गोरेपन की देवी को एक लड़की का खत

Published at :28 Jan 2015 5:49 AM (IST)
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गोरेपन की देवी को एक लड़की का खत

निखरे-निखरे रू प, दमकती त्वचा और लंबे काले-घने जुल्फों वाली ‘गोरेपन की देवी’ आपको एक सांवली लड़की की तरफ से बार-बार प्रणाम है. आप ये कहती/चाहती हैं कि आपका क्रीम लगा कर समस्त जहान की लड़कियां गोरी-सुंदर दिखने लगेंगी/लगें. आपके इस दावे में कितना दम है, मैं यह तो नहीं जानती और न ही जानने […]

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निखरे-निखरे रू प, दमकती त्वचा और लंबे काले-घने जुल्फों वाली ‘गोरेपन की देवी’ आपको एक सांवली लड़की की तरफ से बार-बार प्रणाम है. आप ये कहती/चाहती हैं कि आपका क्रीम लगा कर समस्त जहान की लड़कियां गोरी-सुंदर दिखने लगेंगी/लगें. आपके इस दावे में कितना दम है, मैं यह तो नहीं जानती और न ही जानने में कोई रुचि है पर टीवी और अखबार में आपकी सुंदर सी तसवीर देख कर मेरे जैसी सांवली लड़कियों के माता-पिता पर क्या गुजरती है यह आपने कभी सोचा है? इस देश में आज भी अधिकांश माता-पिता लड़की के जन्म लेते ही उसकी शादी और दहेज की चिंता में असमय बूढ़े हो जाते हैं.

अगर लड़की सांवली या काली हुई तब तो वे उसे खुद के लिए कोई दैवीय प्रकोप ही मान लेते हैं. क्योंकि अखबारों या वेबसाइटों पर शादी के लिए दिये गये विज्ञापन इस बात के उदाहरण हैं, जिनमें ‘फेयरनेस’ और ‘ब्यूटीफुल’ के बाद ही दूसरी विशेषताओं का स्थान आता है. क्या सांवली लड़कियां सुंदर नहीं होती? हे गोरेपन की देवी! मैं आपको बार-बार नमन करती हूं. वैसे तो आप ‘अंतर-यामी’ हैं फिर भी मैं अपने मन की कुलबुलाहटों को आप तक पहुंचाना चाहती हूं. आखिर ऐसा क्यूं है कि किसी लड़की का सांवला या गोरा होना उसके वजूद से जुड़ जाता है. क्यों कोई उस लड़की के अंतर्मन की सुंदरता को नहीं देख पाता.

क्यों कोई जाने-माने शायर कैफी आजमी की तरह नहीं कहता ‘सांवला होना ठीक है और काला होना सचमुच में सुंदर है.’ क्यों अभिभावक अपनी बच्चियों को ‘बार्बी डॉल’ की जगह सांवली या काली गुड़िया तोहफे में नहीं देते. हे गोरेपन की देवी! आप मेरी यह अज्ञानता दूर करें कि क्या गोरी लड़कियां ज्यादा प्रतिभावान होती हैं. या वे अपने माता-पिता, जीवनसाथी और ससुराल वालों को ज्यादा सम्मान देती हैं.

आप ग्लैमर जगत की मोहतरमा हैं आपको तो मालूम ही होगा कि शबाना आजमी, काजोल, रानी मुखर्जी और नंदिता दास का रंग गोरा नहीं था. क्या वे अपने समय की कमजोर शख्सीयत हैं? तो फिर क्यों हमें विज्ञापनों के माध्यमों से यह बताने की कोशिश की जाती है कि फलां क्र ीम लगा कर या किसी खास साबुन से नहा कर गोरा और सुंदर बना जा सकता है और ‘जो सुंदर है, वही सफल है.’ क्यों लड़कियों के मन में पहले कुंठा पैदा की जाती है और फिर इसी कुंठा को भुनाते हुए गोरेपन को उनके सामने ‘पावर’ या हथियार की तरह पेश किया जाता है. तमाम सौंदर्य प्रतियोगिताएं भी इसीलिए आयोजित की जाती हैं कि लड़कियों को यह अहसास कराया जाए कि खूबसूरत दिखना बेहद जरूरी है. हे गोरेपन की देवी! कोई ऐसी क्रीम क्यों नहीं बनायी जाती जिससे लोगों का मन-मस्तिष्क साफ हो सके और उनकी दूषित मानसिकता में बदलाव हो. ताकि इस समाज में सांवली/गोरी सभी लड़कियां शुकून से जी सकें. – एक दुखियारी सांवली लड़की.

अखिलेश्वर पांडेय

प्रभात खबर, जमशेदपुर

apandey833@gmail.com

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