छुआछूत में हमसे बढ़ कर कौन!

Published at :05 Oct 2014 11:50 PM (IST)
विज्ञापन
छुआछूत में हमसे बढ़ कर कौन!

राजनीति में अस्पृश्यता भले ही खत्म हो गयी हो, लेकिन यह समाज की जड़ों में गहरे बैठी हुई है. मिसाल के लिए आप अखबारों में जातीय झड़पों और जाति के आधार पर भेदभाव की खबरें अक्सर ही देख- पढ़ सकते हैं. आज भी किसी दूसरी जाति में शादी-ब्याह करना भवसागर लांघने से ज्यादा कठिन है. […]

विज्ञापन

राजनीति में अस्पृश्यता भले ही खत्म हो गयी हो, लेकिन यह समाज की जड़ों में गहरे बैठी हुई है. मिसाल के लिए आप अखबारों में जातीय झड़पों और जाति के आधार पर भेदभाव की खबरें अक्सर ही देख- पढ़ सकते हैं.

आज भी किसी दूसरी जाति में शादी-ब्याह करना भवसागर लांघने से ज्यादा कठिन है. अब तो जाति-पांत के खिलाफ बोलने वाले नेता भी गधे के सिर से सींग की तरह गायब होते जा रहे हैं. कोई नेता किसी को नाराज नहीं करना चाहता है.

अब अगर आप राजनीति में सबको खुश रखना चाहेंगे तो गोल-मोल, मीठी-मीठी बात ही करेंगे, कुरीतियों पर कड़ा प्रहार नहीं कर पायेंगे. आपको वोट बैंक की चिंता सतायेगी. कुरीतियों को परंपरा का नाम देकर चुप्पी साध जायेंगे. इससे जो राजनीतिक विचारधारा स्थापित होगी उससे सतही परिवर्तन ही होगा. वैसे एक बात गौर करने वाली है कि नेता किसी भी महापुरुष को किसी भी खांचे में बैठा सकते हैं. भले ही वह उनकी कट्टर वैचारिक विरोधी हो. शहीद-ए-आजम भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद को ही लें. वो भले वामपंथी विचारधारा के हों, लेकिन भगवा दल उन्हें अपने खांचे में फिट कर लेता है. उनकी विचाराधारा से मन ही मन नफरत करते हुए उनका नाम अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करता है. यह जनता के साथ विशुद्ध धोखाधड़ी है. खैर यह जमाना भी धोखाधड़ी का है. मुंह में राम, बगल में छुरी. दिन भर मंचों से नाम लीजिए गांधी और पटेल का, और देश में प्रचार कराइए गोडसे के विचारों का.

चलिए, फिर लौटते हैं छुआछूत की बात पर. एक बार मैं घर में अपने ताऊ के साथ किसी विषय पर चर्चा कर रहा था. तभी मेरे मित्र के पिता जी वहां आये. वह थे पक्के कर्मकांडी ब्राrाण और ताऊजी ठहरे कॉमरेड. उन्होंने प्रसंगवश पूछ लिया कि किस विषय पर बात चल रही थी. मैंने कहा अस्पृश्यता पर. उन्होंने कहा कि छोटी जातियों में रहन-सहन का स्तर निम्न और अस्वच्छ होता है. उन्होंने अपनी बात को तर्क का जामा पहनाया. इस पर ताऊजी ने जो जवाब दिया वह अकाट्य था. ताऊजी ने कहा कि एक मनुष्य का अपनी ही तरह के मनुष्य के साथ भेदभाव करना, छुआछूत बरतना, कहां की मनुष्यता और सभ्यता है. यह कैसा बड़प्पन है? हम लोग कुत्ते-बिल्लियों का मुंह लगाया बरतन इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन दलितों को अपने बरतन में चाय-पानी परोसने में भी परहेज होता है. इसी बीच दक्षिण भारत के कर्नाटक के मंगलूर से खबर आयी की एक प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर के प्रबंधन ने अनुसूचित जाति के दो लोगों और अनुसूचित जनजाति की एक विधवा को बतौर पुजारी नियुक्त किया है. कुछ वर्ष पहले महाराष्ट्र के कोल्हापुर के मीनाक्षी मंदिर में महिला श्रद्धालुओं को प्रवेश की इजाजत मिली. मतलब, धीरे-धीरे ही सही, बदलाव तो हो रहा है.

अजीत पांडेय

प्रभात खबर, रांची

ajitpandey484@gmail.com

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola