मेरी तनख्वाह और मैं ही भिखारी

महीने की पहली तारीख और पहली तनख्वाह. दोस्तों ने चाय-नाश्ते की जिद पकड़ ली. बेमन से होटल पहुंचा. रसगुल्ले और गुलाब जामुन में पांच सौ रु पये साफ हो गये. घड़ी पर नजर पड़ते ही बीवी का ख्याल आया. मिठाई कड़वी लगने लगी और डर सताने लगा. घर से निकलते वक्त ही उसने कहा था […]
महीने की पहली तारीख और पहली तनख्वाह. दोस्तों ने चाय-नाश्ते की जिद पकड़ ली. बेमन से होटल पहुंचा. रसगुल्ले और गुलाब जामुन में पांच सौ रु पये साफ हो गये. घड़ी पर नजर पड़ते ही बीवी का ख्याल आया. मिठाई कड़वी लगने लगी और डर सताने लगा. घर से निकलते वक्त ही उसने कहा था कि ‘‘ए जी, वक्त पर लौटना.. और हां, दोस्तों के चक्कर में मत पड़ना, वरना..’’ बीवी की ताकीद याद आते ही सारी खुशी गायब हो गयी. दोस्तों से बीवी और तनख्वाह के बारे में सुनी ढेरों कहानियां याद आने लगीं.
जैसे-जैसे घर करीब आता गया, डर और बेचैनी बढ़ने लगी. शादी के काफी दिनों बाद नौकरी मिली थी. बीवी इसे अपनी किस्मत से मिली बताती थी. बेकारी के दौर में कहती थी कि ‘‘न जाने किस निकम्मे के पल्ले पड़ गयी.’’ नौकरी मिलने के बाद से सुबह-शाम यह याद दिलाना नहीं भूलती थी-‘‘मेरी ही किस्मत से नौकरी मिली है.’’ बीवी तो बीवी, मोहल्ले के लोग भी जब-तब यही बोलते रहते हैं कि ‘‘बीवी आयी तो बेचारे को नौकरी मिल गयी, वरना बेकार बैठा था.’’ मैंने एक दिन हिम्मत जुटा कर उससे पूछ ही लिया था- ‘‘अगर मैं जाहिल होता तो क्या तुमसे शादी के बाद मुङो नौकरी मिल जाती?’’ बीवी ने कहा, ‘‘जाहिल भले न हो, पर तुम्हारी किस्मत तो मेरे ही मुकद्दर से जागी है.’’
बीवी के जवाब से खुद के काबिल होने का थोड़ा एहसास जागा. शादी के बाद की इन पुरानी बातों को सोचते- सोचते दरवाजे पर पहुंच गया. आवाज लगाते ही बीवी ने दरवाजा ऐसे खोला मानो किसी तूफान ने पूरा जोर लगा दिया हो. बीवी के इस रु ख ने मेरे तो होश उड़ा दिये. शेरनी की तरह गुर्राते हुए उसने पूछा, ‘‘इतनी देर तक कहां थे?’’ दरवाजे पर ही किसी हंगामे से बचने के लिए मैं तेज कदमों से कमरे में चला गया.
लेकिन बकरे की मां कब तक खैर मनाती. बीवी भी लपकते हुए कमरे में आ धमकी. त्योरियां चढ़ा कर पूछा, ‘‘इतनी देर तक कहां थे? तनख्वाह मिलते ही बौराने लगे. जल्दी निकालो सारा पैसा!’’ मैंने ने तनख्वाह पर अपना कब्जा बनाये रखने के लिए तू-तू मैं-मैं करने का फैसला किया. सोचा झंझट कर लूंगा तो बीवी दस-पंद्रह दिन मुंह फुलाये रहेगी. बोलचाल बंद रहेगी. मैं भी नाराज हो जाऊंगा. घर में खाना-पीना बंद कर दूंगा और बाहर के खाने का मजा लूंगा. बाद में जो होगा देखा जायेगा. यह सोच कर मैं भी तन गया. अकड़ कर बोला, ‘‘तुमने मुङो उल्लू समझ रखा है? मैं क्या गदहा हूं? मैं क्या तुम्हारा गुलाम हूं?..’’ आगे कुछ और कहता कि इससे पहले बीवी मुस्कुरा पड़ी, बोली- ‘‘तुम्हारी जबान से सच सुन कर बड़ा मजा आया. बस, अब रहने भी दो.’’ बीवी की बात सुन कर जैसे मुङो काठ मार गया. इतने में बीवी ने झट से मेरी जेब में हाथ डाला और तनख्वाह पर कब्जा जमा लिया. एक बार फिर, रोज दफ्तर जाने से पहले बीवी के आगे हाथ फैलाने की मजबूरी मेरी किस्मत बन गयी.
शकील अख्तर
प्रभात खबर, रांची
akhtershakeelakhter@gmail.com
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