विलुप्त होने को हैं जनजातीय भाषाएं
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :23 Feb 2015 5:35 AM (IST)
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भाषा को मानव सभ्यता का सबसे अनमोल सृजन माना जाता है. इसकी उत्पत्ति व विकास मानव सभ्यता की जीवंत गाथा का परिचायक है. विश्व के विभिन्न भागों में बसते हुए, सामाजिक जीवन की शुरुआत करते समय, हमारे पूर्वजों ने अपनी गूढ़ समस्याओं का हल निकालने व अपनी सामाजिक व्यवस्था को पुष्ट करने के लिए, विभिन्न […]
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भाषा को मानव सभ्यता का सबसे अनमोल सृजन माना जाता है. इसकी उत्पत्ति व विकास मानव सभ्यता की जीवंत गाथा का परिचायक है. विश्व के विभिन्न भागों में बसते हुए, सामाजिक जीवन की शुरुआत करते समय, हमारे पूर्वजों ने अपनी गूढ़ समस्याओं का हल निकालने व अपनी सामाजिक व्यवस्था को पुष्ट करने के लिए, विभिन्न प्रकार की ध्वनियों को रूढ़ रूप प्रदान करते हुए उन्हें एक सूत्र मे पिरो कर भाषा को एक स्वरूप दिया. दुनिया में कई भाषाओं ने खुद को श्रेष्ठ साबित करते हुए दुनिया भर में अपने पांव पसारे, वहीं सैकड़ों भाषाएं विलुप्त हो गयीं.
भाषा संस्कृति का स्वत:स्फूर्त वाहक होती है. अत: स्वाभाविक रूप से इन भाषाओं के क्षय के साथ ही धरती की अनमोल धनस्वरूपा संस्कृति का क्षय भी हुआ. मानव सभ्यता की इस बड़ी क्षति की भरपाई असंभव है. इसी कारण यूनेस्को ने नवंबर 1999 से संसार की मातृभाषाओं को संरक्षण देने का सराहनीय प्रयास किया है. 21 फरवरी, 1952 को अपनी मातृभाषा के रक्षार्थ शहीद हुए बांग्लादेश के छात्रों के सम्मान मे उक्त दिन को विश्व मातृभाषा दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया, जिसके दूरगामी परिणाम आज हमारे सामने है. संसार की जनजातीय भाषाओं के संग्रह ‘भाषा वसुधा’ में चार हजार से अधिक जनभाषाओं का अध्ययन किया गया है.
सितंबर, 2013 मे वड़ोदरा में यूनेस्को, इग्नू एवं ऑक्सफोर्ड विवि के संयुक्त प्रयास से हमारे देश की जनभाषाओं के संरक्षण के लिए व्यापक कार्यशाला का आयोजन इसी लिए किया गया एक और सराहनीय प्रयास था. इसके बावजूद झारखंड में असुर, मालतो, पहाड़िया, कोरवा, कुड़मालि, बिरहोर जैसी कई भाषाएं विलुप्त होने को हैं.
महादेव महतो, बोकारो
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