व्यक्ति के हावी होने का खतरा

Published at :03 Apr 2015 5:28 AM (IST)
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व्यक्ति के हावी होने का खतरा

विश्वनाथ सचदेव वरिष्ठ पत्रकार नेतृत्व पर अतिनिर्भरता और अंधनिर्भरता, किसी भी राजनीतिक दल की ताकत नहीं, बल्कि कमजोरी ही कहलायेगी. इसका असर समूची व्यवस्था पर पड़ता है, समाज की सोच पर पड़ता है और यह असर नकारात्मक ही हो सकता है. कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी की रहस्यमयी ‘छुट्टी’ और आम आदमी पार्टी के […]

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विश्वनाथ सचदेव
वरिष्ठ पत्रकार
नेतृत्व पर अतिनिर्भरता और अंधनिर्भरता, किसी भी राजनीतिक दल की ताकत नहीं, बल्कि कमजोरी ही कहलायेगी. इसका असर समूची व्यवस्था पर पड़ता है, समाज की सोच पर पड़ता है और यह असर नकारात्मक ही हो सकता है.
कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी की रहस्यमयी ‘छुट्टी’ और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक केजरीवाल के स्वास्थ्य-लाभ के लिए छुट्टी पर जाने में यूं तो कोई रिश्ता नहीं है, लेकिन रिश्ता है भी. छुट्टियां मनाने अथवा इलाज के लिए छुट्टी पर जाने का हक किसी भी राजनेता को मिलना चाहिए. लेकिन राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल की छुट्टियां राजनीति का हिस्सा बन गयी हैं.
यानी उनकी छुट्टियों का असर उनकी राजनीति पर पड़ रहा है. कांग्रेस को अपने कल की चिंता होने लगी है और ‘आप’ का आज खतरे में पड़ गया है. राजनीति में, और राजनीतिक दलों में व्यक्ति-विशेष की महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता. पर सवाल उठता है कि किसी राजनीतिक दल में किसी एक व्यक्ति का इतना महत्वपूर्ण बन जाना जनतांत्रिक मूल्यों और आदर्शो की दृष्टि से कितना उचित है?
यूं तो आजादी से पहले भी पार्टी में नेताओं का महत्व हुआ करता था, पर आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी आदि नाम कुल मिला कर पार्टी का पर्याय ही बन गये. यह भी मात्र संयोग नहीं है कि ये सारे नाम एक परिवार से जुड़े हैं, लेकिन मुद्दा व्यक्तियों के दल पर हावी होने का है. कांग्रेस पार्टी में राहुल को ‘युवराज’ का दर्जा प्राप्त है.
उनकी सारी कमियों और विफलताओं के बावजूद कांग्रेस को उन्हीं में अपना भविष्य दिख रहा है, या फिर कुछ लोग प्रियंका गांधी में ज्यादा संभावनाएं देख रहे हैं. वह क्या विवशता है जो किसी पार्टी को किसी एक व्यक्ति पर इतना आश्रित बना देती है? वे कौन-से कारण हैं, जो किसी व्यक्ति को राजनीतिक दल में इतने अधिकार दे देते हैं कि वह स्वयं को सर्वेसर्वा मानने लगता है?
‘आप’ के राष्ट्रीय संयोजक केजरीवाल के व्यवहार को लेकर यह सवाल अधिक प्रासंगिक लगने लगा है. केजरीवाल दस दिन की छुट्टी पर गये और पार्टी का शीराजा बिखर गया!
राजनीति में नेता का महत्व होता है, राजनीतिक दलों में भी. लेकिन जिस तरह हमारी राजनीति पर व्यक्ति हावी होते जा रहे हैं, उसे देखते हुए यह सवाल उठना ही चाहिए कि जनतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों का आधार नीतियां और सिद्धांत होने चाहिए या व्यक्ति की लोकप्रियता? ‘अबकी बार मोदी सरकार’ अथवा ‘केजरीवाल पांच साल’ जैसे नारे पिछले चुनावों में बहुत उछले हैं. ये नारे क्या उस खतरे की ओर इशारा नहीं कर रहे, जो नेताओं को नीतियों से अधिक महत्वपूर्ण बना देता है? क्या यह तानाशाही के खतरे का संकेत नहीं है?
यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण ही रहा है कि पिछले तीन-चार दशकों में वैयक्तिक महत्वाकांक्षाएं सिद्धांतों पर हावी होती गयीं. इस दौरान बने अधिकांश क्षेत्रीय दल वैयक्तिक महत्वाकांक्षाओं का ही परिणाम थे. फिर व्यक्ति का स्थान परिवारों ने ले लिया. सिद्धांतों और नीतियों की राजनीति महज आदर्श बन कर रह गयी. जब-जब व्यक्ति दल पर हावी हुआ है, जनतंत्र के नाम पर तानाशाही तौर-तरीकों ने सिर उठाया है.
जनसंघ या भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टियों में यह प्रवृत्ति पहले नहीं थी. इन दलों की नीतियों से मतभेद हो सकता है, लेकिन जनतांत्रिक तौर-तरीके इन्हें कुछ अलग बनाये हुए थे. पर इनमें भी, खासकर भाजपा में, पिछले एक अरसे में जिस तरह किसी एक व्यक्ति का वर्चस्व हावी होता दिखा है, वह जनतांत्रिक मूल्यों के लिए एक खतरे की घंटी ही है. प्रधानमंत्री मोदी पार्टी के सर्वेसर्वा बनते जा रहे हैं, जिस तरह कभी कांग्रेस में इंदिरा गांधी हुआ करती थीं. जनतांत्रिक परंपराओं की कीमत पर इन नेताओं की विशेषताओं से सौदेबाजी आनेवाले कल के लिए अच्छा संकेत नहीं है.
क्षेत्रीय दलों के संदर्भ में हम इस स्थिति के बनने और उसके परिणाम लगातार देखते आ रहे हैं. इस बीमारी का राष्ट्रीय दलों तक पहुंचना बाढ़ के पानी का खतरे के निशान तक पहुंचना है. इसीलिएकिसी राहुल या किसी केजरीवाल की ‘छुट्टी’ के संदर्भ में उठे सवाल और उनसे उपजी स्थितियां विचारणीय बन जाते हैं.
पार्टी में नेतृत्व की महत्ता असंदिग्ध है. नेतृत्व पर अतिनिर्भरता और अंधनिर्भरता, किसी भी राजनीतिक दल की ताकत नहीं, बल्कि कमजोरी ही कहलायेगी. इसका असर समूची व्यवस्था पर पड़ता है, समाज की सोच पर पड़ता है और यह असर नकारात्मक ही हो सकता है.
किसी भी दल मे कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना ही उपयोगी या महत्वपूर्ण क्यों न हो, दल से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकता, नहीं होना चाहिए. ऐसा होना या होते हुए दिखना खतरे की घंटी है. इस घंटी की आवाज को अनसुना करने का अर्थ स्वयं अपनी अक्षमता और नासमझी का उदाहरण पेश करना है. और यह उदाहरण शर्मनाक होगा.
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