झारखंड की उपेक्षा कर रहा रेलवे

Published at :23 Sep 2014 3:54 AM (IST)
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झारखंड की उपेक्षा कर रहा रेलवे

रविवार को जम्मूतवी एक्सप्रेस चार घंटे 40 मिनट, स्वर्णजयंती एक्स ढाई घंटे, पटना-रांची जन शताब्दी तीन घंटे देर से रांची पहुंचीं. यह खबर इतनी मामूली बन चुकी है कि ‘संक्षिप्त खबरों’ वाले कॉलम में छपती है. देश के हर कोने से झारखंड की राजधानी रांची आने वाली रेलगाड़ियों का हाल यह है कि लोग दो-ढाई […]

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रविवार को जम्मूतवी एक्सप्रेस चार घंटे 40 मिनट, स्वर्णजयंती एक्स ढाई घंटे, पटना-रांची जन शताब्दी तीन घंटे देर से रांची पहुंचीं. यह खबर इतनी मामूली बन चुकी है कि ‘संक्षिप्त खबरों’ वाले कॉलम में छपती है. देश के हर कोने से झारखंड की राजधानी रांची आने वाली रेलगाड़ियों का हाल यह है कि लोग दो-ढाई घंटे देरी को समय पर चलना मानने लगे हैं.
यही हाल झारखंड से खुलनेवाली रेलगाड़ियों का भी है. अगर राजधानी या गरीब रथ को छोड़ दें, तो रांची से दिल्ली जानेवाली रेलगाड़ियां अक्सर कई-कई घंटे देर से पहुंचती हैं. सबसे बड़ी बात है कि इसकी कोई वजह नहीं बतायी जाती. मौसम खराब हो, कोहरा हो, कहीं रेल पटरी जाम हो, तो बात समझ में आती है, लेकिन बारहों महीने रेलगाड़ियों का देरी से चलना गले से नीचे नहीं उतरता. रेलगाड़ियों का समय पर न चलना, भारतीय रेल की पुरानी बीमारी है. लेकिन, झारखंड की रेलगाड़ियों का मामला कुछ ज्यादा ही गंभीर है. लोग इसे एक ‘छोटे और कमजोर’ राज्य की उपेक्षा का मामला मानने लगे हैं.
लोगों की धारणा है कि रांची से खुलनेवाली या यहां पहुंचनेवाली रेलगाड़ियों के साथ सौतेला व्यवहार होता है. इन्हें रोक कर ‘वीआइपी’ रेलगाड़ियों को पास दिया जाता है. हो सकता है कि यह सच न हो, पर लगातार देरी से परिचालन होने से लोगों में यह धारणा तो बनेगी ही. रेलवे को जिन राज्यों से भारी राजस्व आता है, उनमें झारखंड भी शामिल है. यहां से कोयला और अन्य खनिज देश भर में जाते हैं, जिसके भाड़े से रेलवे को काफी कमाई होती है. इसके बावजूद यहां की रेलगाड़ियां और यहां के रेलवे स्टेशन उपेक्षित हैं. इक्का-दुक्का स्टेशनों को छोड़ दें, तो बुनियादी सुविधाएं तक ढंग से नहीं हैं.
पुराने और खटारा डिब्बे यहां की रेलगाड़ियों में लगाये जाते हैं. आज भी राजधानी रांची को भोपाल, लखनऊ, इंदौर आदि शहरों से सीधी ट्रेन से नहीं जोड़ा गया है. रेलवे को अपनी औपनिवेशिक मानसिकता छोड़नी होगी कि कमाई झारखंड से और इसका फायदा तथाकथित विकसित राज्यों को. अगर हमारे संसाधनों से देश समृद्ध बन रहा है, तो हमें भी हमारा हक मिले. और हां, बुलेट ट्रेन सेवा शुरू करने से ज्यादा जरूरी है, पहले से चल रही रेलगाड़ियों को ठीक करना.
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