सदियों से प्रतीक्षा थी इस 15 अगस्त की

Published at :15 Aug 2014 8:06 AM (IST)
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सदियों से प्रतीक्षा थी इस 15 अगस्त की

अब वक्त है देश का वक्त बदलने का. जो पत्थर युग की मानसिकता में आज भी इस पर बहस करते हैं कि देश को हिंदुस्तान नहीं, इंडिया कहा जाये, उनका संज्ञान भी लेने की जरूरत नहीं. जो हिंदू शब्द से ही घृणा करते हैं, उन्हें जहां हैं, वहीं छोड़ दिया जाये और आगे बढ़ा जाये. […]

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अब वक्त है देश का वक्त बदलने का. जो पत्थर युग की मानसिकता में आज भी इस पर बहस करते हैं कि देश को हिंदुस्तान नहीं, इंडिया कहा जाये, उनका संज्ञान भी लेने की जरूरत नहीं. जो हिंदू शब्द से ही घृणा करते हैं, उन्हें जहां हैं, वहीं छोड़ दिया जाये और आगे बढ़ा जाये.

यह सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पहला पंद्रह अगस्त नहीं. उन तमाम पीढ़ियों के लोगों का प्रतीक्षित दिन है, जो अनेक दशाब्दियों-शताब्दियों से भारत को पुन: गौरव के शिखर छूते देखने की तड़प रखते रहे, एक उस राष्ट्रीय दिवस की प्रतीक्षा में जिये और मरे जिस दिन कोई शेर समान शासक भारतीय प्रजा को सुरक्षा और समृद्धि देने का काम शुरू करेगा.

इस देश ने बहुत दुख झेले हैं. सिर्फ हम अपने धर्म, अपनी संस्कृति, अपने अपार वैभव के कारण बर्बर आक्रमणों के शिकार हुए. शहर जले, मंदिर तोड़े गये, सामान्य जन के नरसंहार हुए, (दिल्ली का ही आठ बार जनसंहार हुआ) विश्व में अनिंद्य सौंदर्यवान, राजपूत ललनाओं के जौहर हुए, साहेबजादे जिंदा दीवार में चिने गये, गुरुओं की शहादत हुई, बंदा बैरागी, भाई मति दास, भाई सती दास जिंदा कढ़ाहों में जले. सिंधु बंटी, देश आधा हुआ, 1947 के बाद चीन और पाकिस्तान के हाथों 1.25 लाख वर्ग किमी भूभाग गंवाया, अपने ही देश में लाखों भारतीय शरणार्थी बने, 67 साल बीतने के बाद भी भाषा और भारतीयता अंगरेजी और अंगरेजियत की गुलाम रही. इतना सब हुआ, तब नरेंद्र मोदी आये.

पीछे मुड़ कर एक बार देखिये तो सही. तिब्बत गया, अक्साई चिन गया, 1962, 1965 और 1971 के युद्धों के बाद कारगिल हुआ, इस बीच जेपी आंदोलन, आपातकाल, जनता पार्टी का गठन और विघटन, (कोकाकोला पर पाबंदी तथा उसकी जगह 77 का कोला) समाजवाद की विदाई-उदारीकरण का आगमन. ये तमाम वर्ष भारत के हर युवा में आगे बढ़ने की ललक, तेज होने की तड़प और दुनिया में देश का नाम बढ़ाने की हिम्मत भी पैदा करते गये- इसने राजनीति का रंग भी अहंकारी बड़ी जात वालों के वर्चस्व से छीन कर उनके हाथों में दिया जो उनके खेत-खलिहानों और अस्तबलों में मेहनत करते थे, कोड़े खाते थे, हिकारत से अस्पृश्य कहे जाते थे. इस तरह करवट बदली देश ने कि ब्राrाण शिरोमणि उनके पैरों में मस्तक टेकते देखे गये जिनके हाथों का छुआ जल भी वे कल तक स्वीकार नहीं करते थे. वाह, धन्य हो हे पूर्ववर्ती अछूत, तुम्हारे सामने पंडित जी भूलोटन प्रसाद बन गये.

लेकिन, इसके साथ ही देश का पहला दुश्मन चीन या पाकिस्तान नहीं, आंतरिक भ्रष्टाचार बन गया. भ्रष्ट नेता और अफसरों ने देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया, फाइलें रोकीं, हजारों बेगुनाहों को (और वे भारतीय नागरिक थे) बुजदिल, कायर, जिहादियों, कम्युनिस्ट माओवादियों, चर्च संरक्षित उत्तर पूर्वाचल के विद्रोहियों के हाथों मारे जाते देखते रहे, पर देश को कोई अभेद्य सुरक्षा कवच नहीं दिया.

अब वक्त है देश का वक्त बदलने का. जो पत्थर युग की मानसिकता में आज भी इस पर बहस करते हैं कि देश को हिंदुस्तान नहीं, इंडिया कहा जाये, उनका संज्ञान भी लेने की जरूरत नहीं. जो हिंदू शब्द से ही घृणा करते हैं, उन पर तरस खाये बिना उन्हें जहां हैं, वहीं छोड़ दिया जाये और आगे बढ़ा जाये. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघ चालक प्रो राजेंद्र सिंह कहते थे, लंबी यात्र का पथिक रास्ते में झगड़ा मोल नहीं लेता. उस पर झगड़ा थोपा भी जाये, तो भी बच कर निकल जाता है, क्योंकि उसकी आंखों में मंजिल तक पहुंचने की जिद होती है. भारत में भी वह आगे बढ़ने की जिद पैदा हो जाये, तो जाति, पंथ, भाषा, प्रांत के भेद सब स्वत:, अप्रयास ही पीछे छूट जायेंगे.

छोटी बातें, बड़ा प्रभाव छोड़ती हैं. प्लेटफॉर्म पर पशुओं की तरह लेटे-सो रहे लोगों को सम्मान सहित प्रतीक्षा की सुविधा क्यों नहीं हो सकती? रेलवे स्टेशन साफ, उनमें प्रवेश केवल वैध यात्रियों के लिए, टिकट बिक्री सहज और आनंद के अनुभव जैसी. दिल्ली में चाहे विमान से आयें या रेल या बस से, बाहर निकलते ही संग्राम शुरू होता है- न ऑटो, न रिक्शा, न टैक्सी का सरल भाड़ा तय होता है, क्यों? स्कूल चलते नहीं, अस्पतालों में गंदगी व लापरवाह डॉक्टर. आला अफसर या राजनेता प्राइवेट अस्पताल में चिकित्सा कराना क्यों पसंद करता है? क्या सरकारी अस्पताल सुधर नहीं सकते? बच्चों के लिए संसद में बढ़िया बोला जाता है, पर भारत का बचपन दुर्दशा में है. कुपोषण, खराब विद्यालय, न खेलने के लिए पार्क, न प्रतिभा विकास का खुला अवसर. दुनिया में सबसे ज्यादा कुपोषण तथा विशेष सहायता पर निर्भर बच्चों की संख्या भारत में है. परिवारों पर नौकरी और कामकाज के इतने बेतरतीब दबाव हैं कि माता-पिता, अकसर चाहते हुए भी बच्चों के साथ समय बिता नहीं पाते और बच्चे कब बड़े हो गये, एहसास ही नहीं होता. भिखारी, जूठन बटोर कर खानेवाले, कचरा बेच कर स्मैक और रोटी लेनेवाले बच्चों के होते हुए हम भारत महान बना सकते हैं?

भगवान न करे कोई किसी को अदालत या पुलिस थाने के दर्शन कराये. न्याय व्यवस्था चाहे जिस किसी के भी हित में हो, वादी के हित में तो नहीं है. गंदे मक्खियों से भिनभिनाते न्याय क्षेत्र, दलालों के वर्चस्व, देरी, तारीखें, न्याय के प्रार्थी का मरणासन्न बनाने तक रक्त चूसना. क्या यह वह भारत है, जिसके नागरिक होने का हम गर्व कर सकते हैं?

विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, बायो-टेक्नोलॉजी, अंतरिक्ष विज्ञान ये सब हम भारतीयों की मुट्ठी में हैं. दुनिया भर में ज्ञान-विज्ञान में कुशल शिखरस्थ भारतीयों की धाक है. वीरता, साहस और पराक्रम में हमने विश्व विख्यात कीर्तिमान बनाये हैं- इन सबका उपयोग एक नवीन हिंदुस्तान के उभार में नहीं हो सकता क्या? क्या भारतीय मानस, जो लद्दाख से अंडमान और तवांग से ओखा तक एक नायक के लिए वोट देकर भाजपा को अतुलनीय बहुमत दे सकता है, वही देश की गंदगी, बदहाली को बदलने का सर्वश्रेष्ठ साधन नहीं बन सकता?

मंदिरों में अपार गंदगी और बदबू के बीच देवताओं का पूजन क्यों? गंगा, यमुना किसी मुगल, अरब या तुरक ने थोड़े ही गंदलायी- यह काम तो ऊंची जा का घमंड रखनेवालों ने बड़ी तल्लीनता से किया है. गायों को बचाने की बात करनेवाले जितना भी शोर मचाते रहें, गो मांस का व्यापार बड़ी हद तक हिंदुओं के हाथों में ही है.

इस पाखंड पर और जाति के नाम पर मरने-मारनेवाले पत्थर युगीन समाज पर चोट कौन करेगा? वह जो देश के युवाओं को सपने दे, सपनों को पंख और पंखों को सपने हकीकत में बदलने की ताकत दे, वो भारत भाग्य विधाता होगा. अपनों के दर्द में दर्द महसूस करना और भारत के लिए मरने नहीं, जीने का संकल्प लेना इस 15 अगस्त का मर्म होना चाहिए.

तरुण विजय

राज्यसभा सांसद, भाजपा

tarunvijay2@yahoo.com

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