भ्रष्ट तंत्र पर करारा प्रहार करता फैसला

Published at :25 Sep 2014 6:25 AM (IST)
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भ्रष्ट तंत्र पर करारा प्रहार करता फैसला

देश के सार्वजनिक जीवन में गंभीर आत्ममंथन के क्षण कभी-कभार ही आते हैं, वैसे क्षण जो बतौर नागरिक आपको देश की नियति के बारे में फिर से सोचने के लिए बाध्य करें. गंभीर आत्ममंथन के क्षण किसी राष्ट्रीय जीवन में सिर्फ उस घड़ी आते हैं, जब चालू सोच और मुहावरों का बजता ढोल फट जाये […]

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देश के सार्वजनिक जीवन में गंभीर आत्ममंथन के क्षण कभी-कभार ही आते हैं, वैसे क्षण जो बतौर नागरिक आपको देश की नियति के बारे में फिर से सोचने के लिए बाध्य करें. गंभीर आत्ममंथन के क्षण किसी राष्ट्रीय जीवन में सिर्फ उस घड़ी आते हैं, जब चालू सोच और मुहावरों का बजता ढोल फट जाये और खुद को गफलत में रखने के लिए कोई भी ओट शेष न रह जाये.

कोयला खदानों के आवंटन को रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ हमारे राष्ट्रीय जीवन में आत्ममंथन के वही क्षण सहसा आ खड़े हुए हैं. वर्षो तक हुए अवैध आवंटनों से साफ हो गया है कि निजी क्षेत्र कानून के शासन को अपने हित में झुकाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है और उसकी स्वार्थ-सिद्धि में सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेता एवं नौकरशाह ही नहीं, बल्कि निगरानी और जांच के काम में लगी एजेंसियां भी सहायक सिद्ध हो सकती हैं.

इसलिए इस फैसले के बाद हमें तय करना होगा कि क्या हम अब भी तेज गति से उभरती अर्थव्यवस्था की ओट में एक ऐसे राष्ट्रीय जीवन का अभिशाप ढोते रहेंगे, जो चहुंमुखी भ्रष्टाचार से ग्रस्त है, जिसमें कुछ राजनेता, नौकरशाह और उद्योग-व्यापार के मुट्ठीभर घराने मिलीभगत करके ‘सार्वजनिक शुभ और कल्याण’ का रूप और रंग तैयार करते हैं? या, अब हम एक ऐसा लोकतंत्र देखना चाहते हैं, जहां अर्थव्यवस्था की रफ्तार भले तनिक धीमी रहे, पर इसमें कानून का शासन हो? एक आधुनिक राजव्यवस्था में कानून का शासन ही सत्य-स्वरूप है.

कम-से-कम सुप्रीम कोर्ट ने निजी हितों के जोर को नहीं, बल्कि कानून के शासन को ही सत्य-स्वरूप मान कर फैसला सुनाया है. बिजली बुनियादी जरूरतों में एक है और भारत में करीब 40 करोड़ लोग अब भी इससे वंचित हैं. इस फैसले के बाद हमें तय करना होगा कि देश का ऊर्जा-क्षेत्र किस प्राथमिकता से चले. उसमें उद्योग और व्यापार जगत के निजी हितों की प्रधानता हो, या विकास की प्राथमिकता उस व्यक्ति के नजरिये से तय हो जो अब भी बिजली की सुविधा से वंचित है.

आवंटन रद्द करने का यह फैसला औपचारिक तौर पर भले अभी आया हो, पर इसके संकेत 25 अगस्त के फैसले में ही थे, जिसमें 1993 के बाद हुए आवंटनों को अवैध करार दिया गया था. इन आवंटनों के पक्ष में जनता की चुनी हुई सरकार तर्क दे रही थी कि आवंटन से अर्थव्यवस्था में दो लाख करोड़ रुपये का निवेश हुआ है.

पर, इस तर्क को दरकिनार करते हुए 25 अगस्त के फैसले में न्यायालय ने कह दिया था कि खदानों केआवंटन में ‘मनमर्जी’ का बरताव हुआ, ‘युक्तिसंगत ढंग से नहीं सोचा गया’. कोर्ट ने खदानों के आवंटन के लिए गठित समिति के कामकाज पर भी अंगुली उठाते हुए कहा कि वह कोयला, जो ‘उद्योग जगत का प्राणाधार’ है, पारदर्शिता व निष्पक्षता के अभाव में अनुचित वितरण का शिकार हुआ और राष्ट्रीय संपत्ति के इस अनुचित बंटवारे से ‘सर्वजन के हित और कल्याण’ को भारी घाटा उठाना पड़ा.

सवाल यह है कि न्याय के सर्वोच्च आसन से उठती आवाज को क्या वे नीति-नियंता सुन पायेंगे, जिनकी आंखों पर तेज आर्थिक विकास का चश्मा चढ़ा हुआ है? शायद अब भी उनकी चिंता यही होगी कि फैसले के बाद देश में ऊर्जा उत्पादन के लिए कोयले की कमी पड़ने से बिजली आपूर्ति बाधित होगी और औद्योगिक उत्पादन गिरेगा. शायद वे कहेंगे कि बैंकों ने बीते जून माह तक लौह एवं इस्पात कंपनियों को 2.6 लाख करोड़ और ऊर्जा कंपनियों को 5 लाख करोड़ रुपये का कर्ज दिया था और कोर्ट के फैसले से बैकों की कर्जदार इन कंपनियों का कामकाज प्रभावित होगा, सो कर्ज और सूद की वापसी कठिन हो जायेगी.

वे आशंका जतायेंगे कि खनन क्षेत्र में सक्रिय कई कंपनियों का कारोबार ठप पड़ सकता है. लेकिन, निजी कंपनियों की हितचिंता में ऐसे तर्क पेश करनेवाले यह बात छुपा लेंगे कि अगस्त, 2012 में आयी कैग रिपोर्ट में कहा गया था कि कोयला खदानों के मनमाने आवंटन से निजी कंपनियों को 1.7 हजार करोड़ रुपये का फायदा हुआ. वे नहीं बतायेंगे कि फायदे का कितना अंश देश के करोड़ों बिजली-वंचित लोगों को बिजली पहुंचाने में खर्च हुआ! वे यह भी छिपा सकते हैं कि सार्वजनिक नीलामी का विकल्प रहते खदानों का आवंटन ‘पहले आओ-पहले पाओ’ की गुपचुप रीति से क्यों हुआ.

संभव है कि खदान आवंटन में हुए घोटाले में हर कंपनी समान रूप से दोषी नहीं हो, तब भी हमें सोचना होगा कि क्या देशहित को कंपनी-हित के बराबर माना जा सकता है? सर्वोच्च अदालत के इस दूरगामी फैसले ने हमें फिर से देश की नियति का निर्धारण करनेवाले प्रश्न पर सोचने का अवसर दिया है.

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