सबसे बड़ी जीत और हार के बाद

By Prabhat Khabar Digital Desk
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इस साल हुए आम चुनाव के नतीजे देश की दो प्रमुख पार्टियों- भाजपा और कांग्रेस- के लिए महज ऐतिहासिक ही नहीं, अप्रत्याशित भी थे. ऐसे में यह स्वाभाविक लगता, यदि सबसे बड़ी जीत के बाद भाजपा भविष्य की सांगठनिक रणनीति को लेकर थोड़ा निश्चिंत दिखती और हाशिये पर पहुंच चुकी कांग्रेस आत्ममंथन की गहन प्रक्रिया से गुजर कर अपनी राजनीतिक वापसी के लिए बड़े कदम उठाती.

लेकिन, चुनावी नतीजों के करीब तीन माह बाद भी दोनों पार्टियां इस स्वाभाविक सोच के विपरीत ध्रुवों पर ही खड़ी दिख रही हैं. एक ओर भाजपा केंद्र में सरकार बनाने के तुरंत बाद ही भविष्य की सोच के साथ संगठन को पुनगर्ठित करने में जुट गयी थी, जिसका एक ठोस रूप पार्टी के नये अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में शीर्ष पदाधिकारियों की नयी टीम है. भाजपा ने सीमित जनाधारवाले राज्यों के लिए विशेष कार्ययोजना भी तैयार की है. इस तरह पार्टी के मिजाज में अभी और आगे बढ़ने की ललक साफ दिख रही है.

दूसरी ओर, कांग्रेस की ओर से अब तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि वह इस सबसे बड़ी हार से उबर कर राजनीतिक रंगमंच पर फिर से उभरने के प्रति गंभीर है. पार्टी के वरिष्ठ नेता एके एंटनी ने हार के कारणों का विश्लेषण करते हुए एक रिपोर्ट पार्टी नेतृत्व को सौंपी है. हालांकि इसका विवरण अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है, पर एंटनी ने कहा है कि सोनिया व राहुल गांधी इस हार के लिए कतई जिम्मेवार नहीं हैं. मीडिया रिपोर्टो के अनुसार, एंटनी ने हार की मुख्य जिम्मेवारी मनमोहन सरकार के कामकाज, महंगाई और भ्रष्टाचार पर मढ़ने के अलावा उम्मीदवारों के चयन में चूक, आपसी फूट, पक्षपाती मीडिया और मोदी की आक्रामक शैली व सांप्रदायिक लामबंदी जैसे अन्य कारण भी गिनाये हैं. विश्लेषकों का मानना है कि ये कारण सही हो सकते हैं, पर सोनिया व राहुल गांधी को समीक्षा से परे रखना असंगत है, क्योंकि इनका सरकार व पार्टी पर पूरा नियंत्रण था. पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का हाल यह है कि नेतृत्व के आलोचकों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है. पार्टी नेता आखिर कब समङोंगे कि कांग्रेस के पुन: उभरने की राह गांधी परिवार के प्रति अंधश्रद्धा से नहीं, बल्कि स्वस्थ आत्मालोचना से ही निकलेगी!

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