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अहंकार की पराजय

Updated at : 11 Feb 2015 6:32 AM (IST)
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अहंकार की पराजय

-हरिवंश- बमुश्किल नौ महीने पहले, देश ने भाजपा का यह नारा सुना, ‘कांग्रेस मुक्त भारत,’ पर दिल्ली चुनाव ने ‘भाजपा मुक्त भारत’ की लहर के संकेत दे दिये हैं. ठीक आठ महीने पहले लोकसभा चुनावों में भाजपा ने दिल्ली से कांग्रेस की सभी सीटें छीन ली थी. लोकसभा चुनावों में भाजपा को दिल्ली में 60 […]

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-हरिवंश-
बमुश्किल नौ महीने पहले, देश ने भाजपा का यह नारा सुना, ‘कांग्रेस मुक्त भारत,’ पर दिल्ली चुनाव ने ‘भाजपा मुक्त भारत’ की लहर के संकेत दे दिये हैं. ठीक आठ महीने पहले लोकसभा चुनावों में भाजपा ने दिल्ली से कांग्रेस की सभी सीटें छीन ली थी. लोकसभा चुनावों में भाजपा को दिल्ली में 60 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त थी.
पर सिर्फ नौ महीनों में 60 से घटकर भाजपा 03 सीटों पर सिमट गयी है. याद रखिए, 2013 में दिल्ली विधानसभा के हुए चुनावों में भाजपा को 33.07 फीसदी वोट मिले थे. दिल्ली विधानसभा में किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, पर भाजपा अकेले सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी. इतने कम समय में इतनी बड़ी पराजय का कारण? केजरीवाल ने सही कहा है, अहंकार के खिलाफ जनाक्रोश!
लोकसभा चुनावों में मिली बड़ी कामयाबी को भाजपाई संभाल नहीं सके. ऊपर से नीचे तक नेताओं के अहंकार, भाषा, भाव और तेवर देखने लायक हैं. भाजपा के भाष्यकार या सिद्धांत बतानेवाले गीता का उद्धरण खूब सुनाते हैं. पर गीता का मशहूर संदेश भाजपाई खुद भूल गये.
गीता में बड़े साफ ढंग से श्रीकृष्ण ने कहा कि अहंकार ही मेरा भोजन है. सत्तामद को रामायण में भी सबसे खतरनाक माना गया है. संस्कार, भारतीय अध्यात्म, पुराण और धर्म की पल-पल दुहाई देनेवाले भाजपाई इतने कम समय के सत्तामद में मामूली शिष्टता भी भूल गये. दिल्ली चुनावों की सार्वजनिक बहस पर गौर करिए. किस तरह की भाषा का इस्तेमाल भाजपा के जिम्मेदार और बड़े नेताओं ने किया.
खुद प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष इस प्रवृति की आग में घी डालते रहे. इमरजेंसी की आधी रात को जब जेपी की गिरफ्तारी हुई, तो उन्होंने एक ही पंक्ति (भारतीय सूक्ति) कही थी, विनाशकाले विपरीत बुद्धि. इसी मानस ने भाजपा को, जिसे नौ महीने पहले शानदार चुनावी सफलता मिली, उसे अप्रत्याशित सदमा देनेवाले हार में बदल दिया. गौर करिए, भाजपा के पास भारी पूंजी थी. साधन थे. बड़े नेताओं की फौज थी. केंद्र की सरकार थी. कई राज्यों के भाजपाई मुख्यमंत्री थे. सांसदों की फौज थी.
फिर भी भाजपा आम आदमी पार्टी (आप) के सामने नहीं टिक सकी. भाजपा के मुकाबले ‘आप’ के पास कितने संसाधन थे? याद रखिए, कांग्रेस की सत्ता भले ही दिल्ली की चली गयी हो, पर वह भी साधनहीन नहीं है. उसके दिग्गज नेता सड़क पर घूम रहे थे, पर बिल्कुल साफ हो गये.
गौर करिए, भाजपा और कांग्रेस, दोनों के मुकाबले ‘आप’ के साधन और संसाधन? साफ है, लोक-ताकत अगर आपके पास नहीं है, तो चाहे आप कितनी बड़ी पार्टी हों, कितने बड़े नेता हों, आपका भविष्य नहीं है. अनीति, अहंकार, छल, छद्म या षड्यंत्र से तात्कालिक कामयाबी मिल सकती है, पर असल कामयाबी के मापदंड अब बदल गये हैं. जनता की पहली कसौटी है कि वह नेता की ईमानदारी पहचाने. भाव, भाषा और भंगिमा में वह शिष्ट, मर्यादित और आत्ममर्यादा से परिपूर्ण हो.
आज के युवा या मतदाता को इससे भी संतोष नहीं. वह चाहता है कि हमारा नेतृत्व ईमानदार, पारदर्शी तो हो ही, साथ ही अपने आश्वासनों को पूरा करनेवाला हो. उसके कर्म और वचन में फर्क न हो. बात कुछ और, आश्वासन कुछ और, फिर सरकार में आने के बाद कामकाज कुछ और, यह अब लोग सहने को तैयार नहीं? इससे राजनीति में बड़ा और गहरा बदलाव आयेगा. अब राजनेता या राजनीतिक पार्टी वही आश्वासन देंगे, जो वे कर सकते हैं.
अपनी योग्यता या क्षमता के आगे जाकर आसमान के तारे तोड़ने के आश्वासन के दिन नहीं रहनेवाले. लोगों के मानस में एक और बड़ा फर्क आया है. हर आदमी की आकांक्षा इस टीवी युग में आसमान छू रही है. उन आकांक्षाओं को पूरा होने का माहौल अगर सरकारें नहीं बनायेगी, तो अब वे लोक-आक्रोश से नहीं बच सकती. लोग वोट देकर पांच वर्षो तक इंतजार करने के मूड में नहीं हैं. बिजली, पानी, सड़क, स्कूल एडमिशन, सुरक्षा, मंहगाई का न होना, बेहतर अवसर, अच्छा जीवन स्तर जैसे मुद्दे, अब निर्णायक हो गये हैं.
इन बुनियादी सवालों के साथ भ्रष्टाचार पर अंकुश, त्वरित न्याय जैसे सवाल, समाज की जरूरत बन गये हैं. यह भी न भूलें कि समाज का हर तबका इन सवालों पर समान ढंग से सोचने लगा है. दिल्ली में उच्च मध्यवर्ग से लेकर गरीब तबका सबने मिलकर ‘आप’ को ताकत दी. इन्हीं बुनियादी सवालों को लेकर. इन सवालों का हल भारत जैसे देश में आसान काम भी नहीं है.
रातोंरात चमत्कार नहीं होनेवाले. इस राजनीतिक संस्कृति या व्यवस्था के तहत यह संभव नहीं. बिना व्यवस्था में असरकारी बदलाव के हालात नहीं बदलनेवाले. पर इस पर कहां काम हो रहा है? भाजपा को सत्ता मिलते ही ऐसी ताकतें अनियंत्रित हो गयी, जो समाज में तनाव फैलाने के काम में लग गयी.
आपने वोट मांगा, विकास के नाम पर, व्यवस्था में बदलाव के नाम पर, भ्रष्टाचार रोकने के नाम पर, त्वरित न्याय देने के नाम पर, कालाधन वापस लाने के नाम पर… कुल मिलाकर एक नयी कार्यसंस्कृति देने का आश्वासन देकर. पर गद्दी मिलते ही ये बुनियादी चीजें सार्वजनिक बहस से अदृश्य हो गयी? आज का मतदाता यह सहने को तैयार नहीं.
संयोग है कि दिल्ली चुनावों के परिणाम के साथ ही, बिहार का राजनीतिक परिदृश्य भी देश देख रहा है. पिछले एक साल से भाजपा के जिम्मेदार नेता कहते घूम रहे हैं कि बिहार जदयू के 50 विधायक हमारे संपर्क में हैं. जिस दिन चाहेंगे, वे मेरे साथ आ जायेंगे. लेकिन आज भी बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के साथ कितने विधायक गये या खड़े हैं? पर बिहार विधानसभा के 130 विधायक, जदयू के चुने नेता नीतीश कुमार के साथ हैं. यह दृश्य दुनिया देख रही है (सौजन्य टीवी चैनल). फिर भी केंद्र सरकार या भाजपा के नेता यह सच समझने को तैयार नहीं?
नयी पीढ़ी की आकांक्षा और सपनों ने भारतीय राजनीति को गहराई से बदला है. इस तथ्य को राजनीतिक दल के नेता और राजनीतिक दल जितना जल्द समझ लें, उनके लिए बेहतर होगा.
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