सब्र का बांध टूटने का नतीजा

अनुज कुमार सिन्हा वरिष्ठ संपादक प्रभात खबर लोगों के मन में यह विश्वास जमाना होगा कि अगर कोई गड़बड़ी करता है, कानून तोड़ता है, तो इसके लिए उसे सजा अवश्य मिलेगी. अगर दीमापुर की घटना से सीख नहीं ली, तो भविष्य में देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसी गड़बड़ियों से इनकार नहीं किया जा […]
अनुज कुमार सिन्हा
वरिष्ठ संपादक
प्रभात खबर
लोगों के मन में यह विश्वास जमाना होगा कि अगर कोई गड़बड़ी करता है, कानून तोड़ता है, तो इसके लिए उसे सजा अवश्य मिलेगी. अगर दीमापुर की घटना से सीख नहीं ली, तो भविष्य में देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसी गड़बड़ियों से इनकार नहीं किया जा सकता.
दीमापुर में सात-आठ हजार छात्रों-युवाओं की भीड़ द्वारा जेल का गेट तोड़ कर दुष्कर्म के आरोपी को निकाल कर वीभत्स तरीके से मार डालना कोई सामान्य घटना नहीं है. इन युवाओं के अंदर आक्रोश इतना ज्यादा था कि दुष्कर्म के आरोपी युवक को पहले नंगा किया, फिर लाठी से पीटा, पत्थर मारा, चार-पांच किलोमीटर तक रस्सी से बांध कर घसीटा. फिर फंदे से लटका दिया.
इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि इस भीड़ में 17 से 20 साल के स्कूली छात्रों की संख्या सबसे ज्यादा थी. एक महिला के साथ दुष्कर्म की घटना के बाद ये सभी उत्तेजित थे और किसी भी हाल में आरोपी को सजा देना चाहते थे. इसी क्रम में कानून को इन्होंने अपने हाथ में लिया. इस घटना के कई और कारण भी हो सकते हैं. संभव हो कि इन युवाओं-छात्रों के अंदर पहले से किसी गंभीर मामले को लेकर आक्रोश रहा हो और इस घटना ने उस आक्रोश की आग में घी का काम किया.
दुष्कर्म की घटना के बाद किसी भी समूह का गुस्से में आना, उत्तेजित होना स्वाभाविक है. लेकिन कानून को हाथ में लेने को भी किसी भी हाल में सही नहीं ठहराया जा सकता. भीड़ ने आरोपी को खुद दंडित करने का कदम शायद इसलिए उठाया, क्योंकि हमारे देश में न्याय मिलने में विलंब होता है. वर्षो लग जाते हैं. इस बीच दुष्कर्म की पीड़िता हर दिन घुट-घुट कर मरती है. व्यवस्था इतनी चौपट है कि कानूनी पेचीदगियों के कारण दुष्कर्मी बच भी जाते हैं. दिल्ली के निर्भया कांड के दोषियों का बयान देखिए, तो पता चलेगा कि उन्हें घटना का अफसोस भी नहीं है. ऐसे बयान से समाज में यही संदेश जाता है कि दुष्कर्मी को जिंदा रहने का हक नहीं है.
देश की अदालतों में तीन करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं. हाइकोर्ट की बात करें, तो 31 हजार से ज्यादा दुष्कर्म के मामले लंबित हैं. इन मामलों पर फैसले आने में वर्षो लगेंगे. 2012 में चलती बस में निर्भया (नाम सांकेतिक) के साथ दुष्कर्म हुआ था (बाद में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गयी थी), पूरे देश में एक साथ आवाज उठी थी.
कड़े कानून बने, लेकिन घटनाएं नहीं कम हुईं. उसी दौरान सरकार ने फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए अतिरिक्त राशि दी. 318 फास्ट ट्रैक कोर्ट भी बने, लेकिन यह भी कम पड़ा. हाल में एक रिपोर्ट आयी है कि दिल्ली में हर दिन दुष्कर्म की तीन घटनाएं घट रही हैं. यानी दुष्कर्मी सुधर नहीं रहे हैं और कानून भी उनका कुछ बिगाड़ नहीं पा रहा है.
दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है, इसलिए वहां घटी घटनाएं खबर बन जाती हैं. उस पर पूरे देश का ध्यान चला जाता है. लेकिन हर दिन देश के दूर-दराज के इलाकों में दुष्कर्म की हजारोंे घटनाएं घट रही हैं, लेकिन कोई चर्चा नहीं होती. दीमापुर जल रहा है, लेकिन दिल्ली में वह मुद्दा नहीं बन पाया है. यह बड़ा मुद्दा है. युवाओं के अंदर बदले की जो भावना बढ़ रही है, उसका नतीजा है यह घटना.
इस पूरे मामले में एक और कारण उभर कर आया है. वह है आरोपी की पहचान को लेकर. घटना के दिन यह अफवाह फैल गयी कि दुष्कर्म का आरोपी बांग्लादेशी है. इसके पहले कि पुलिस चेतती, सोशल मीडिया ने अपना ‘कमाल’ दिखा दिया. दीमापुर नगालैंड का एकमात्र बड़ा इलाका है, जहां बिना इनर लाइन परमिट के रहा जा सकता है, इसलिए वहां नगा समुदाय के अलावा भी लोग रहते हैं. मूल निवासी नगा या तो कृषि काम में लगे रहते हैं या फिर सेना में. जबकि व्यापार पर मुसलिम समुदाय हावी है. असम की सीमा पर स्थित होने के कारण वहां बांग्लादेशी भी हैं. इसे वहां आइबीआइ (अवैध बांग्लादेशी प्रवासी) कहते हैं.
नगालैंड के मूल निवासियों में आइबीआइ के प्रति गुस्सा रहता है. उन्हें लगता है कि अगर ये नहीं रहें या फिर सरकार इनके व्यापार का लाइसेंस रद्द कर दे, तो नगालैंड के मूल निवासियों को बड़ी संख्या में रोजगार मिल सकता है. वहां बेरोजगारी भी बढ़ी है. जिस भीड़ ने हमला किया, उसमें युवाओं की संख्या ज्यादा थी. इसलिए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अपने भविष्य को लेकर जो युवा चिंतित हैं, एक घटना से उनका गुस्सा फूट पड़ा. जब तक पता चलता कि मारा गया युवा बांग्लादेशी नहीं, असम का निवासी था, तब तक स्थिति हाथ से निकल चुकी थी.
अब समय आ गया है कि ऐसी समस्याओं के निदान के लिए कोई ठोस रास्ता निकाला जाये. अगर दुष्कर्म के आरोपियों के बचते रहने से लोगों के मन में आक्रोश है, अदालतों के चक्कर काटते-काटते थक जाने से लोगों में गुस्सा है, व्यवस्था में कमियां हैं, तो इन कमियों को दूर करना होगा.
लोगों के मन में यह विश्वास जमाना होगा कि अगर कोई गड़बड़ी करता है, कानून तोड़ता है, तो इसके लिए कड़े कानून हैं और दोषियों को सजा अवश्य मिलेगी, समय पर मिलेगी. अगर दीमापुर की घटना से सीख नहीं ली, तो भविष्य में देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसी गड़बड़ियों से इनकार नहीं किया जा सकता.
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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