विचार में बदलाव या महज चतुराई!

Published at :20 Feb 2015 6:34 AM (IST)
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विचार में बदलाव या महज चतुराई!

उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली में भारी चुनावी-हार और देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को खराब करते बयानों की बौछार के दबाव में आये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इतना तो करना ही था, जो उन्होंने ईसाई समुदाय के एक सम्मेलन में पिछले दिनों किया. ईसाई समुदाय के एक समारोह में 17 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने […]

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उर्मिलेश
वरिष्ठ पत्रकार
दिल्ली में भारी चुनावी-हार और देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को खराब करते बयानों की बौछार के दबाव में आये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इतना तो करना ही था, जो उन्होंने ईसाई समुदाय के एक सम्मेलन में पिछले दिनों किया.
ईसाई समुदाय के एक समारोह में 17 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐलान किया कि उनकी सरकार धार्मिक कटुता और हिंसा फैलानेवालों को बर्दाश्त नहीं करेगी, चाहे वे बहुसंख्यक हों या अल्पसंख्यक. उसी दिन से समाज के विभिन्न हिस्सों में उनके भाषण की व्याख्या अपने-अपने ढंग से की जा रही है.
इस पर उदारवादी और सहिष्णु किस्म के लोगों में भी दो तरह के विचार है. कुछ समूहों का मानना है कि प्रधानमंत्री ने इस तरह का बयान देने में देर तो बहुत की, पर चलो-‘देर आयद, दुरुस्त आयद.’ दूसरा विचार है कि यह सब सियासत है और इसका वैसे ही कोई खास अर्थ नहीं, जैसा उनके 15 अगस्त के संबोधन के उस हिस्से का नहीं साबित हुआ, जिसमें उन्होंने अगले दस वर्षो तक जातीय और सांप्रदायिक अशांति-हिंसा को रोकने की बात की थी. प्रधानमंत्री के भाषण की सबसे दिलचस्प व्याख्या उनके अपने ‘राजनीतिक-सांस्कृतिक परिवार’ के संगठन-विश्व हिंदू परिषद् ने की है. विहिप के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने अपने बयान में कहा कि मोदी जी की उक्त टिप्पणी सिर्फ उन अल्पसंख्यकों को संबोधित थी, जो आये दिन खुराफात करते पाये जा रहे हैं. इसीलिए, प्रधानमंत्री ने अल्पसंख्यकों के एक कार्यक्रम में ऐसी टिप्पणी की.
इससे ज्यादा साफ और क्या होगा कि प्रधानमंत्री कुछ भी कहें, उनके ‘राजनीतिक-सांस्कृतिक परिवार’ के लोगों को मालूम है कि उन्हें क्या समझना है और क्या करना है? क्या प्रधानमंत्री स्वयं भी इसके लिए उन्हें जगह (स्पेस) और मौका देते हैं? उनकी सरकार का बीते नौ महीनों के दरम्यान सांप्रदायिक गोलबंदी और हिंसा की वैचारिकी पर क्या रुख रहा है? नयी सरकार के गठन से कुछ सप्ताह पहले प्रधानमंत्री की पार्टी की एक चुनाव रैली के मंच पर मुजफ्फरनगर दंगे के नामजद अभियुक्तों को बाकायदा सम्मानित किया गया.
सरकार बनने के बाद केंद्रीय गृह मंत्रलय के अनुमोदन के बाद उनमें से तीन अभियुक्तों को बाकायदा जेड श्रेणी की सरकारी सुरक्षा मुहैय्या करा दी गयी. यही नहीं, पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक विवादास्पद मठाधीश को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुए उपचुनावों में पार्टी का प्रभारी तक बनाया गया, क्योंकि सांगठनिक स्तर पर महसूस किया गया होगा कि उनकी ‘उग्र-हिंदुत्ववादी छवि’ का फायदा मिल सकेगा.
कई महीने तक यूपी-हरियाणा और कुछ अन्य इलाकों में ‘लव-जिहाद’ और ‘घर-वापसी’ जैसे निहायत विद्वेषभरे और सांप्रदायिक-अशांति पैदा करनेवाले अभियान चलाये गये. उस दौर में प्रधानमंत्री पूरी तरह मौन रहे. देश को पता नहीं चला कि उनका ऐसे अभियानों को लेकर क्या नजरिया है? बीते आठ-नौ महीनों के दौरान खुले मंचों और सोशल मीडिया पर भाजपा-संघ परिवार से जुड़े लोगों ने ‘सेक्युलर’, ‘सेक्युलरिज्म’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ जैसे शब्दों के खिलाफ जिस तरह का उपहासात्मक और निंदात्मक अभियान चलाया, वह अभूतपूर्व है. क्या वे नहीं जानते कि ये शब्द भारत के संविधान की उद्देशिका के हिस्से हैं? सब जानबूझ कर किया गया और इस अभियान में भाजपा-संघ के साथ केंद्र की सरकार का पूरा सहयोग-सहकार था और आज भी है.
कुछ माह पहले जापान के दौरे पर गये प्रधानमंत्री मोदी का वह कटाक्ष बहुत कुछ कहता है. वहां उन्होंने जापान के सम्राट को भेंट में ‘गीता’ की एक प्रति भी दी. बाद में उन्होंने बड़े उपहासात्मक अंदाज में कहा कि उनके इस कदम से स्वदेश के ‘सेक्युलरवादी’ टीवी बहसों व अन्य स्थानों पर तूफान मचा रहे होंगे.
फिर गणतंत्र दिवस के मौके पर एक सरकारी विज्ञापन में संविधान के उद्देशिका-पृष्ठ को दिखाया गया. लेकिन उसमें ‘सेक्युलरिज्म’ और ‘सोशलिज्म’ जैसे दो महत्वपूर्ण शब्द गायब थे. इसे लेकर जब बावेला मचा, तो सरकारी जवाब आया कि उक्त विज्ञापन में संविधान के पुराने प्रारूप के पहले पृष्ठ का इस्तेमाल किया गया था और उसमें ये दोनों शब्द नहीं थे. बात सही है. पर आज हमारा संविधान वह है, जिसमें ये दोनों शब्द मौजूद हैं.
जब तक किसी संविधान-संशोधन विधेयक के जरिये इन्हें हटाया नहीं जाता, तब तक किसी अन्य पूर्व प्रारूप के प्रचार या गणतंत्र दिवस के मौके पर सरकारी स्तर पर किये ऐसे सार्वजनिक चित्रंकन का क्या मतलब है? सेक्युलर शब्द से भाजपा-संघ परिवार की चिढ़ समझी जा सकती है, लेकिन प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को संविधान में दर्ज इस धारणात्मक शब्द से इतनी वितृष्णा क्यों है? इसी संविधान के नाम पर उन्होंने और उनकी सरकार के मंत्रियों ने शपथ ली है. यही नहीं, गुजरात सरीखे कुछ भाजपा-शासित राज्यों में सत्ता की दबंगई के बल पर ‘सेक्युलर’ शब्द को उपहास का प्रतीक बनाने की पुरजोर कोशिश हुई है.
ऐसे में यह मान लेना सही नहीं होगा कि प्रधानमंत्री ने 17 फरवरी को विज्ञान भवन के उस ईसाई सम्मेलन में जो कुछ कहा, वह बिल्कुल नयी बात है और हाल के कुछ घटनाक्रमों से उनके विचारों में ऐसा बदलाव आया है या कि वह सचमुच संघ परिवार से जुड़े संगठनों-नेताओं के ‘लव-जिहाद या घर-वापसी’ जैसे विद्वेषपूर्ण अभियानों के खतरनाक नतीजों से चिंतित हैं! उनके भाषण में एक बार भी धर्मनिरपेक्षता की संवैधानिक धारणा का उल्लेख नहीं है कि सिर्फ इसी परिप्रेक्ष्य से हम समाज में धार्मिक असहिष्णुता को निर्णायक तौर पर रोक सकते हैं.
सवाल है, प्रधानमंत्री के इस उद्बोधन की फिर क्या पृष्ठभूमि है और उनके रणनीतिक रुख में कथित बदलाव के क्या कारण हो सकते हैं?
सिर्फ दो ही कारण मुझे नजर आते हैं, जिन्होंने इस तरह के उनके ‘सराहनीय उद्बोधन’ की पृष्ठभूमि तैयार की होगी. पहला, दिल्ली के बेहद महत्वपूर्ण चुनाव में भाजपा को मिली शिकस्त और दूसरा, अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के वे दो-दो बयान, जिसमें उन्होंने भारत के में पिछले कुछ महीनों के दौरान अचानक बढ़ी धार्मिक-असहिष्णुता पर चिंता जतायी थी. ओबामा को हमारे प्रधानमंत्री मोदी ‘खास दोस्त’ बताते हैं.
ओबामा ने कहा कि ‘पिछले कुछ समय से धार्मिक असहिष्णुता की जिस तरह की गतिविधियां सामने आयी हैं, वो महात्मा गांधी को भी हैरान कर देतीं.’ ओबामा के इन बयानों के बाद भारत में बढ़ती धार्मिक असहिष्णुता की चर्चा वैश्विक स्तर पर और तेज हो गयी (यह अलग बात है कि अमेरिका खुद भी धार्मिक असहिष्णुता का शिकार है). सत्ता में आने के बाद एफडीआइ और अन्य विदेशी निवेश-सहयोग के लिए हाल के दिनों में अनेक देशों की यात्रएं कर चुके प्रधानमंत्री को निश्चय ही वैश्विक स्तर पर उभरती भारत की इस ‘बदसूरत तसवीर’ से निराशा हुई होगी.
चुनावी-हार और देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को खराब करते बयानों की बौछार के दबाव में आये प्रधानमंत्री को इतना तो करना ही था, जो उन्होंने ईसाई समुदाय के एक सम्मेलन में किया. अगर वे अपने राजनीतिक सहयोगियों और संघ-परिवार पर इसके लिए वाकई सकारात्मक दबाव बनाते हैं, तो उनकी सरकार और देश की जनता के लिए यह महान ऐतिहासिक कदम होगा. लेकिन क्या वे ऐसा करेंगे?
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