मिथक और यथार्थ के बीच नरेंद्र मोदी

Published at :21 Jan 2015 6:15 AM (IST)
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मिथक और यथार्थ के बीच नरेंद्र मोदी

मोदी के व्यापक और बड़े व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द रहस्यों का घेरा है. किसी को भी मालूम नहीं है कि वास्तविक मोदी कौन हैं. क्या उनके चारों ओर बहुत सोच-समझ कर तैयार किया गया विस्तृत प्रचार तंत्र वास्तविक नरेंद्र मोदी से बिल्कुल भिन्न आवरण खड़ा करने में कामयाब हो गया है? क्या वास्तविक नरेंद्र मोदी हमारे […]

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मोदी के व्यापक और बड़े व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द रहस्यों का घेरा है. किसी को भी मालूम नहीं है कि वास्तविक मोदी कौन हैं. क्या उनके चारों ओर बहुत सोच-समझ कर तैयार किया गया विस्तृत प्रचार तंत्र वास्तविक नरेंद्र मोदी से बिल्कुल भिन्न आवरण खड़ा करने में कामयाब हो गया है?
क्या वास्तविक नरेंद्र मोदी हमारे सामने उपस्थित होंगे? संसदीय चुनावों के बाद भी लगातार प्रचार, प्रदर्शन और खुद को आगे दिखाने की प्रवृत्ति के निर्बाध जारी रहने की स्थिति में वास्तविकता अब तक छुपी हुई है और मिथक बनते जा रहे हैं. प्रचार तथ्यों को धुंधला कर देता है, प्रदर्शन मिथकों को पुष्ट करता है, और खुद को आगे दिखाने की प्रवृत्ति सच से परे अपने आप में एक लक्ष्य बन जाती है. देश में बहुत सारे लोग दुविधा में हैं. तथ्य कुछ और संकेत कर रहे हैं, जबकि प्रचार तंत्र उनके बिल्कुल विपरीत बातें कर रहा है. अब समय आ गया है कि वास्तविक नरेंद्र मोदी स्वयं ही इस दुविधा की स्थिति को समाप्त करने की पहल करें.
उन कुछ क्षेत्रों पर नजर डालें, जहां यह दुविधा बहुत ही अधिक है. मोदी विकास को अपनी एकमात्र प्राथमिकता बताते रहे हैं, और उनकी पार्टी के वरिष्ठ सहयोगी इसे आस्था के साथ दोहराते रहते हैं. लेकिन, अगर ऐसा है, तो फिर प्रधानमंत्री को भाजपा-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के उन उन्मादी तत्वों के प्रति इतना लगाव क्यों है, जो उनकी विकास परियोजनाओं को विफल करने की कोशिशें कर रहे हैं? कुछ तथ्यों पर विचार करें. चुनाव के दौरान विकास मोदी का पसंदीदा मंत्र था, लेकिन उनके लिए काम कर रहे संघ कार्यकर्ताओं की प्राथमिकता बिल्कुल भिन्न थी. उनका एकमात्र लक्ष्य सांप्रदायिक द्वेष के आधार पर हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करना था. चूंकि मोदी की जीत में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी, इसलिए वे इस बात से अनभिज्ञ नहीं रहे होंगे.
मोदी का चुनावी नारा ‘सबका साथ, सबका विकास’ था. स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से उन्होंने घोषणा की थी कि धार्मिक द्वेष पर दस वर्ष का निषेध होना चाहिए. उनके मंत्रियों और सांसदों ने भी इस बात को सुना था. फिर उन्होंने अपनी एक मंत्री साध्वी ज्योति को हटाने से क्यों मना कर दिया, जिन्होंने कहा था कि जो ‘रामजादा’ (यानी भाजपा समर्थक) नहीं हैं, वे ‘हरामजादा’ हैं? उन्होंने सांप्रदायिक उन्माद फैलानेवाले योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश के उपचुनावों में पार्टी का चेहरा क्यों बनाया? वे तब चुप क्यों रहे, जब संघ से जुड़े संगठन धर्म जागरण समिति ने यह घोषणा की कि 2021 तक यह देश पूर्ण रूप से एक हिंदू राष्ट्र बन जायेगा? तब उनकी प्रसिद्ध तीखी जुबान कहां थी, जब विश्व हिंदू परिषद ने यह घोषित किया था कि मोदी के आगमन से भारत एक सहस्नब्दी के बाद फिर से हिंदू राष्ट्र बन गया है? कैसे भाजपा सांसद साक्षी महाराज एक के बाद एक सांप्रदायिक बयान देकर बच निकलते हैं, और आखिर में उन्हें स्पष्टीकरण देने के लिए सिर्फ एक औपचारिक नोटिस दिया जाता है? क्या सच में मोदी विकास पुरुष हैं या अब भी वे दिल से एक संघ प्रचारक ही हैं?
मोदी का प्रचार तंत्र हमें बताता है कि वे आगे देखनेवाले प्रगतिशील नेता हैं, जिनकी एकमात्र चिंता भारत के भविष्य को लेकर है. हम इस बात पर भरोसा करना चाहते हैं, लेकिन मुंबई के एक कार्यक्रम में उनकी हकीकत सामने आ गयी, जिसे कायदे से छुपा कर रखा जाता है. वहां पराभौतिकी, दर्शन, सौंदर्य शास्त्र, खगोल शास्त्र, गणित, साहित्य, शासन और कला एवं संस्कृति में प्राचीन भारत की शानदार उपलब्धियों को रेखांकित करने के बजाय उन्होंने इन सब की गरिमा यह कह कर घटा दी कि गणपति प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी के होने का सबूत हैं, क्योंकि तभी तो मानव-शरीर में हाथी का सिर लगाया जा सका था. बिना किसी संकोच के उन्होंने यह भी कह दिया कि कुंती की संतानोत्पत्ति की कथा विकसित जेनेटिक्स का प्रमाण है. ऐसे और उदाहरण भी हैं. उनके, और संघ के, संरक्षण में अब प्रतिष्ठित भारतीय विज्ञान कांग्रेस में ऐसे इतिहासकार भी आ गये हैं, जो हमें बताते हैं कि प्राचीन भारत में ऐसे विमान थे, जो दूसरे ग्रहों की यात्र कर सकते थे. इन बातों से पूरी दुनिया में हमारा मजाक बनाया जा रहा है. देश एक बार फिर दुविधा में है.
आम चुनाव में जीत के बाद पहली बार संसद परिसर में जाने पर मोदी ने लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था के सामने बड़े अंदाज से दंडवत किया था. खूब सुर्खियां बनायी गयीं. शायद यह अतिरजित भंगिमा इसलिए अपनायी गयी थी कि लोग यह भूल जायें कि किस तरह से बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने गुजरात विधानसभा को कम महत्व दिया था. संसद में भी उनका रिकॉर्ड कोई बहुत अच्छा नहीं है. राज्यसभा, जहां भाजपा को बहुमत नहीं है, में उनकी उपस्थिति न के बराबर रही है. समूचे विपक्ष की साझा अपील के बावजूद उन्होंने अपने सांसदों और मंत्रियों के भड़काऊ बयानों पर एक महत्वपूर्ण बहस में शामिल होने से मना कर दिया. क्या वे अटल बिहारी वाजपेयी की तरह सचमुच में लोकतांत्रिक हैं या वे ऐसा होने का दिखावा भर करते हैं? देश इसका उत्तर जानना चाहता है.
अन्य कुछ विरोधाभास भी हैं. मोदी कहते हैं कि वे लोगों को काम की जिम्मेवारी देना पसंद करते हैं, लेकिन इस बात के ढेरों सबूत हैं कि सच इसके ठीक विपरीत है. लग रहा है कि सारी ताकत प्रधानमंत्री कार्यालय में केंद्रित हो गयी है, और कुछ रिपोर्टो के अनुसार, वहां फाइलों का अंबार लग गया है. ये फाइलें प्रधानमंत्री द्वारा देखे जाने के इंतजार में हैं, क्योंकि सिर्फ वे ही हर मामले में निर्णय लेने के अधिकारी हैं, यहां तक कि बिना उनकी शाही मंजूरी के कैबिनेट मंत्री अपने निजी सचिवों की नियुक्ति भी नहीं कर सकते हैं. मोदी का प्रचार तंत्र कहता है कि वे टीम के साथ काम करनेवाले व्यक्ति हैं, लेकिन उनके कई मंत्री और अधिकारी ही इस बात से सहमत नहीं हैं, जिनसे मैंने गुजरात में बात की है. दरअसल, गुजरात में अपने वास्तविक या संभावित प्रतिद्वंद्वियों का उनके द्वारा किया गया सुविचारित ‘सफाया’ मोदी के साथ लेकर चलने की क्षमता को नकारता है. मोदी अपनी छवि को विस्तार देने के लिए मीडिया का पुरजोर उपयोग करते हैं, लेकिन पत्रकारों का कहना है कि वे तात्कालिक या पहले से बिना तय बातचीत की अनुमति नहीं देते हैं तथा बातचीत के लिए सिर्फ उन्हीं अवसरों को चुनते हैं, जहां वे आश्वस्त रहते हैं कि कोई अप्रत्याशित प्रश्न नहीं पूछा जायेगा.
मोदी के व्यापक और बड़े व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द रहस्यों का घेरा है. किसी को भी मालूम नहीं है कि वास्तविक मोदी कौन हैं. तो क्या उनके चारों ओर बहुत सोच-समझ कर तैयार किया गया विस्तृत प्रचार तंत्र वास्तविक नरेंद्र मोदी से बिल्कुल भिन्न आवरण खड़ा करने में कामयाब हो गया है? मौजूद सबूत तो यही संकेत कर रहे हैं. देश को यह बताया जाना बहुत जरूरी है कि उसके प्रधानमंत्री हकीकत में कैसे हैं. कभी-न-कभी मिथक और यथार्थ अवश्य ही अलग-अलग होंगे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि छवि गढ़नेवाले कितने शक्तिशाली हैं.
पवन के वर्मा
सांसद एवं पूर्व प्रशासक
pavankvarma1953@gmail.com
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