नये-नये जुमलों से लुभाते नरेंद्र मोदी

Published at :07 Oct 2014 5:26 AM (IST)
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नये-नये जुमलों से लुभाते नरेंद्र मोदी

।। आकार पटेल ।। (वरिष्ठ पत्रकार) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्ष इंडिया टुडे की गोष्ठी में अपने भाषण में कहा था, (मेरा) कोई मंत्र नहीं है, मैं मंत्र और तंत्र की दुनिया से बहुत दूर हूं. वह भले ही स्वयं यह नहीं मानते हों कि काम करने का उनका तरीका सूत्रबद्ध है, लेकिन जैसा […]

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।। आकार पटेल ।।

(वरिष्ठ पत्रकार)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्ष इंडिया टुडे की गोष्ठी में अपने भाषण में कहा था, (मेरा) कोई मंत्र नहीं है, मैं मंत्र और तंत्र की दुनिया से बहुत दूर हूं. वह भले ही स्वयं यह नहीं मानते हों कि काम करने का उनका तरीका सूत्रबद्ध है, लेकिन जैसा कि हम देख सकते हैं, यह सच नहीं है. इसमें कोई सवाल नहीं है कि वे एक उत्कृष्ट वक्ता हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जैसे कुछ ही राजनेता दुनिया में हैं, भारत में तो और कोई भी नहीं है, जो लोगों से संवाद स्थापित करने में उनके जैसा माहिर है. यह भी सच है कि नरेंद्र मोदी पेचीदा मसलों को नारों और फॉर्मूलों में बदल देना पसंद करते हैं. वे अनुप्रास अलंकार, शॉर्ट फॉर्म, लय आदि का खूब प्रयोग करते हैं.

स्क्रॉल वेबसाइट ने नरेंद्र मोदी के इस अंदाज पर लिखा है कि वाक्पटुता की प्रधानमंत्री की शैली साधारण अवधारणाओं और मुहावरों को सारगर्भित और अपने प्रशंसकों के लिए आकर्षक बना देने की है. चुनाव अभियान के दौरान और भारतीय राजनीति में शिखर पर पहुंचने के बाद से नरेंद्र मोदी हमारी शब्दावली में शॉर्ट फॉर्म वाले शब्दों और आकर्षक मुहावरों की संख्या जोडे़ चले जा रहे हैं, जो मोदी सरकार की पहचान बन रहे हैं.

हाल में मोदी ने उन थ्री डी का उल्लेख किया, जो केवल भारत के पास हैं. उन्होंने कहा कि दुनिया एशिया की तरफ देख रही है, लेकिन उसे नहीं मालूम है कि जाना कहां है. जो देश निवेश के इच्छुक हैं, उन्हें हमें अपना पता देना है. डेमोग्राफिक डिविडेंड, डेमोक्रेसी और डिमांड, ये तीनों (थ्री डी) भारत में हैं और एशिया में केवल भारत में ही हैं. इस फार्मूले का इस्तेमाल उन्होंने जापान यात्रा में भी किया था. इकोनॉमिक टाइम्स अखबार ने दो सितंबर की रिपोर्ट में इसका उल्लेख किया था.

अनुप्रास, यानी एक ही अक्षर से शुरू हुए शब्दों का लगातार प्रयोग, मोदी का पसंदीदा अस्त्र है. उन्होंने ब्रांड इंडिया बनाने की बात करते हुए ह्यफाइव टीह्ण का उल्लेख किया था. उनके मुताबिक ये पांच टी हैं- टैलेंट (प्रतिभा), ट्रेडिशन (परंपरा), टूरिज्म (पर्यटन), ट्रेड (व्यापार) और टेक्नोलॉजी (तकनीक). अपनी सरकार के बजट का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने 10 जुलाई को कहा था कि विकास के लिए थ्री एस – समावेशक, सर्वदेशक, सर्वस्पर्शी का होना जरूरी है. इसका मतलब यह है कि विकास समावेशी हो और हर किसी तक पहुंचे.

अपनी सरकार के लिए प्रधानमंत्री ने फोर पी का मंत्र दिया है. उनके अनुसार, अगर हम सुशासन लागू करना चाहते हैं, तो हमें फोर पी की ओर ध्यान देना होगा- पीपुल, प्राइवेट, पब्लिक, पार्टनरशिप. हमें पीपीपी से पीपीपीपी की ओर बढ़ने की जरूरत है. मैं पीपीपी और पीपीपीपी में अंतर को लेकर निश्चिंत नहीं हूं, क्योंकि दोनों एक ही तात्पर्य को व्यक्त करते हैं. मेरा अनुमान है कि मोदी इस मुहावरा को अपना बनाना चाहते हैं और उन्होंने सोचा होगा कि पीपीपी का प्रयोग बहुत ज्यादा हो चुका है, तो उन्होंने उसमें मामूली फेरबदल कर दिया.

अनुप्रास का ऐसा ही एक जुमला फाइव एफ फॉर्मूला भी है. यह वस्त्र उद्योग को एकीकृत करने का उनका दृष्टिकोण है, जिसके शब्द हैं- फार्म से फाइबर, फाइबर से फैब्रिक, फैब्रिक से फैशन, फैशन से फॉरेन. इसी क्रम में एक अन्य ह्यथ्री पी भी है. 14 अगस्त को जी न्यूज ने खबर दी थी कि लेह-लद्दाख के लिए मोदी ने प्रकाश, पर्यावरण और पर्यटन (थ्री पी) का फॉर्मूला देते हुए कहा कि अगर इन तीनों का समुचित इस्तेमाल हो तो देश को फायदा होगा. इसी तरह उन्होंने थ्री एस का सूत्र दिया है. डीएनए की नौ जून की एक रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि चीन के साथ प्रतियोगिता करने के लिए देश को स्किल, स्केल और स्पीड (थ्री एस) की जरूरत है.

चुनाव अभियान के दौरान मोदी ने थ्री एके की बात कही थी. उन्होंने कहा था, पाकिस्तान में तीन एके की प्रशंसा होती है- एके 47, एके एंटनी और एके 49, जिन्होंने नयी पार्टी बनायी है. एके एंटनी तब देश के रक्षा मंत्री थे, जो बकौल मोदी पाकिस्तान के प्रति नरम रवैया रखते थे. आखिरी एके से उनका तात्पर्य अरविंद केजरीवाल से था.

पी टू जी टू मोदी का एक और फॉर्मूला है. इकोनॉमिक टाइम्स की छह फरवरी की एक रिपोर्ट के अनुसार मोदी ने कहा था कि हमें पी टू जी टू- प्रो पीपल गुड गवर्नेंस की जरूरत है.ह्ण कई बार मोदी कोई शानदार मुहावरा गढ़ने में भी कामयाब हुए हैं. उदाहरण के लिए भारत को निवेश का केंद्र बनाने के लिए देश की छवि बदलने के उनके वादे को ले सकते हैं- रेड टेप से रेड कारपेट तक.

हालांकि, कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी बिना जरूरत के चालाकी करने की बेजा कोशिश करते हैं. उदाहरण के लिए, उनके नारे स्कैम इंडिया से स्किल इंडिया तक को ले सकते हैं. चीन के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के पूर्व मोदी ने नारा दिया था कि इंच (इंडिया-चीन) से माइल्स (मिलिनियम ऑफ एक्सेप्शनल सिनर्जी) की ओर.

25 सितंबर को रेडिफ ने खबर दी कि मोदी ने एफडीआइ का मतलब बदलते हुए फॉरेन डाइरेक्ट इंवेस्टमेंट से फर्स्ट डेवेलप इंडिया कर दिया है. मोदी ने कहा कि सरकार किसके लिए है? यह हर भारतीय के लिए है. यह सबसे गरीब लोगों के लिए है. लोग एफडीआइ के बारे में बात कर रहे हैं, लेकिन मेरा नजरिया अलग है. एफडीआइ भारत के लोगों की जिम्मेवारी भी है. दुनिया के लिए एफडीआइ एक अवसर है. एफडीआइ का एक मतलब फर्स्ट डेवेलप इंडिया भी होना चाहिए. इसी तारीख को इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया कि मोदी ने कहा कि भारत नेपाल को हिट के द्वारा तीन तरीके से मदद करना चाहता है. हिट- हाइवेज, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और ट्रांसमिशन लाइंस.

मोदी बोलने में हमेशा औपचारिकता पसंद नहीं करते हैं. यही कारण है कि वे एक उत्कृष्ट वक्ता हैं. उन्होंने हमें कुछ बडे़ अच्छे नारे दिये हैं, जैसे- पहले शौचालय, फिर देवालय, सबका साथ, सबका विकास और अबकी बार, मोदी सरकार. एक बार उन्होंने कहा कि हमें फाइल में लाइफ डालने की जरूरत है. सिर्फ सुविधाएं बढ़ाना काफी नहीं है, लोगों के जीवन-स्तर में बेहतरी भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

इंडिया टुडे की उसी गोष्ठी में, जहां उन्होंने दावा किया था कि वे मंत्रों में भरोसा नहीं करते हैं, कानूनों पर बोलते हुए उन्होंने कहा था कि देश को एक्ट की नहीं, एक्शन की आवश्यकता है. इस बात में जोड़ते हुए कहा जा सकता है कि जरूरी एक्शन के लिए देश को ज्यादा नारों की आवश्यकता नहीं है.

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