भारत-अमेरिका दोस्ती का कारोबार
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :28 Jan 2015 5:54 AM (IST)
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अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में कुछ भी इकतरफा नहीं होता. इस हाथ दे उस हाथ ले की रणनीति चलती है और दोनों ही देश चाहेंगे कि वे कम देकर ज्यादा हासिल करें. इसलिए आनेवाले दिनों में भी भारत और अमेरिका के बीच जहां कुछ सहयोग बढ़ता दिखेगा, वहीं.. आम तौर पर जब दो राष्ट्राध्यक्ष मिलते हैं, तो […]
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अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में कुछ भी इकतरफा नहीं होता. इस हाथ दे उस हाथ ले की रणनीति चलती है और दोनों ही देश चाहेंगे कि वे कम देकर ज्यादा हासिल करें. इसलिए आनेवाले दिनों में भी भारत और अमेरिका के बीच जहां कुछ सहयोग बढ़ता दिखेगा, वहीं..
आम तौर पर जब दो राष्ट्राध्यक्ष मिलते हैं, तो उनकी बातों और बयानों के अल्पविराम और पूर्णविराम तक की गहन कूटनीतिक समीक्षा होती है. लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक तात्कालिक सफलता यह है कि उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे को इन बारीकियों से निकाल कर दोनों देशों के आपसी संबंधों में आती गर्माहट पर केंद्रित कर दिया. हालांकि, यह सफलता तात्कालिक ही है, क्योंकि अंतत: सफलता इसी पैमाने पर आंकी जायेगी कि यह गर्माहट दोनों देशों के आपसी कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्तों को कितना आगे बढ़ा पाती है.
ओबामा ने भारत में कुल जमा चार अरब डॉलर के निवेश के वादे किये हैं. इनमें से दो अरब डॉलर का निवेश अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं में, एक अरब डॉलर का निवेश मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत और एक अरब डॉलर का निवेश लघु एवं मध्यम उद्योगों के लिए होगा. ये आंकड़े किसी तरह से प्रभावशाली नहीं कहे जा सकते.
ओबामा के इस दौरे का केंद्रीय विषय भारत-अमेरिका का परमाणु समझौता था, जहां निश्चित रूप से वर्षो पुरानी अड़चनें खत्म हुई हैं. 2006 में ही दोनों देशों के बीच यह समझौता हुआ था, मगर कोई नतीजा नहीं निकला. दो खास अड़चनें थीं- दायित्व का प्रावधान और अमेरिकी निगरानी की शर्त. इन दोनों मुद्दों पर बात सुलझी है. यह कहा गया है कि भारत की मौजूदा परमाणु ऊर्जा क्षमता लगभग 5,800 मेगावॉट से बढ़ा कर इसे 2022 तक 20,000 मेगावॉट करने में अमेरिका मदद करेगा.
अमेरिका ने भारतीय परमाणु संयंत्रों की निगरानी की जिद छोड़ दी है. वहीं दायित्व प्रावधान के मसले को सुलझाने के लिए भारत-अमेरिका परमाणु बीमा पूल बनाने की योजना है. एक तरह से किसी दुर्घटना की स्थिति में वित्तीय मुआवजे का दायित्व बीमा कंपनियों पर डाला जा रहा है. हालांकि यह ऐसा मसला है, जिस पर आनेवाले दिनों में सवाल उठ सकते हैं. अभी इसकी अड़चनों को दूर करने के लिए दोनों पक्षों की ओर से दी गयी ढील और रियायतों के पूरे विवरण सामने नहीं आये हैं. इनके सामने आने पर विवाद पैदा होने की गुंजाइश लगती है.
कुछ खबरें इस तरह की आ रही हैं कि दुर्घटना की स्थिति में वित्तीय दायित्व नाभिकीय संयंत्रों की आपूर्ति करनेवालों पर नहीं, केवल संचालन करनेवाली कंपनी पर होगा. कहीं ऐसा न हो कि ऐसी किसी ढील को अदालतों में इस आधार पर चुनौती दे दी जाये कि यह संसद की ओर से पारित कानून के अनुरूप नहीं है. पांच साल पहले संसद में पारित भारतीय कानून ऐसी किसी दुर्घटना की स्थिति में उपकरण आपूर्ति करनेवालों को ही अंतत: जिम्मेवार बनाता है. यह बीमा पूल 1,500 करोड़ रुपये का होगा, जिसमें 750 करोड़ रुपये का योगदान सरकारी बीमा कंपनियां करेंगी और 750 करोड़ रुपये का योगदान खुद भारत सरकार करेगी. भोपाल गैस त्रसदी के संदर्भ में देखें, तो क्या इस बीमा पूल का मतलब यह होगा कि यूनियन कार्बाइड जैसी कोई अमेरिकी कंपनी भारत में बेफिक्र होकर अपने संयंत्र लगाये और दुर्घटना हो, तो मुआवजा भारत सरकार दे? आखिर जीआइसी व अन्य चार सरकारी बीमा कंपनियों का भी पूरा स्वामित्व तो भारत सरकार का ही है. इसलिए परोक्ष रूप में बीमा की यह जिम्मेवारी भारत सरकार ही उठा रही है. ऐसे में कोई अमेरिकी कंपनी क्यों भारत में लगाये जानेवाले परमाणु संयंत्र की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतेगी? हालांकि इस पर सरकारी पक्ष का कहना है कि जो परमाणु संयंत्र लगाये जानेवाले हैं, उनकी तुलना यूनियन कार्बाइड से नहीं की जा सकती, क्योंकि इनको लगाने में सरकारी कंपनी न्यूक्लियर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की सहभागिता होगी. साथ ही जब उपकरणों की आपूर्ति के समझौते होंगे, तो उन समझौतों के प्रावधानों में भी आपूर्तिकर्ताओं की जिम्मेवारियां तय होंगी.
दूसरी बात यह कि बीमा पूल के लिए 1,500 करोड़ रुपये की रकम नाकाफी लगती है. गौरतलब है कि अभी तीन साल पहले ही जापान में हुई नाभिकीय दुर्घटना में 20 अरब डॉलर का सीधे तौर पर और लगभग डेढ़ सौ अरब डॉलर का परोक्ष तौर पर नुकसान हुआ था. इसकी तुलना में महज एक चौथाई अरब डॉलर का बीमा पूल बनाने से भला कितनी वित्तीय सुरक्षा मिल जायेगी? हालांकि, यह कहा जा रहा है कि 1,500 करोड़ रुपये की रकम तो केवल एक आधार पूंजी होगी और बीमा सुरक्षा इससे कहीं ज्यादा होगी. आखिरकार एक संयंत्र ही अगर साठ-सत्तर हजार करोड़ रुपये का होगा, तो जाहिर है कि उस संयंत्र का बीमा भी उसी अनुपात में होगा. हालांकि, अभी इन सवालों के विस्तार में गये बिना इस समय भारत और अमेरिका, दोनों पक्षों की ओर से बस इतना कहा जा रहा है कि परमाणु समझौते की अड़चनें दूर हो गयी हैं. इस मामले में विस्तृत विवरणों के सामने आने पर ही कहानी साफ होगी.
सवाल यह भी है कि परमाणु ऊर्जा पर भारत सरकार कहीं जरूरत से ज्यादा जोर तो नहीं दे रही? क्योंकि पूरे विश्व में ऊर्जा संबंधी जरूरतों के लिए परमाणु बिजली पर निर्भरता कम की जा रही है. हालांकि, चीन अपनी परमाणु बिजली उत्पादन क्षमता को 2020 तक तिगुना करने की योजना पर काम कर रहा है, मगर दूसरी ओर जर्मनी ने परमाणु बिजली संयंत्रों को क्रमश: बंद करने की योजना बनायी है. नाभिकीय संयंत्रों से जुड़े खतरों की तुलना में सौर ऊर्जा परियोजनाएं कहीं बेहतर विकल्प हैं. ओबामा के इस दौरे में सौर ऊर्जा के लिए पूंजी को लेकर भी भारत और अमेरिका के बीच समझौता हुआ है. एक लाख मेगावॉट की सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए लगभग छह लाख करोड़ रुपये की पूंजी जुटाने में अमेरिका से मदद मिलने की उम्मीद है. अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत ने पहले से ही 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दे रखी है.
सौर ऊर्जा परियोजनाओं को स्थापित करने में लगनेवाला समय भी परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की तुलना में काफी कम होता है. लिहाजा अगर भारत को जल्दी परिणाम चाहिए, तो उसे सौर ऊर्जा पर ही ज्यादा ध्यान देने की रणनीति अपनानी चाहिए. हालांकि, ऊर्जा क्षेत्र के जानकार कहते हैं कि भारत परमाणु ऊर्जा को भी नजरअंदाज करके नहीं चल सकता, क्योंकि भारत में पहले से ऊर्जा की काफी कमी है और आनेवाले वर्षो में ऊर्जा संबंधी जरूरतें लगातार बढ़ती ही जायेंगी.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस दौरे में यह जिक्र किया कि बड़े समझौते एक दिन में नहीं होते. लिहाजा भारत और अमेरिका के बीच अब तक जो सहमतियां बनी हैं, उन पर आगे भी बातें चलती रहेंगी. मगर पहले प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका-यात्र और अब बराक ओबामा की भारत-यात्र ने वह माहौल तैयार कर दिया है, जिसमें दोनों देश एक-दूसरे को स्वाभाविक साङोदार मान कर आगे बढ़ना चाहते हैं. लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में कुछ भी इकतरफा नहीं होता. इस हाथ दे उस हाथ ले की रणनीति चलती है और दोनों ही देश चाहेंगे कि वे कम देकर ज्यादा हासिल करें. इसलिए आनेवाले दिनों में भी भारत और अमेरिका के बीच जहां कुछ सहयोग बढ़ता दिखेगा, वहीं आपसी खींचतान भी होगी और घरेलू राजनीति की खींचतान का असर भी होगा.
राजीव रंजन झा
संपादक, शेयर मंथन
Rajeev@sharemanthan.com
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