारंटी तो नहीं ही हो सकती! जरूरत है मात्रत्मकता और गुणात्मकता के बीच संतुलन की. हमारे जैसे विकासशील समाज में, जहां भौतिक और वैचारिक स्तर पर […]
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उर्मिलेश
वरिष्ठ पत्रकार
भारत को मात्रत्मकता की नहीं, गुणात्मकता की जरूरत है. हर क्षेत्र में और हर दिशा में. मात्रत्मकता हर समय नकारात्मक नहीं होती, पर वह गुणात्मकता की गारंटी तो नहीं ही हो सकती! जरूरत है मात्रत्मकता और गुणात्मकता के बीच संतुलन की.
हमारे जैसे विकासशील समाज में, जहां भौतिक और वैचारिक स्तर पर अब भी काफी पिछड़ापन है, प्रगति की दौड़ में आगे बढ़ने की होड़ कोई अनोखी बात नहीं है. यह काफी हद तक स्वाभाविक है. मैं अकसर जिलों-कस्बों-छोटे-मझोले शहरों में सुनता हूं- अमुक डॉक्टर भारत में नंबर-वन या नंबर-दो डॉक्टर है.
कई बार तो यह नंबरिंग एशिया स्तर की होने लगती है. कभी किसी पुल तो कभी किसी प्लेटफॉर्म या रेलवे स्टेशन को भारत का नंबर वन या एशिया का नंबर दो-तीन आदि बताया जाने लगता है. बचपन में सुना था कि मेरे जिले के पड़ोस का एक रेलवे स्टेशन या उसका यार्ड भारत में नंबर वन था. लेकिन जब मैं पहली बार उस रेलवे स्टेशन में दाखिल हुआ, तो उसकी दुर्दशा देखी न गयी. चारों तरफ गंदगी और बदबू. स्टेशन का हाल देख बहुत दुखी हुआ. ऐसे में उसका पूरे भारत में नंबर-वन या टू होने का क्या मतलब? क्या सिर्फ ‘मात्रत्मकता’ किसी के बड़ा या श्रेष्ठ होने का प्रमाण है! क्या मात्रत्मकता ही गुणात्मकता तय करती है?
देश की मुख्य सत्तारूढ़ पार्टी-भाजपा ने इस सप्ताह दावा किया कि अब वह विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बन गयी है. विश्व क्या, चाहें तो ब्रह्मांड भी कह लें. ठीक है, हम ‘मिस्ड कॉल पचड़े’ में भी नहीं फंसना चाहते. मान लिया कि पार्टी को संख्या के स्तर पर बड़ी कामयाबी मिल गयी. लेकिन इससे हासिल क्या हुआ या आगे क्या होनेवाला है?
क्या इससे गरीबी, सेहत और शिक्षा के स्तर पर बेहाली, कुपोषण, भ्रष्टाचार, जातिवाद, संप्रदायवाद, आतंकवाद, संकीर्णतावाद और कट्टरपंथ जैसी गंभीर चुनौतियों से निपटने में हम ज्यादा समर्थ हो जायेंगे? क्या इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारी प्रतिष्ठा बढ़ जायेगी? अभी तो नाइजीरिया भी हमसे मुंह फुलाये बैठा है. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी हमारी बदनामी हुई. इसी पार्टी से संबद्ध एक माननीय केंद्रीय राज्यमंत्री जी के हाल के अशोभनीय-असभ्य बयान के कारण सारा बावेला मचा. उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ भद्दा बयान देने के क्रम में नाइजीरियाई महिलाओं पर भी नितांत अशोभनीय टिप्पणी कर दी थी.
फिर भी, हम भाजपा को बधाई देंगे कि वह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य संख्या को भी पार कर गयी. बताते हैं कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो और पार्टी कार्यक्रम-संविधान आदि पढ़ने-समझने और उससे अपनी संबद्धता साबित करने पर सदस्यता मिलती है. भाजपा ने रास्ता आसान कर दिया. निवेश के ‘सिंगल विंडो’ से भी ज्यादा आसान. सिर्फ एक ‘मिस्ड कॉल’ और सदस्यता मिली. दिल्ली में उसकी सदस्यता सबसे अधिक ही नहीं, अन्य सभी पार्टियों के कुल सदस्यों के जोड़ से भी ज्यादा हो गयी है. फिर 70 विधायकों वाली दिल्ली विधानसभा के हाल के चुनाव में पार्टी के सिर्फ तीन ही विधायक क्यों जीते? अगर पार्टी के ‘मिस्ड कॉल’ वाले सभी सदस्यों ने पक्ष में मतदान किया होता तो क्या नतीजे ऐसे होते?
असल में सदस्यता का यह नया अभियान हिंदुत्ववादी पार्टी में एक तरह का ऐसा ‘उत्तर-आधुनिकतावाद’ है, जिसमें ‘कंटेट’ कम, ‘फार्म’ और ‘प्रोपगेंडा’ ज्यादा हैं. भारत की राजनीति में वामपंथियों और धुर-दक्षिणपंथी आरएसएस को कार्यकर्ता या अनुशासित सदस्यों वाली संगठनिक शक्ति माना जाता रहा है. आरएसएस के साथ जनसंघ और उसके बाद के रूप-भाजपा में अनुशासित सदस्यों को दक्षिणपंथी सोच और वैचारिक आधारों पर शिक्षित किया जाता रहा है. ऐसा लगता है कि भाजपा ने अपने सांगठनिक सोच में बदलाव किया है और यह आरएसएस की इच्छा के विरुद्ध नहीं हो सकता.
दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री पद के लिए पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी का नाम अचानक घोषित किया गया. उन्हें आनन-फानन में पार्टी की सदस्यता दी गयी. सदस्यता लेने से पहले या उसके साथ ही वह पार्टी की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार बन गयीं. संघ-परिवार से जुड़ी भाजपा में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था.
पार्टी से बाहर के किसी व्यक्ति को अचानक पार्टी में लाकर मंत्री बनाना, सांसद या विधायक का टिकट देना, ऐसा तो पहले हुआ था, पर किसी राज्य के विधानसभाई चुनाव में शीर्ष पद का दावेदार बनाने का ऐसा दृश्य भाजपा में पहले कभी नहीं देखा गया. क्या वह अनायास था या सोची-समझी योजना का हिस्सा? मुङो लगता है, पार्टी अपनी चुनावी संभावनाओं को लेकर पहले से आश्वस्त नहीं थी. उसे लगा कि बाहर से किरण बेदी को लाकर वह जनता से सामने आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल की काट पेश कर सकती है.
किरण एक आकर्षक वैकल्पिक चेहरा हो सकती हैं. लेकिन पार्टी बुरी तरह पिटी और उसकी मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार स्वयं भी चुनाव हार गयीं. वह भी भाजपा की पारंपरिक सीट- कृष्णा नगर- से. भाजपा की कार्यशैली के इस बदलाव के क्या संकेत हैं? संकेत बड़े साफ हैं, एक हिंदुत्ववादी पार्टी तेजी से बदलते भारतीय समाज में अपने विचारों में कोई गुणात्मक बदलाव लाये बगैर सिर्फ ऊपर के चेहरे या चाल में फेरबदल के जरिये कामयाबी का रास्ता खोजना चाहती है.
वह ऊपर से आधुनिकता का चेहरा दिखाना चाहती है. आम लोगों की व्यापक सदस्यतावाली पार्टी बनना चाहती है. लोकसभा के पिछले चुनाव में उसे ऐसे ही लटकों-झटकों से आशातीत सफलता मिली. वह इस तरह के लटके-झटकों को विस्तार देना चाहती है. यही है, भारतीय जनता पार्टी का उत्तर-आधुनिकतावाद, जिसमें मूल अंतर्वस्तु नहीं, सिर्फ बाहरी रूप बदलता नजर आयेगा.
इस तरह के ‘सदस्यता-दर्प’ का दूसरा पहलू भी है. उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड हों या तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश-तेलंगाना, आमतौर पर देखा जाता है कि जैसे ही सरकार बदलती है, स्थानीय से लेकर राजधानी स्तर पर, बहुत सारे ‘राजनीतिक किस्म के लोग’ अचानक अपनी गाड़ियों पर टंगे झंडे बदल देते हैं. इनमें ठेकेदारों-रंगदारों समेत तरह-तरह के अच्छे-बुरे लोग शामिल होते हैं.
क्या भाजपा अपने ‘मिस्ड कॉल सदस्यता अभियान’ से ऐसे झंडा-बदल अभियानों को औपचारिक राजनीतिक चेहरा दे रही है? अगर उसकी अगुवाई वाली सरकार में अशोभनीय-असभ्य आचरण और बयान देनेवाले मंत्रियों-राज्यमंत्रियों की संख्या तेजी से बढ़ रही हो, अगर उसके संगठन में अल्पसंख्यकों को डराने-धमकानेवालों को वरीयता मिलती दिख रही हो, तो यह गर्व की बात है या चिंता की?
भारत को मात्रत्मकता की नहीं, गुणात्मकता की जरूरत है. हर क्षेत्र में और हर दिशा में. मात्रत्मकता हर समय नकारात्मक नहीं होती, पर वह गुणात्मकता की गारंटी तो नहीं ही हो सकती! जरूरत है मात्रत्मकता और गुणात्मकता के बीच संतुलन की. क्या भाजपा अपना कायांतरण ही नहीं, हृदयांतरण करने के लिए भी तैयार है?
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