वादों को धरातल पर उतारने की दरकार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने निवेशकों और उद्यमियों को फिर आश्वस्त किया है कि उनकी सरकार भारत में बेहतर व्यापारिक और वाणिज्यिक माहौल बनाने के लिए प्रतिबद्ध है. यह सुखद है कि प्रधानमंत्री इस प्रयास में प्रवासी भारतीयों समेत अन्य देशों को भी साथ लेकर बढ़ना चाहते हैं. आर्थिक विकास के वादे पर सत्ता में आयी […]
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने निवेशकों और उद्यमियों को फिर आश्वस्त किया है कि उनकी सरकार भारत में बेहतर व्यापारिक और वाणिज्यिक माहौल बनाने के लिए प्रतिबद्ध है. यह सुखद है कि प्रधानमंत्री इस प्रयास में प्रवासी भारतीयों समेत अन्य देशों को भी साथ लेकर बढ़ना चाहते हैं. आर्थिक विकास के वादे पर सत्ता में आयी मोदी सरकार ने बीते दिनों कुछ ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय लिये हैं, जिनसे प्रधानमंत्री के आश्वासन में भरोसा बनता है.
भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन, कोयला खदानों की नीलामी शुरू करना, बीमा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाना, योजना आयोग की जगह नीति आयोग की स्थापना सहित विभिन्न क्षेत्रों में निवेश की मंजूरी और प्रक्रियाओं को आसान बनाना आदि ऐसे प्रयास हैं, जिनसे आर्थिक सुधारों की गति तेज करने के संकेत मिलते हैं. बीते सितंबर में मोदीजी ने कहा था कि उनका लक्ष्य भारत को उन 50 देशों में शामिल करना है, जहां व्यापार करना सबसे सुगम है.
इस बयान के महीने भर बाद विश्व बैंक ने इस श्रेणी में भारत को 189 देशों की सूची में 142वें स्थान पर रखा था. ऐसे में निश्चित रूप से चुनौती बहुत बड़ी है. यह सही है कि सरकार ने पिछले दिनों में कई अहम निर्णय लिये गये हैं, किंतु संबद्ध पक्षों को विश्वास में न ले पाने के कारण विरोध के स्वर भी तेज हो रहे हैं. कोयला मजदूरों की हड़ताल इसका बड़ा उदाहरण है. किसानों और बीमा कर्मचारियों में भी रोष है. हालांकि, युवाओं को मोदी सरकार से बहुत उम्मीदें हैं.
अगर ‘मेक इन इंडिया’ के साथ निवेश की कोशिशें आगे बढ़ती हैं, तो युवाओं के लिए रोजगार के नये अवसर पैदा होंगे. कर-व्यवस्था को सरल बनाने के प्रस्ताव से व्यापारियों में भी उत्साह है. अब जरूरत यह है कि व्यापक सहमति बनाते हुए प्रधानमंत्री वादों और घोषणाओं को अमली जामा पहनाना शुरू करें. देश में युवाओं की बड़ी संख्या है, संसाधन हैं, बड़ा बाजार है, और कौशल, उद्यमशीलता एवं व्यापारिक अनुभव भी हैं. ऐसे में सरकार को सजग व सचेत संचालक की भूमिका निभानी है. हालांकि निर्यात में कमी, रुपये की कीमत एवं विदेशी मुद्रा भंडार में उतार-चढ़ाव और अपेक्षित निवेश न होने से चिंताएं बढ़ी हैं, लेकिन अगर सरकार व्यवहार के धरातल पर सक्रिय हो, तो अर्थव्यवस्था की बेहतरी बिल्कुल संभव है.
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