वित्तीय घाटे के भ्रम से बचना होगा
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :10 Mar 2015 5:00 AM (IST)
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डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री वित्त मंत्री अरुण जेटली को चाहिए कि वे बजट में वित्तीय घाटे के नियंत्रण की बात कह कर जनता को भ्रमित न करें. वे यह बतायें कि कितनी रकम उन्होंने स्वयं अजिर्त की और कितना बोझ उन्होंने पिछली व अगली पीढ़ियों पर डाला. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सरकार के वित्तीय […]
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डॉ भरत झुनझुनवाला
अर्थशास्त्री
वित्त मंत्री अरुण जेटली को चाहिए कि वे बजट में वित्तीय घाटे के नियंत्रण की बात कह कर जनता को भ्रमित न करें. वे यह बतायें कि कितनी रकम उन्होंने स्वयं अजिर्त की और कितना बोझ उन्होंने पिछली व अगली पीढ़ियों पर डाला.
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सरकार के वित्तीय घाटे को 4.1 प्रतिशत के लक्ष्य पर सीमित करने में सफलता पायी है. सरकार की कुल वसूली तथा खर्च के अंतर को वित्तीय घाटा कहा जाता है. इसमें पूंजी तथा राजस्व खाते दोनों शामिल होते हैं.
सार्वजनिक इकाइयों के शेयर बेच कर प्राप्त हुई रकम पूंजी खाते में गिनी जाती है, जबकि टैक्स की वसूली से प्राप्त रकम राजस्व खाते में गिनी जाती है.
इन दोनों स्नेतों से मिली रकम सरकार की कुल प्राप्ति हुई. इस रकम से अधिक खर्च करने के लिए सरकार ऋण लेती है. ऋण की यह मात्र ही वित्तीय घाटा कहलाती है. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वित्तीय घाटा नियंत्रण में आ जाये, तो अर्थव्यवस्था चल निकलती है. लेकिन, मेरी दृष्टि में वित्तीय घाटे का मानदंड भ्रामक है. जैसे यदि परिवार के लोग पुरखों द्वारा विरासत में दी गयी प्रॉपर्टी को बेच कर ‘विदेश’ यात्रा पर जायें, तो विकास लगता है, लेकिन वास्तव में वह ह्रास होता है.
वित्तीय घाटा एक छलावा है. असल मानदंड राजस्व घाटा होता है. परिवार में वेतन या दुकान से मिली आय और भोजन-पानी पर किया गया खर्च राजस्व या चालू खाता कहा जाता है. जिस परिवार की चालू आय अधिक और चालू खर्च कम है, वह सुदृढ़ है. जैसे आपने दुकान से साल में 5 लाख रुपये कमाये और 3 लाख घरेलू खर्च में उपयोग किये.
शेष 2 लाख आपका चालू खाता प्रॉफिट है. पुरखों द्वारा दी गयी जमीन या मकान को बेच कर आराम का जीवन जिया जाता है. ऋण लेकर टीवी खरीदा जाये, तो भी ऐसी ही स्थिति बनी रहती है. जमीन बेचने में हम पिछली पीढ़ियों की कमाई का भक्षण करते हैं, जबकि ऋण लेने में हम आगे की पीढ़ियों की कमाई का भक्षण करते हैं.
यही फॉमरूला देश के बजट पर लागू होता है. चालू खाते में सरकार द्वारा वसूली गयी टैक्स की रकम तथा कर्मियों के वेतन, ब्याज, सेना के रख-रखाव आदि पर किया गया खर्च आता है. पूंजी खाते में विनिवेश और निवेश आता है. पिछली सरकारों द्वारा चालू खाते में धन कमा कर पूंजी खाते में निवेश किया गया था.
अब सरकार पूर्व में बनायी गयी पूंजी को बेच कर भक्षण कर रही है. वित्तीय घाटे में चालू तथा पूंजी खातों में आय तथा व्यय का सम्मिलित ब्योरा लिखा जाता है. अत: सरकार यदि टैक्स कम वसूल करे और पुरखों द्वारा दी गयी कंपनियों के शेयर बेच कर ज्यादा कमाये, तो भी वित्तीय घाटा नियंत्रण में रहता है. जैसे वित्त मंत्री ने पुरखों द्वारा दी गयी सार्वजनिक कंपनियों को बेच दिया और मिली रकम से ओबामा का सत्कार किया, तो इसे अच्छा माना जायेगा. यह निकृष्ट नीति हुई. आज के वित्तीय विचार में पुरखों की कमाई का भक्षण उचित, लेकिन अगली पीढ़ियों की कमाई का भक्षण अनुचित माना जाता है. मेरा स्पष्ट मत है कि दोनों कमाई का भक्षण निकृष्ट है. अत: विनिवेश करके वित्तीय घाटे को नियंत्रण में करना निकृष्ट नीति है.
अब ऋण पर विचार करें. एक कंपनी ऋण लेकर फैक्ट्री में निवेश करती है, लाभ कमाती है और ऋण की अदायगी करती है. ऐसा ऋण लाभप्रद है. लेकिन दूसरी कंपनियों की चाल अलग होती है. उत्तराखंड के श्रीनगर में जलविद्युत संयत्र एक निजी कंपनी द्वारा लगाया जा रहा है. कंपनी ने सरकारी बैंकों से लगभग 3,000 करोड़ रुपये का ऋण लिया है. परंतु, कंपनी ने घटिया माल का प्रयोग कर रकम का गबन कर लिया. पूंजी खाते में ली गयी रकम का रिसाव हो गया. इससे चालू खर्चो को पोषित किया गया. अत: ऋण का असल प्रश्न खर्च की गुणवत्ता का है. ऋण लेकर सुखर्च किया जाये तो उत्तम, कुखर्च किया जाये तो अधम.
वित्त मंत्री खर्च की गुणवत्ता की बात कम और वित्तीय घाटे की मात्र की बात ज्यादा करते हैं. ऋण लेकर सरकारी कर्मियों को पेंशन तथा डीए देने को वे अच्छा मानते हैं. कम ऋण लेकर कम मात्र की बरबादी करना क्या अच्छी बात है? इस निकृष्ट नीति का वे अनकहे ही गुणगान करते हैं, चूंकि खर्चो की गुणवत्ता पर वे चुप्पी साधे बैठे रहते है.
पहली बात है कि पुरखों द्वारा दी गयी संपत्ति को बेच कर वित्तीय घाटा कम किया जा सकता है. दूसरी बात सरकारी खर्च की गुणवत्ता का खुलासा नहीं किया जाता है. वित्त मंत्री को चाहिए कि बजट में वित्तीय घाटे के नियंत्रण की बात कह कर जनता को भ्रमित न करें. वे बताएं कि कितनी रकम उन्होंने स्वयं अजिर्त की और कितना बोझ पिछली तथा अगली पीढ़ियों पर डाला. दूसरे, खर्चो के अर्थव्यवस्था पर पड़नेवाले प्रभाव का आकलन होना चाहिए.
31 मार्च के पहले सरकारी विभाग बजट को खर्च करने को अपनी उपलब्धि मानते हैं. जैसे पहले तालाब खोदा फिर उसे पाट दिया, तो बजट का उपयोग हो गया. जबकि खर्चो के प्रभाव का आकलन कर उसे देश के सामने प्रस्तुत करना चाहिए. फिर भी वित्त मंत्री को बधाई कि उन्होंने नोट छाप कर वोट खरीदने की यूपीए की नीति को त्याग कर, बढ़ते वित्तीय घाटे पर अंकुश लगाया है.
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