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दबावों के बावजूद झुके नहीं, खत्म कर दी चौटाला की नेतागीरी

Updated at : 17 Nov 2014 6:42 AM (IST)
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दबावों के बावजूद झुके नहीं, खत्म कर दी चौटाला की नेतागीरी

पांच बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रह चुके इंडियन नेशनल लोकदल के सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला शिक्षक घोटाले में फंसे थे. सीबीआइ अदालत में मामले की सुनवाई कर रहे थे न्यायाधीश विनोद कुमार. अदालत के बाहर हजारों समर्थकों की उग्रता और भारी राजनीतिक दबाव भी उन्हें डिगा नहीं सका. आइए पढ़ें – जयंत श्रीराम उत्तर-पश्चिम दिल्ली की […]

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पांच बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रह चुके इंडियन नेशनल लोकदल के सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला शिक्षक घोटाले में फंसे थे. सीबीआइ अदालत में मामले की सुनवाई कर रहे थे न्यायाधीश विनोद कुमार. अदालत के बाहर हजारों समर्थकों की उग्रता और भारी राजनीतिक दबाव भी उन्हें डिगा नहीं सका. आइए पढ़ें –
जयंत श्रीराम
उत्तर-पश्चिम दिल्ली की रोहिणी अदालत का अहाता पिछले साल 22 जनवरी को युद्ध के मैदान जैसा दिख रहा था. इंडियन नेशनल लोकदल (आइएनएलडी) के करीब चार-पांच हजार समर्थक परिसर के बाहर इकट्ठा थे. उन्होंने पथराव किया, पेट्रोल बम फेंके और परिसर में हंगामा करने की कोशिश की. आखिरकार पुलिस को आंसूगैस का इस्तेमाल करना पड़ा. उनका निशाना दरअसल परिसर की चौथी मंजिल पर मौजूद कोर्टरूम था.
वहां विशेष सीबीआइ अदालत के विशेष जज विनोद कुमार ने पांच बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रह चुके ओमप्रकाश चौटाला और उनके बेटे अजय चौटाला को भ्रष्टाचार के आरोप में 10 साल जेल की सजा सुनाई थी.
वर्ष 2000 में गैर-कानूनी तरीके से 3,206 शिक्षकों की भरती करने के मामले में पुलिस ने एक हफ्ते पहले ही चौटाला पिता-पुत्र समेत 53 अन्य दोषियों को गिरफ्तार किया था. इस फैसले से चौटाला 16 साल के लिए राजनीति के चुनावी खेल से बाहर हो गये और हरियाणा का राजनैतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया.
वकील बताते हैं कि यह मामला एक बड़े सियासी शख्स से जुड़ा हुआ था और इसमें काफी राजनैतिक दबाव भी काम कर रहा था. इसके बावजूद विनोद कुमार पिछले दो साल से बेखौफ होकर इस मुकदमे की सुनवाई कर रहे थे. उन्होंने चौटाला की इस याचिका को गैर-जरूरी बताते हुए खारिज कर दिया कि मामले से जुड़ी मूल एफआइआर में उनका नाम नहीं है. इतना ही नहीं, सजा सुनाते हुए स्वास्थ्यगत कारणों से उनके साथ नरमी बरतने से भी इनकार कर दिया.
विनोद कुमार के लिए कठिन और विवादास्पद मुकदमे कोई नयी बात नहीं हैं. 2008 में नयी दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में बतौर अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश उन्होंने पूर्व नौसेना प्रमुख एसएम नंदा के पोते संजीव नंदा को पांच साल कैद की सजा सुनाई थी. नंदा पर एक हिट एंड रन मामले में तीन पुलिसकर्मियों समेत छह लोगों को मारने का आरोप था. विनोद कुमार की अदालत में मामला आने से पहले मुकदमा नौ साल तक खिंचता रहा.
2007 में विनोद कुमार ने कनॉट प्लेस शूटिंग मामले में भी फैसला सुनाया, जिसमें उन्होंने पूर्व असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर एसएस राठी समेत दिल्ली के नौ पुलिसवालों को दोषी करार दिया. उन पर दो व्यवसायियों को जान से मारने और तीसरे को घायल करने का आरोप था. यह घटना मार्च, 1997 की है, जब एसीपी राठी के नेतृत्व में दिल्ली पुलिस क्र ाइम ब्रांच की अंतरराज्यीय शाखा एक कार का पीछा कर रही थी.
उस कार में गैंगस्टर यासीन के होने का शक था. पुलिस की टीम ने कनॉट प्लेस में स्टेट्समैन हाउस के पास कार को किनारे लगवाया और फायरिंग की. इस दौरान कार में सवार दो लोग मारे गये. यह एहसास होने के बाद कि उन्होंने दो निदरेष व्यवसायियों को मारा है, उन्होंने यह सिद्ध करने की कोशिश की कि शुरु आती फायरिंग कार से हुई थी. उन्होंने कार में झूठे सबूत पैदा करने की भी कोशिश की. विनोद कुमार ने सभी दोषी पुलिस अधिकारियों को उम्रकैद की सजा सुनाई.
साभार : इंडिया टुडे
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