सब बदल जाने से पहले गांव हो लूं

Published at :25 Mar 2015 5:32 AM (IST)
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सब बदल जाने से पहले गांव हो लूं

कुमार राहुल प्रभात खबर, भागलपुर मेरे मन में एक गांव अब भी बसा है, जो गाहे-बगाहे मुङो हंसाता है, रुलाता है. हम चाह कर भी उसे नहीं भूल पाते. मन के किसी कोने में शैतान बच्चे की तरह दुबका, एक आंख से देखता यह गांव दुर्गा पूजा, छठ, होली से गुलजार है. दुर्गा पूजा है, […]

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कुमार राहुल

प्रभात खबर, भागलपुर

मेरे मन में एक गांव अब भी बसा है, जो गाहे-बगाहे मुङो हंसाता है, रुलाता है. हम चाह कर भी उसे नहीं भूल पाते. मन के किसी कोने में शैतान बच्चे की तरह दुबका, एक आंख से देखता यह गांव दुर्गा पूजा, छठ, होली से गुलजार है. दुर्गा पूजा है, तो नाटक है.

होली है, तो नाटक के पात्र हैं. ऐसे पात्र जो गांव को गांव बनाये रखते हैं. मैं पहले दशहरा में होने वाले नाटकों में राजा बन जाता था, तो कभी चोर. कभी डकैत बन जाता था, तो कभी सिपाही. कभी आंदोलन छेड़ कर व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की बात करता था. पर अब मैं कुछ भी नहीं बन पाता. मैं खुद के द्वारा बनाये गये खोल में दुबक गया हूं. पर मन में बसा यह छोटे शैतान बच्चे-सा गांव पता नहीं क्यों इस बार बेसब्री से बुला रहा है मुङो.

वैसे तो गांव के बारे में आधी-अधूरी जानकारी मिलती रहती है. पता चला है कि जो भौजी बिना घूंघट के घर से बाहर नहीं निकलती थीं, वह जनप्रतिनिधि बन गयी हैं. स्वच्छता अभियान चला रही हैं. मुङो गांव में स्वच्छता अभियान चलाने की बात सुनते ही श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी उपन्यास की याद आ जाती है. गांव की पगडंडी से सुबह-शाम चलना मतलब दर्जनों लोगों से ‘सलामी’ लेना.. मैं देखना चाहता हूं कि स्वच्छता अभियान के बाद क्या यह दृश्य जिंदा है? गरमी में मुङो शीतलपाटी की बरबस याद आ जाती है. पता चला है कि जिस चौर (गीली जमीन वाला क्षेत्र) की कृपा से शीतलपाटी मिल जाया करती थी, वहां से एनएच गुजरने लगा है.

बगल में मॉल खुलने की बात भी किसी ने बतायी थी. मॉल खुलने की बात से मुङो रामलगन सब्जी वाले, पाठक काका की सब कुछ एक ही जगह मिलने वाली दुकान, बिजली पान दुकान, पाहीवाले की आटा चक्की और कमला पुल से सटे नाचनेवाले (नटुआ) मोची की याद आ जाती है. यह भी याद आती है कि कैसे छोटी लाइन की ट्रेन गायब होने लगी और अब इस धंसती हुई पटरी पर बुलेट ट्रेन दौड़ेगी! वैसे तो मन में बसे गांव में एक नदी भी है, जो कभी कल-कल बहती थी, लेकिन मेरे मन की तरह यह नदी भी मरने लगी है.

नदी होना एक पूरी सभ्यता का आबाद होना है. पर दूसरे रूप में सोचें तो मन की धारा उस नदी की तरह तो है ही जो बार-बार कमला-कोसी के रूप में निरंतर बहती रहती है और यही निरंतरता मुङो गांव से जोड़े रखती है. वैसे पता चला है कि गांव के किसानों के लिए दिल्ली-पटना ने कई योजनाओं की घोषणा कर दी है. इससे गांव ‘नदिया के पार’ टाइप से बदल कर ‘दिल वाले दुलहनिया ले जायेंगे’ टाइप हो जायेगा. सरकार ने गांव बदलने के लिए कमर कस ली है. अब पलटू बाबू रोड नहीं, वाया बाइपास गांव पहुंचना होगा. सोचता हूं कि एक बार गांव हो आऊं और ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ नाटक जरूर खेलूं.

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