फॉर्मूले में सिमटा रहा हिंदी सिनेमा

Published at :31 Dec 2014 5:04 AM (IST)
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फॉर्मूले में सिमटा रहा हिंदी सिनेमा

हर वर्ष की तरह 2014 की भी खासियत रही कि ऐसी फिल्में थोक के भाव आयीं, जिसने दर्शकों को तो निराश किया, लेकिन दर्शकों ने उन्हें निराश नहीं किया. इसमें अव्वल तो कहने को हिंदी सिनेमा की अब तक की सबसे ज्यादा कलेक्शन वाली फिल्म ‘हैप्पी न्यू इयर’ ही मानी जा सकती है. फराह खान […]

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हर वर्ष की तरह 2014 की भी खासियत रही कि ऐसी फिल्में थोक के भाव आयीं, जिसने दर्शकों को तो निराश किया, लेकिन दर्शकों ने उन्हें निराश नहीं किया. इसमें अव्वल तो कहने को हिंदी सिनेमा की अब तक की सबसे ज्यादा कलेक्शन वाली फिल्म ‘हैप्पी न्यू इयर’ ही मानी जा सकती है. फराह खान की इस फिल्म को जितनी बुराइयां मिलीं ‘हमशकल्स’ के अलावे शायद ही हिंदी की किसी फिल्म को मिली होगी.

हिंदी सिनेमा के दर्शकों और अदर्शकों के बीच ‘पीके’ जिस तरह चर्चा के केंद्र में है, यह माना जा सकता है कि साल की सबसे कमाई करनेवाली ही नहीं, सबसे चर्चित फिल्म के रूप में भी याद की जाती रहेगी. और निश्चित रूप से यह हिंदी सिनेमा की सीमा ही मानी जायेगी कि आमिर खान जैसे ‘परफेक्शनिस्ट’ और राज कुमार हिरानी जैसे संवेदनशील फिल्मकार भी इतनी कुशलता से बनायी फिल्म में सदियों से दोहरायी जा रही बात को ही बस दोहरा भर सके. जो समाज कबीर के साथ पला बढ़ा हो, ‘पीके’ में मनोरंजन के अलावा वह कुछ और कैसे ढूंढ़ सकता है. लेकिन कुछ लोग ढूंढ़ रहे हैं, उन्हें लग रहा है कि ‘पीके’ में धर्म विशेष को निशाना बनाया गया है. सवाल है कि ये कौन लोग हैं, इनकी पहचान क्या है, यदि इनकी कोई विश्वसनीयता है, तो फिर ‘पीके’ को 250 करोड़ देनेवाले वे दर्शक कौन हैं?

वास्तव में विवाद अब प्रमोशन के एक रूप में शामिल कर लिया जाने लगा है, आमिर के पास फिल्म ‘फना’ का अनुभव है, जब विवादों के कारण गुजरात में देर से प्रदर्शित होने के बाद भी ‘फना’ हिट हो गयी थी. ‘पीके’ को लेकर फिल्म प्रमोशन के लिए चर्चित एक चैनल विशेष ने सभी महत्वपूर्ण खबरों को छोड़ कर धर्म के गुमनाम ठेकेदारों के साथ विरोध के अभियान की शुरुआत की, और उम्मीद के अनुरूप विरोध मुखर होता गया. बाबा रामदेव और सुब्रrाण्यम स्वामी जैसे स्थायी विरोधी भी इस विरोध में शामिल हो गये. कमाल यह कि लाल कृष्ण आडवाणी ने ‘पीके’ की भूरी-भूरी प्रशंसा की. वास्तव में आडवाणी उन करोड़ों दर्शकों का प्रतिनिधित्व करते लगते हैं, जो सिनेमा को सिनेमा के रूप में ही स्वीकार करते हैं. उनकी तमाम आस्थाएं-अनास्थाएं अपनी जगह और सिनेमा अपनी जगह, जिसके बेहतर होने का उन आस्थाओं से कोई सरोकार नहीं. उल्लेखनीय है कि बाक्स ऑफिस पर धीमी शुरुआत वाली ‘पीके’ को विवाद का लाभ भी मिला और जहां आम तौर पर कलेक्शन में कमी आती है, इसके कलेक्शन में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई.

वास्तव में 2014 की फिल्मों को याद करने की कोशिश करें, तो दर्जन भर से ज्यादा ऐसी फिल्में दिखायी देती हैं, जिन्होंने पूरी संजीदगी के साथ समकालीन समस्याओं को कुरेदते हुए दर्शकों के साथ संवाद करने की कोशिश की. अफसोस हिंदी सिनेमा के व्यावसायिक गणित के सामने उनकी सार्थकता घुटने टेकने को मजबूर होती रही, इसका कारण कहीं प्रमोशन का बजट रहा, तो कहीं बड़े सितारों की अनुपस्थिति, तो कहीं वितरकों और सिनेमाघरों की अरुचि. सुरक्षा के बहाने आमजन की समस्याएं बढ़ाती जेड सिक्यूरिटी जैसे अछूते विषय पर बनी डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी की ‘जेड प्लस’ कुछ जाने पहचाने चेहरों, अपनी जबर्दस्त कहानी, संवाद और भरसक मार्केटिंग की कोशिशों के बावजूद मल्टीप्लेक्सों के मार्निग शो तक सिमटी रह गयी.

एक ‘जेड प्लस’ ही नहीं, अपनी ईमानदारी और उद्देश्य के लिए शहीद होनेवाले मंजूनाथ को चित्रित करती संदीप ए वर्मा की ‘मंजूनाथ’, लोकसभा चुनाव के ठीक पहले राजनीति, पैसे और सांप्रदायिकता के गठजोड़ को साफ करती फिरोज अब्बास खान की ‘देख तमाशा देख’, शहरी मध्यवर्ग की समस्याओं को रेखांकित करती रजत कपूर की ‘आंखों देखी’, बांग्लादेश के मुद्दे पर नये सिरे से सोचने को बाध्य करती ‘चिल्ड्रेन ऑफ वार’, विभाजन के औचित्य पर सवाल खड़े करती विजय राज की ‘क्या दिल्ली क्या लाहौर’ जैसी फिल्में अधिकांश सिनेमाघरों तक पहुंच भी नहीं सकीं. लेकिन यही वे फिल्में हैं, जिनकी बुनियाद पर आमिर खान जैसे सितारे आज ‘पीके’ जैसी फिल्म बनाने और उसके 300 करोड़ कमाने की कल्पना कर सकते हैं. इन कम बजट की फिल्मों ने कमाई अवश्य नहीं की, लेकिन टेलीविजन, वीडियो और फिल्म समारोहों के माध्यम से दर्शकों तक अपनी पहुंच बनायी और उनके मन में सोद्देश्य सार्थक फिल्मों की भूख पैदा की.

कहीं न कहीं सार्थकता और सामाजिक सरोकारों का यही दबाव रहा कि आमिर खान ही नहीं, 2014 में सलमान खान को भी ‘किक’ और ‘जय हो’ के लिए तैयार होना पड़ा. सच यही है कि 2014 में सिनेमा सामाजिक सरोकारों से जुड़ने के लिए बेचैन दिखा. शायद यही कारण है कि महिला उत्पीड़न के लिए चर्चित इस वर्ष में ‘मैरी कॉम’, ‘मरदानी’, ‘क्वीन’, ‘हाइवे’, ‘हंसी तो फंसी’, ‘रिवाल्वर रानी’ और ‘गुलाब गैंग’ जैसी फिल्में महिला विमर्श के नये-नये आयामों के साथ आयीं. 2014 में बनी ‘हंसी तो फंसी’, ‘क्वीन’ और ‘हाइवे’ जैसी फिल्में सेक्स से महिलाओं की पहचान अलग कर देखने की कोशिश करती हैं. वास्तव में ये तीनों फिल्में महिलाओं के मानसिक सशक्तिकरण को प्रतिबिंबित करती है, जबकि इसके विपरीत ‘गुलाब गैंग’, ‘मरदानी’, ‘रिवाल्वर रानी’ और ‘बॉबी जासूस’ जैसी फिल्में महिलाओं के लिए शारीरिक रूप से सशक्त होने का संदेश लेकर आयी हैं.

यहां निश्चित रूप से ‘मैरी कॉम’ को एक विशिष्ट फिल्म के रूप में याद किया जायेगा, जिसमें शारीरिक और मानसिक सशक्तता का संतुलन देखा जा सकता है. वाकई हिंदी सिनेमा के वैचारिक रूप से समृद्ध होते जाने का ही यह प्रतीक माना जा सकता है कि दोहराव के लिए ख्यात हिंदी सिनेमा में एक ही मुद्दे पर बनी सभी फिल्मों में कहानियां अलग-अलग जमीन पर विकसित होती दिखीं. यह अलग बात है कि साल की शुरुआत भले ही ‘जो भी करवालो’ जैसी निर्थक फिल्म और ‘शोले’ जैसी कालजयी फिल्म के 3डी रूपांतरण की निर्थक कोशिशों के साथ हुई थी. बाद के दिनों में बच्चों पर संवेदनशील फिल्म ‘हवा हवाई’ के साथ ‘हैदर’, ‘सिटी लाइट्स’, ‘जल’, ‘भूतनाथ रिटर्न्‍स’, ‘भोपाल-ए प्रेयर फॉर रैन’ और ‘सोनाली केबल’ जैसी समकालीन सवालों से टकराती फिल्में भी हमारे सामने आयीं.

हर वर्ष की तरह 2014 की भी खासियत रही कि ऐसी फिल्में थोक के भाव आयीं, जिसने दर्शकों को तो निराश किया, लेकिन दर्शकों ने उन्हें निराश नहीं किया. इसमें अव्वल तो कहने को हिंदी सिनेमा की अब तक की सबसे ज्यादा कलेक्शन वाली फिल्म ‘हैप्पी न्यू इयर’ ही मानी जा सकती है. फराह खान की इस फिल्म को जितनी बुराइयां मिलीं ‘हमशकल्स’ के अलावे शायद ही हिंदी की किसी फिल्म को मिली होगी. पता नहीं यह शाहरुख खान से दर्शकों का प्रेम था या अभिषेक बच्चन से सहानुभूति कि पानी पी-पी कर कोसने के बावजूद इस फिल्म को देखना जरूरी समझा. इस फिल्म ने एकबार फिर हिंदी सिनेमा में स्टार पावर को स्थापित किया. हालांकि इन्हीं दर्शकों ने अजय देवगन की ‘एक्शन जैक्शन’, अक्षय कुमार की ‘होली डे’ और ‘द शौकींस’, सैफ अली खान की ‘हमशकल्स’ और ‘हैप्पी एंडिंग’ को खारिज करने में जरा भी संकोच नहीं किया. कह सकते हैं 2014 में छोटे-छोटे बजट के साथ नयी कहानियों के लिए गुंजाइश बढ़ती दिखी, लेकिन हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा अपने ही तय फॉमरूले में सिमटी रही.

विनोद अनुपम

फिल्म समीक्षक

vinodanupam@yahoo.co.in

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