‘आप’ की कलह से जन भरोसे को धक्का

दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीतनेवाली ‘आप’ आज एक दोराहे पर खड़ी है. पार्टी के कार्यकर्ता और हमदर्दो के मन में प्रश्न कौंध रहा है कि क्या ‘आप’ भी अन्य पार्टियों की तरह राजनीतिक सत्ता पाने का एक औजार भर रहेगी; ऐसा औजार, जो अपने चंद नेताओं की मनमर्जी से चलेगी, या […]
जहां पार्टी के सांसद भगवंत मान ने दोनों को पार्टी से ही निकालने की मांग की है, वहीं अरविंद केजरीवाल के करीबी माने जानेवाले चंद प्रमुख नेताओं ने बयान जारी कर दोनों पर नये सिरे से कुछ आरोप लगाये हैं- दोनों ने कार्यकतरओ को दिल्ली में चुनाव प्रचार से रोका, लोगों को चंदा देने से मना किया, पार्टी की हार चाही, केजरीवाल की छवि खराब करने के लिए नकारात्मक खबरें छपवायीं. योगेंद्र यादव का यह प्रतिप्रश्न सही है कि अगर वे पार्टी विरोधी कामों में लगे थे, तो पार्टी के भीतर मौजूद ‘लोकपाल’ से इसकी जांच क्यों नहीं करायी गयी? बहरहाल, पार्टी में जारी कलह से असल घाटा पार्टी पर बने भरोसे को हो रहा है. सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार को खत्म करने के वादे से इस पार्टी का जन्म हुआ था.
मौजूदा घमासान 1970 और 1980 के दशक के आखिरी वर्षो की याद दिला रहा है, जब विविध धाराओं के लोग भ्रष्टाचार खत्म करने का एजेंडा लेकर एक मंच पर आ तो गये थे, पर आपसी कलह में देश की राजनीति को कोई वैकल्पिक दिशा नहीं दे सके. योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण पार्टी को विचारधारागत आधार देनेवाले चेहरे हैं, जिनसे पीछा छुड़ाना विकल्प की जवाबदेही से पीछा छुड़ाने जैसा होगा. उम्मीद करनी चाहिए कि आप इस कलह से जल्द उबरेगी, वरना विकल्प की राजनीति की भ्रूणहत्या अगले बहुत सालों तक ‘आप’ सरीखे प्रयोगों पर लोगों का भरोसा कायम न होने देगी.
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