लाल नाक लगती है खतरे का सिगनल

Published at :13 Mar 2015 5:52 AM (IST)
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लाल नाक लगती है खतरे का सिगनल

सत्य प्रकाश चौधरी प्रभात खबर, रांची बदलते मौसम में जुकाम हो जाना आम है. और जो आम है उसकी चपेट में आम आदमी को आना ही है, सो रुसवा साहब भी कैसे बचते? पिछली बार उन्होंने खद्दर का कुरता सिलवाया तो कुछ कपड़ा बच गया था. खांटी हिंदुस्तानी जब बासी रोटी बर्बाद नहीं होने देता, […]

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सत्य प्रकाश चौधरी
प्रभात खबर, रांची
बदलते मौसम में जुकाम हो जाना आम है. और जो आम है उसकी चपेट में आम आदमी को आना ही है, सो रुसवा साहब भी कैसे बचते? पिछली बार उन्होंने खद्दर का कुरता सिलवाया तो कुछ कपड़ा बच गया था. खांटी हिंदुस्तानी जब बासी रोटी बर्बाद नहीं होने देता, तो भला कपड़ा कैसे जाया होने दे.
उन्होंने बचे हुए कपड़े से दो रूमाल बनवा लिये. नाक से बहती अविरल धारा हो और रूमाल खद्दर का हो, तो नतीजा क्या होना है यह अंदाजा आप लगा सकते हैं. रूमाल की रगड़ से छिल कर टमाटर जैसी लाल हुई नाक लेकर वह ‘आप की दुकान’ पर पहुंचे. लाल नाक ने खतरे के सिगनल का काम किया और पान-प्रेमियों का जमावड़ा वहां से काई की तरह फटने लगा. पप्पू पनवाड़ी दुकान के मालिक हैं इसलिए मजबूर थे, नहीं तो शायद वह भी निकल लेते.
रुसवा साहब कुछ समझ पाते कि इससे पहले ही पप्पू ने टोक दिया, ‘‘चचा, ऐसे में कोई घर से बाहर निकलता है? चेकअप वगैरह कराये कि नहीं?’’ अब रुसवा साहब उखड़ गये, ‘‘आखिर मुङो हुआ क्या है जो अस्पताल जाऊं?.. जरा सा जुकाम हुआ है और तुम लोग ऐसे कर रहे हो जैसे मुङो प्लेग हो गया हो.’’ पप्पू ने उनके सामने अखबार पटक दिया जिसके पहले पóो पर बड़े-बड़े हर्फो में खबर थी- ‘राज्य में स्वाइन फ्लू से तीन की मौत’. रुसवा साहब ने बात बदलने की कोशिश की, बोले- ‘‘अच्छो छोड़ो ये सब. जुकाम है इसलिए जर्दा थोड़ा हल्का ही रखना.’’
लेकिन पप्पू आसानी से छोड़ने के मूड में नहीं थे, ‘‘इसे हल्के में मत लीजिए. स्वाइन फ्लू और आम जुकाम में फर्क पता नहीं चलता.’’ रुसवा साहब चिढ़ से गये, ‘‘जब से स्वच्छता अभियान चला है, स्वाइन फ्लू भी ज्यादा ही फैल रहा है. ई मोदी हम लोगों का दीन-धरम भी ले बीतेगा. टीबी, कैंसर कुछ हो जाये, पर स्वाइन फ्लू न हो.’’
पप्पू हैरानी में पड़ गये, ‘‘इसमें धरम की बात कहां से आ गयी?’’ ‘‘मियां स्वाइन फ्लू के मानी हुए सूअर को होनेवाला जुकाम. और हम लोग तो सूअर का नाम लेना भी हराम समझते हैं, उसका जुकाम लेना तो दूर की बात है’’, रुसवा साहब ने समझाते हुए कहा. अब चिढ़ने की बारी पप्पू की थी, ‘‘ये हराम-हलाल का फेरा छोड़िए और किसी डॉक्टर के पास जाइए.’’ रुसवा साहब ने अब वो मुसकान ओढ़ ली जो उनके चेहरे पर तब आती है जब वह सामनेवाले को नादान समझ कर माफी देने के मूड में होते हैं.
उन्होंने फरमाया, ‘‘बेटा पप्पू! टीवी-अखबार की छोड़ो. तुम्हारे मोहल्ले, दोस्ती-यारी, खानदान-रिश्तेदार में कोई स्वाइन फ्लू से मरा क्या?’’ पप्पू ने न में सिर हिलाया. रुसवा साहब बोले, ‘‘यही तो! अमरीकावाले ई सब हाय-तौबा मचवा रहे हैं, ताकि दवा बेच कर माल पीट सकें.’’ पप्पू ने कहा, ‘‘बात तो ठीक लग रही है आपकी, पर आप मियां लोग हर चीज का इल्जाम अमरीका पर ही डाल देते हैं!’’ अब रुसवा साहब की मुस्कान और चौड़ी हो गयी.
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