सत्ता व भ्रम के बीच केजरीवाल

Published at :09 Mar 2015 3:39 AM (IST)
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सत्ता व भ्रम के बीच केजरीवाल

एमजे अकबर प्रवक्ता, भाजपा पिछली बार पद छोड़ने की याद अब भी बाकी है. उनके पास अच्छे शासन का कोई इतिहास नहीं है. मतदाताओं को बदली परिस्थितियों में बढ़िया शासन चाहिए. केजरीवाल के पास अच्छा काम करके दिखाने का कोई विकल्प नहीं है. बगैर किसी जवाबदेही के सत्ता लगभग राजनीतिक निर्वाण के समान होती है. […]

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एमजे अकबर
प्रवक्ता, भाजपा
पिछली बार पद छोड़ने की याद अब भी बाकी है. उनके पास अच्छे शासन का कोई इतिहास नहीं है. मतदाताओं को बदली परिस्थितियों में बढ़िया शासन चाहिए. केजरीवाल के पास अच्छा काम करके दिखाने का कोई विकल्प नहीं है.
बगैर किसी जवाबदेही के सत्ता लगभग राजनीतिक निर्वाण के समान होती है. शुद्ध पलायनवाद से अधिक आकर्षक भला और क्या चीज हो सकती है? हालांकि, इसका एक बड़ा उदाहरण सामान्य दृष्टि से छुपा हुआ प्रतीत हो रहा है, लेकिन सच यह है कि हमारी तरह के लोकतंत्र में यह एक आम बात नहीं है. राजनेताओं का काम ही सत्ता पाने की कोशिश करना है, लेकिन वे यह भी बखूबी जानते हैं कि सत्ता के सुख के साथ धातु का तेज धार का तार भी जुड़ा होता है, जिसका नाम उत्तरदायित्व है.
एक दूसरा लक्षण अधिक सामान्य है. कुछ राजनेता जवाबदेही का तब त्याग कर देते हैं, जब उन्हें यह अहसास होता है कि उन्हें मिला हुआ काम अपने बारे में उनकी समझ से कमतर है; कि वे किसी और बड़े काम के लिए बने हैं, और किसी प्रतीक्षा-कक्ष में जीवन व्यतीत कर देने का कोई मतलब नहीं है. ऐसा ही कुछ दिल्ली के उग्र मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ होता दिखाई देता है. दिल्ली उनके सम्मान से कमतर है. उनकी नजर में दिल्ली का मुख्यमंत्री किसी नगरपालिका के अध्यक्ष से अधिक कुछ भी नहीं है, और इसीलिए उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया उनका प्रभार संभालें, और सर्वोच्च नेता अपने फेफड़ों को आराम दे तथा अपने स्वाभिमान के मुताबिक अगले आम चुनाव में किसी संभावित गंठबंधन के नेता के रूप में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गंठबंधन को चुनौती दे सकें. जो भी व्यक्ति इस धारणा पर सवाल उठायेगा, उसे बाहर का दरवाजा दिखा दिया जायेगा.
प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव आम आदमी पार्टी में अरविंद केजरीवाल के वरिष्ठतम सहयोगी हैं. बराबरों में पहलेवाले मुहावरे की तरह केजरीवाल भी थे, लेकिन ऐसा तभी तक था, जब तक यह उनके रणनीतिक उद्देश्यों के अनुरूप था. यह सहिष्णुता दिल्ली विधानसभा चुनावों में जीत के साथ ही समाप्त हो गयी.
लेकिन, इसमें कुछ और गहन बातें भी हैं. भूषण और यादव ने सामूहिक नेतृत्व को वजनदार बनाने में बड़ी भूमिका निभायी, उन्होंने सत्यनिष्ठा के एकमात्र स्नेत और अभिभावक के रूप में केजरीवाल को स्वयं को आगे करने की इच्छा को बाधित किया. आखिरकार, यही बड़े पुरस्कारों के केजरीवाल के दावे का आधार बनेगा. जब तक भूषण और यादव भी केंद्र में बने रहेंगे, केजरीवाल को गौरव में उनको भी हिस्सा देना होगा. इसलिए केजरीवाल ने दिल्ली चुनाव की जीत के साथ ही अपने प्रतिद्वंद्वियों को कमतर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी.
भूषण और यादव ने जो सवाल उठाये हैं, वे सार्वजनिक विमर्श से गायब नहीं होंगे. केजरीवाल के विरुद्ध उनके आरोप स्वेच्छाचार और सत्यनिष्ठा से जुड़े हैं. केजरीवाल पहली बात के साथ राजनीति में बने रह सकते हैं, लेकिन दूसरी बात से उनका नाता नहीं रह सकेगा. जब भूषण और यादव ने संदेहास्पद होने के बावजूद, भले ही वे खुले तौर पर चालबाजी नहीं प्रतीत होते हों, 50-50 लाख के चार हुंडियों के पार्टी द्वारा स्वीकार करने के तौर-तरीकों पर जब सवाल उठाया था, तो वे केजरीवाल के कथित प्रभामंडल को आभाहीन कर रहे थे.
जब उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्यों केजरीवाल ने उस विधायक को अलग नहीं किया, जिसने फिल्मी खलनायक की तरह मतदाताओं को लुभाने के लिए बड़ी मात्र में शराब बांटी थी, तब वे केजरीवाल को समझौते के लिए तैयार किसी अन्य राजनेता की तरह ही होने का आरोप लगा रहे थे. उन्होंने आलमारी खोली और उसमें छुपा कर रखा हुआ ‘नर-कंकाल’ बहुत जल्दीबाजी में बाहर आ गया.
भूषण और यादव को षडय़ंत्रकारी कह कर निंदित करने का रवैया स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रहा है. समस्या यह है कि प्रशांत भूषण अपनी प्रवृत्ति से ऐसे व्यक्ति नहीं हैं, न ही वे केजरीवाल को हटाने के लिए बेचैन हैं. वे और यादव बस इतना चाहते हैं कि उनकी पार्टी उन सिद्धांतों पर चले, जिनके आधार पर वह यहां तक पहुंची है, इनमें सामूहिक नेतृत्व भी शामिल है. अगर वे षडय़ंत्रकारी होते, तो वे इन सवालों को दिल्ली चुनाव के प्रचार के दौरान उठा कर पार्टी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते. बिडंबना है कि आप के भीतर केजरीवाल को समर्थन सिर्फ दिल्ली समूह से मिल रहा है. बिडंबना यह भी है कि केजरीवाल को अपने अभिमानी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं के लिए दूसरों की जरूरत होगी.
अभी तो नहीं, पर उनका बड़ा कदम यह होगा कि वे इस्तीफा देंगे और सिसोदिया उनकी जगह लेंगे. वे बड़े सिद्धांतों की बात करेंगे, परंतु उन्हें सावधान रहना होगा. पिछली बार पद छोड़ने की याद अब भी बाकी है. उनके पास अच्छे शासन का कोई इतिहास नहीं है. मतदाताओं को बदली परिस्थितियों में बढ़िया शासन चाहिए. अच्छा काम करके दिखाने का कोई विकल्प नहीं है. बाकी सब भ्रम के अलावा कुछ नहीं.
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