झारखंड: पांच सूत्र कामयाबी के

Published at :29 Jan 2015 6:27 AM (IST)
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झारखंड: पांच सूत्र कामयाबी के

हरिवंश झारखंड बनते ही (सन् 2000) बड़ी-बड़ी बातें शुरू हुई. न जाने कितने सेमिनार, बैठकें, पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन व आयोजन हुए कि झारखंड कैसे सबसे विकसित और अव्वल राज्य बने? सरकारी, गैर सरकारी दोनों स्तरों पर. बड़े उद्योग, कल-कारखाने, नये शहर, नयी राजधानी बसाने की कितनी बड़ी योजनाओं पर चर्चा हुई. आरंभिक काम शुरू हुए. […]

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हरिवंश

झारखंड बनते ही (सन् 2000) बड़ी-बड़ी बातें शुरू हुई. न जाने कितने सेमिनार, बैठकें, पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन व आयोजन हुए कि झारखंड कैसे सबसे विकसित और अव्वल राज्य बने? सरकारी, गैर सरकारी दोनों स्तरों पर. बड़े उद्योग, कल-कारखाने, नये शहर, नयी राजधानी बसाने की कितनी बड़ी योजनाओं पर चर्चा हुई. आरंभिक काम शुरू हुए. पर कुछ हो नहीं सका.

फिलहाल बड़ी बातें, बड़ी आकांक्षाओं और बड़े सपनों को पाने के लिए उन मुद्दों की बात करें, जो आमतौर से अचर्चित व दबे हैं. एक -एक सीढ़ियां ही छत (मंजिल) तक ले जाती हैं. इतिहास बनाने के लिए धन-संपदा नहीं चाहिए, बल्कि एक संकल्प से भरा कदम ही, एक नयी दुनिया की नींव बन जाता है. हिंदी के मशहूर कवि, मुक्तिबोध की एक पंक्ति है, एक पांव रखता हूं, हजार राहें फूट पड़ते हैं.

कई मशहूर लोग झारखंड के संदर्भ में, झारखंड की प्राकृतिक संपदा को अभिशाप मानते हैं. झारखंड सिर्फ देश का ही सबसे संपन्न क्षेत्र नहीं है, बल्कि दुनिया के संपन्न क्षेत्रों में से एक है. यहां कोयला और खनिज संसाधन, 200 लाख करोड़ का (इंडियन मिनरल इयर बुक्स – 2011) है. यानी झारखंड में इस हिसाब से हर नागरिक के पास 60 लाख की संपदा है. पर सच क्या है? यह जगजाहिर है. जल, जंगल और जमीन के मामले में मुक्त होकर प्रकृति ने झारखंड को समृद्ध बनाया. पर हकीकत यह है कि यह देश के सबसे गरीब इलाकों में है.

हम एक सुंदर, समृद्ध और बेहतर झारखंड बना सकें, इसके लिए तात्कालिक रूप से बड़ी बातों को छोड़कर, पांच मुद्दों पर गौर करें, तो एक उम्मीद भरी शुरूआत हो सकती है.

ये मुद्दे छोटे लग सकते हैं, पर इन्हें हल करने के लिए हम ठोस कदम उठायें, तो इसका असर दूरगामी और प्रभावकारी होगा.

1. बच्चों के बीच कुपोषण घटे और झारखंड की महिलाओं में खून की कमी कम करने के कदम उठे.

2. नवजात शिशु और बच्चों की मृत्युदर कम करना.

3. खुले में शौच खत्म हो.

4. हर बच्च स्कूल में हो और पढ़े-सीखे.

5. बाल विवाह खत्म हो. बाल मजदूर न हो और बच्चों का अवैध व्यापार, अतीत की बात बन जाये.

ये पांचों मुद्दे शायद ही सार्वजनिक वाद-विवाद के मुख्य विषय हों या राजनीतिक बहस का हिस्सा हो. पर ये वो मुद्दे हैं, जिन्हें हम हल कर सकें, तो झारखंड की मानव संपदा (आम स्त्री, पुरुष, बड़े, बूढ़े एवं बच्चे) स्वस्थ, शिक्षित, उम्दा होगी. मानव संपदा बेहतर हो, तो यही इनसान राज्य की तकदीर बदल देंगे. अंतत: किसी भी चीज (संस्था, देश, समाज, राज्य वगैरह) को खूबसूरत, बेहतर और उम्दा तो इंसान ही बनाते हैं. हम आंकड़ों की बात नहीं करते. आंकड़ों के तथ्य में डूबेंगे, तो पता चलेगा कि झारखंड में 1.4 करोड़ (लगभग 42 फीसदी) लोग, गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं. मानव विकास सूचकांक में देश के 23 राज्यों में, झारखंड 19वें नंबर पर है. इसी तरह इन पांच चुनौतियों में भी झारखंड की स्थिति खराब है. झारखंड में देश के दूसरे नंबर पर सबसे कुपोषित बच्चे हैं, 55 फीसदी. पांच वर्ष के नीचे के लगभग 22 लाख बच्चे हैं, जिनका वजन कम है. हर साल आठ लाख बच्चे झारखंड में पैदा होते हैं. इनमें से 20800 नवजात शिशु, पहले महीने में ही मर जाते हैं. और एक साल पूरा होने के बाद 29600 बच्चे गुजर जाते हैं.

खुले में शौच के प्रसंग में झारखंड के लोग, सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया में सबसे अधिक हैं. गांव में रहनेवाले लगभग 92 फीसदी लोगों के पास शौचालय नहीं है (सेंसस 2011). शिक्षा और सीखने के क्षेत्र में भी झारखंड, देश के कुल 35 राज्यों और संघीय क्षेत्रों में 33वें स्थान पर है. बिहार और राजस्थान के बाद झारखंड में सर्वाधिक बाल विवाह होते हैं. यहां की 45 फीसदी लड़कियों की शादी 18 वष्रे से कम उम्र में होती है. यानी हर वर्ष 1.6 लाख बाल विवाह.

इन मुद्दों को हल करने के लिए बड़ा बजट नहीं चाहिए. बड़ी तैयारी, बड़े कान्फ्रेंस वगैरह की जरूरत नहीं है. इन सवालों पर लोगों को सजग और जागरूक करने का माहौल बने. संबंधित विभाग इन मुद्दों को हल करने के लिए आवश्यक कदम उठाये, लगातार मानिटरिंग हो, तो हालात जल्द बदल सकते हैं.

इसी क्रम में प्रभात खबर और यूनिसेफ ने मिलकर एक पहल की, दो वर्षो पहले. पत्रकारों, दूर के संवाददाताओं को जागरूक करना, प्रशिक्षित करना और इन सवालों पर समाज में सकारात्मक माहौल बनाने के लिए लगातार पहल करना. श्रृंखलाओं में इन मुद्दों से जुड़ी रिपोर्टो का प्रकाशन. रांची, जमशेदपुर, देवघर, धनबाद में कई वर्कशाप हुए. इन मुद्दों पर हुई रिपोर्टिग की लंबी सूची बनी और लगातार समाज को जागरूक करने का अभियान चला.

इसी अभियान का हिस्सा है, आज रेडिशन ब्लू में यूनिसेफ – प्रभात खबर द्वारा आयोजित विजन फॉर झारखंड, एन एजेंडा फॉर डेवलपमेंट. झारखंड को विकास का रास्ता या विजन क्या हो? इन मुद्दों के संदर्भ में अपने-अपने क्षेत्रों के विशेषज्ञ बतायेंगे कि कैसे इन चुनौतियों को हल कर झारखंड अपना कायाकल्प कर सकता है. अंतत: इन विशेषज्ञों के मुख्य सुझाव, एक साथ रख कर, झारखंड के मुख्यमंत्री कौ सौंपा जायेगा. इस आग्रह के साथ कि इन मुद्दों के हल के लिए कैसे नयी शुरूआत और प्रयास हों.

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