ईश्वर को स्वयंभू संतों से बचाएं

Published at :23 Nov 2014 11:25 PM (IST)
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ईश्वर को स्वयंभू संतों से बचाएं

जब यह व्यापार हद से बाहर जाये, तो राज्य को व्यवस्था बहाल करना चाहिए, लेकिन इसका स्थायी समाधान पुलिस नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व की प्रबोधक क्षमता है. ईश्वर को उसके स्वयंभू संतों से बचाने के लिए हमारे नेताओं को आगे आना होगा. धर्म की शक्ति निश्चित रूप से उसके उत्तर देने की क्षमता में निहित […]

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जब यह व्यापार हद से बाहर जाये, तो राज्य को व्यवस्था बहाल करना चाहिए, लेकिन इसका स्थायी समाधान पुलिस नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व की प्रबोधक क्षमता है. ईश्वर को उसके स्वयंभू संतों से बचाने के लिए हमारे नेताओं को आगे आना होगा.

धर्म की शक्ति निश्चित रूप से उसके उत्तर देने की क्षमता में निहित है. लेकिन जब तब धर्म का कोई स्वयंभू ठेकेदार सामने आ जाता है, जैसा कि अभी हमने हरियाणा में देखा, जो कई सवाल खड़े कर देता है. कम-से-कम मेरी राय में, धर्म तार्किकता का प्रतिकार नहीं है, लेकिन कहीं-न-कहीं उसे संदेह से जरूर देखता है. धर्म का उद्गम आस्था से होता है, और आस्था मस्तिष्क सीमा से परे है, और ऐसा तब तक रहेगा, जब तक मनुष्य का मस्तिष्क, जो अस्तित्व की रचना का एक हिस्सा है, अस्तित्व के औचित्य या मृत्यु का अर्थ जानने में सक्षम नहीं हो जाता है.

सिर्फ नास्तिक ही मृत्यु में विश्वास रखते हैं. जो इसके बारे में अनिश्चित हैं, उनके लिए मृत्यु अज्ञात की ओर एक कदम है. आस्थावानों के लिए मृत्यु दिव्य परिक्षेत्र की ओर प्रयाण है, जिसकी पूरी प्रकृति पृथ्वी पर किये कर्मो के अनुरूप निर्धारित होती है. समझ की इस कड़ी पर भरोसा एक व्यापक नैतिक व्यवस्था का आधार बनता है. हालांकि, दैवीय सत्ता ने मनुष्य की पूरी संरचना में मुक्त विचार का तत्व सेकर अनैतिकता के लिए भी गुंजाइश छोड़ दी है. अगर हम इस तर्क को एकदम ठोस रूप में लागू करते हैं, तो कहा जा सकता है कि बर्बरता नास्तिकता की चरम अभिव्यक्ति है, क्योंकि जो लोग दिव्यता की रचनात्मकता और उसकी प्रशांत प्रतिभा को अस्वीकार करते हैं, वही क्रूरता, हत्या या उत्पात में संलग्न हो सकते हैं. जब निरंकुश शासक आस्था के नाम पर बर्बरता करते हैं, तब? यह संयोग नहीं है कि सभी धर्मो ने पाखंडियों के लिए नर्क में विशेष जगह निर्धारित किया हुआ है.

एक पेचीदा मसला नैतिकता की स्वीकार्य परिभाषा निर्धारित करना है. अकसर शासक वर्गो ने इस कार्य को हथिया कर अपने आर्थिक और राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए नैतिकता का मानदंड गढ़ा है.

ऐसे अन्यायों के लिए धर्म एक व्यावहारिक वाहन का कार्य करता है. और इसी कारण, 18वीं सदी के आखिरी हिस्से में जब फ्रांसीसियों ने क्रांति की, तो उसी उग्रता से उन्होंने कैथोलिक चर्च को नष्ट किया, जितनी निर्दयता से उन्होंने राजाओं, रानियों और राजकुमारों के सिर काटे थे. लोगों ने इन पर खुशी जाहिर की थी और उल्लास मनाया था. जब कार्ल मार्क्‍स ने इसे और अधिक वैचारिक गूढ़ता देते हुए धर्म को जनता का अफीम कहा और सामाजिक प्रबंधन से धार्मिक संस्थाओं को पूरी तरह से हटा दिया, तो उनके विचारों को दो महादेशों में कई पीढ़ियों तक ग्राह्यता मिली, विशेषकर उन समाजों में जहां जनता बौद्धिक और आर्थिक जड़ता की शिकार थी.

फिर भी, फ्रांस में क्रांतिकारियों की उम्मीदों के उलट कैथोलिक संप्रदाय का शीघ्र ही पुनर्उभार हुआ. महान तार्किक रॉब्सपियरे ने फ्रांसीसियों की ईश्वर की जरूरत को तुष्ट करने के लिए हरक्युलिस की तर्ज पर महादेवता गढ़ने की कोशिश की, लेकिन, अफसोस, यह भी उसके सिर को कटने से न बचा सका. रूस में रुढ़िवादी ईसाईयत और चीन में कंफ्युसियस-बौद्ध-ईसा विभिन्न संकटों के बावजूद टिके हुए हैं. पुतिन जैसे सोवियत उत्तराधिकारी अब रूढ़िवादी चर्च के प्रति अपनी आस्था जताते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि रूसियों को जीने के लिए सिर्फ रोटी की ही जरूरत नहीं है. फाइनांसियल टाइम्स की एक हालिया रिपोर्ट को मानें, तो लाल चीन में आस्थावान ईसाईयों की संख्या कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों से अधिक है. चीन और हांग कांग एक देश, लेकिन दो राज्य हैं, जिनमें पहला नास्तिक है और दूसरे में आस्था एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है. बीजिंग में सत्ता हावी है, तो हांग कांग में विचारों का परस्पर संघर्ष है. अगले बीस वर्षो में इनमें कौन विजयी होगा? आप हांग कांग पर दावं लगा सकते हैं. आप बहुत फायदे में रहेंगे.

भारत में धर्म को चुनौती देनेवाली हर कोशिश नाकाम रही है. अफीम सिद्धांत असफल रहा, क्योंकि हिंदू स्वर्ग में अमृत के लिए और मुसलमान जन्नत में तस्नीम (शुद्धतम स्वर्गिक जल) के लिए आकांक्षी हैं. लेकिन यहां गंभीर बहस का अभाव मूर्खता के प्रति भारतीयों की बढ़ती भूख का एक कारण हो सकता है. वर्तमान भारत को नास्तिकता या इसके अन्य रूपों से नहीं, बल्कि सभी धर्मो में पाये जानेवाले पाखंडी तत्वों से है, जो अपने को आस्था का प्रतिनिधि बता कर बेचते हैं. यह भी कहा जाना चाहिए कि सभी साधु-संत और इमाम भ्रष्ट नहीं हैं. लेकिन जब कोई रामपाल जैसा व्यक्ति धर्म की दुकान लगा नगदी लेकर मुक्ति बेचने लगे, तो यह चिंता की बात है. यह भ्रम का सौदा है, जिसे धूर्तता की आड़ में बेचा जा रहा है. जब यह व्यापार हद से बाहर जाये, तो राज्य को व्यवस्था बहाल करना चाहिए, लेकिन इसका स्थायी समाधान पुलिस नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व की प्रबोधक क्षमता है. ईश्वर को उसके स्वयंभू संतों से बचाने के लिए हमारे नेताओं को आगे आना होगा.

एमजे अकबर

प्रवक्ता, भाजपा

delhi@prabhatkhabar.in

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