सुरक्षा परिषद् में स्थायी सीट का दावा

Published at :24 Sep 2014 4:20 AM (IST)
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सुरक्षा परिषद् में स्थायी सीट का दावा

।। शशिधर खान ।। (वरिष्ठ पत्रकार) यह एक सुखद संयोग है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक ऐसे समय में भारत की सद्भावना यात्रा पर आये, जब संयुक्त राष्ट्र महासभा का वार्षिक सत्र शुरू होनेवाला है. उम्मीद की जा रही है कि इस सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पहले ही संबोधन में संयुक्त […]

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।। शशिधर खान ।।

(वरिष्ठ पत्रकार)

यह एक सुखद संयोग है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक ऐसे समय में भारत की सद्भावना यात्रा पर आये, जब संयुक्त राष्ट्र महासभा का वार्षिक सत्र शुरू होनेवाला है. उम्मीद की जा रही है कि इस सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पहले ही संबोधन में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में स्थायी सीट का भारत का पुराना दावा मजबूती से दुहरायेंगे.

संयुक्त राष्ट्र महासभा में 27 या 28 सितंबर को भारत का पक्ष रखने से पहले प्रधानमंत्री मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलेंगे. आशा है, इस मुलाकात में वे भारतीय दावे का जिक्र करेंगे. इस कड़ी में ज्यादा महत्वपूर्ण है चीन का समर्थन हासिल करना. अब तक चीन से समर्थन का आश्वासन पाने में भारत सफल नहीं हुआ है.

चीन के राष्ट्रपति भारत में जितने समय तक रुके और जितने द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चाएं हुईं, समझौते हुए, वे सभी एकपक्षीय रहे. सुरक्षा परिषद् में भारत के दावे की चर्चा नहीं हुई. स्वयं नरेंद्र मोदी ने भी चीनी नेता से इस विषय का जिक्र नहीं किया. मोदी जानते हैं कि चीन को भारत से ऐसा मजबूत संबंध नहीं चाहिए, जिसकी मजबूती विश्वमंच पर चीन के समान हो.

सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य यूरोपीय देशों के राष्ट्राध्यक्ष जब भी भारत के दौरे पर आते हैं, औपचारिकतावश ही सही, भारतीय दावे को सही ठहराते हैं, समर्थन करते हैं. स्थायी सीट वाले पी-5 देशों में एकमात्र चीन ही है, जिसने आज तक खानापूरी के लिए भी भारतीय दावे के समर्थन की बात तो दूर, इसे सही तक नहीं कहा.

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इसी उम्मीद में 2003 में चीन गये थे, लेकिन वहां से गोलमटोल आश्वासन भी नहीं मिला. वैसे ह्यपी-5ह्ण के अन्य सुपरपावर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस भी नहीं चाहते कि भारत सुरक्षा परिषद् में उनके बगल में बैठे. हालांकि, आज भारत की शक्ति से सब भलीभांति परिचित हैं. लेकिन भारत की हैसियत वैसी सुपरपावर वाली नहीं है, कि दबाव डाल कर स्थायी सीट हासिल कर सके. जबकि इन देशों ने उसी तरीके से सीट हासिल की है. सुरक्षा परिषद् में सुधारों की बात कई दशकों से चल रही है, जो मुख्य रूप से स्थायी सीटों की संख्या बढ़ाने पर केंद्रित है, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ती.

नरेंद्र मोदी के लिए यह एक चुनौती है और उन्होंने इसे स्वीकारा है. इसलिए संयुक्त राष्ट्र सत्र के दौरान उनकी मुलाकातों और सत्र समाप्त होने के बाद भी प्रधनमंत्री के कूटनीतिक संबंधों की कसौटी पर सबकी नजर है. चीनी राष्ट्रपति ने भारत से जिस कूटनीतिक रिश्ते का जिक्र किया है, उसमें भारत का वीटो पावर का दावा शामिल नहीं है. पहले भी नहीं था. गौरतलब है कि भारत के साथ ही ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका भी सुरक्षा परिषद् में स्थायी सीट के दावेदार हैं. इनमें भारत का दावा सबसे मजबूत है, इसका प्रमाण प्रधानमंत्री ने ब्राजील में हुए ब्रिक्स सम्मेलन के पहले ही दिन अपने भाषण में दे दिया था. उन्होंने स्थायी सीट हासिल करने के लिए 2015 तक की समय-सीमा भी तय कर दी है.

शी जिनपिंग के भारत दौरे के बीच इस बात का पूरा ख्याल रखा गया कि रिश्ते का स्वाद बिगाड़नेवाली कोई बात न हो. चीन से मुक्ति की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन करनेवाले तिब्बती शरणार्थियों को पुलिस ने खदेड़ दिया. कश्मीर, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा जताते हुए वर्षों से चीनी घुसपैठ जारी है. फिर भी प्रधानमंत्री ने इससे ज्यादा तवज्जो व्यापारिक असंतुलन को दी.

एशिया में चीन के कारण पैदा हुए शक्ति असंतुलन का नाम ही नहीं लिया, जिसे ठीक रखने के लिए दक्षिण से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक अमेरिका हस्तक्षेप करता रहता है. जिस दिन दिल्ली में भारत-चीन के बीच निवेश समझौते हो रहे थे, उस दिन गृहमंत्री राजनाथ सिंह काठमांडो में दक्षिण एशियाई गृहमंत्रियों से आतंकी हमले समेत क्षेत्रीय समस्याओं पर विचार-विमर्श कर रहे थे.

ह्यअच्छेह्ण वातावरण में बेहतर हो रहे इस कूटनीतिक संबंध का भारत को अपना दावा मजबूत करने में कितना फायदा मिलता है, इसकी कुछ भनक इस महीने के अंतिम सप्ताह में मिल जायेगी. समर्थन जुटाने का दौर जारी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पड़ोसी दक्षिण एशियाई देशों से संबंध मजबूत करने पर काफी बल दिया है, जो अंदर-अंदर भारत से ज्यादा चीन के करीब हैं. ऐसे देशों में सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं है.

2005 से 2010 तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारतीय दावे को जितना मजबूत किया, उसके बाद के वर्षों में उतना ही कमजोर. संयोग कुछ ऐसा रहा कि 2010 में पी-5 के सभी राष्ट्राध्यक्ष भारत आये. चीन के प्रधानमंत्री वेन जियावाओ को छोड़ कर सभी ने भारतीय दावे का समर्थन किया. सबसे जोरदार समर्थन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने किया. स्थायी सीट का दावा किसी पार्टी या सरकार का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शान और प्रतिष्ठा का मुद्दा है. यह बात नरेंद्र मोदी प्राय: कहते रहे हैं. अब गेंद उनके पाले में है, क्योंकि उन्हें प्रचंड जनादेश मिला है.

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