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झारखंड नतीजे का असर बिहार पर नहीं

केसी त्यागी राष्ट्रीय प्रवक्ता, जदयू kctyagimprs@gmail.com महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव परिणाम पूर्णतया भाजपा के पक्ष में नहीं रहे थे, लेकिन झारखंड चुनाव के नतीजे आत्मचिंतन करनेवाले रहे. खासकर इन परिणामों के बाद चर्चा तेज हो गयी कि भाजपा और एनडीए की लोकप्रियता कम होती जा रही है. अब 2020 में दिल्ली एवं बिहार में […]

केसी त्यागी
राष्ट्रीय प्रवक्ता, जदयू
kctyagimprs@gmail.com
महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव परिणाम पूर्णतया भाजपा के पक्ष में नहीं रहे थे, लेकिन झारखंड चुनाव के नतीजे आत्मचिंतन करनेवाले रहे. खासकर इन परिणामों के बाद चर्चा तेज हो गयी कि भाजपा और एनडीए की लोकप्रियता कम होती जा रही है. अब 2020 में दिल्ली एवं बिहार में चुनाव आहूत हैं.
कई राजनीतिक पंडितों और महागठबंधन के सहयोगी दलों का प्रचार भी हो गया कि झारखंड के नतीजे आगामी बिहार चुनाव को भी प्रभावित करेंगे. ऐसे कयासों के बीच आवश्यक है कि झारखंड विधानसभा चुनाव नतीजों के संदेश का सही विश्लेषण किया जाए. झारखंड संयुक्त बिहार की भिन्न संस्कृति, सामाजिक पहचान और आर्थिक संरचना का क्षेत्र रहा है. विभाजन के बाद औद्योगिकीकरण से प्रभावित बड़ा क्षेत्र झारखंड में रह गया.
आदिवासियों की सत्ता से दूरी, मुख्यधारा से उनका कटाव, सरकारों द्वारा उनके संसाधनों की लूट आदि कारणों से पृथक झारखंड की मांग आजादी के कुछ वर्षों बाद ही उठने लगी थी. कई अवसरों पर जन-आंदोलनों का स्वरूप हिंसक भी हुआ, जिसमें जान-माल की भी क्षति हुई और केंद्र की सरकारें उनके आक्रोश के केंद्र बिंदु बने. केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में 15 नवंबर, 2000 को झारखंड पृथक राज्य बना. झारखंड में उस समय के भाजपा के शीर्षस्थ नेता बाबूलाल मरांडी पहले मुख्यमंत्री बने.
दो राय नहीं कि पृथक झारखंड के आंदोलन का नेतृत्व झारखंड मुक्ति मोर्चा के बैनर तले ही लड़ा गया था, जिसके निर्विवाद नेता शीबू सोरेन थे. आज भी झारखंड के जनमानस में यह छवि बरकरार है कि जेएमएम के जन-संघर्षों से ही झारखंड एक राज्य बन पाया.
इस चुनाव में रघुवर दास अपनी सीट भी नहीं बचा सके, लेकिन यह भी सत्य है कि इनसे पहले कोई भी मुख्यमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया. जहां तक चुनाव नतीजे के विश्लेषण का सवाल है, तो यह केंद्र और एनडीए से कहीं ज्यादा झारखंड प्रदेश भाजपा व मुख्यमंत्री के प्रति एंटी इन्कंबेंसी को दर्शाता है. झारखंड के 19 वर्षों के सियासी इतिहास में ‘न बहुमत और न वापसी’ का रिकॉर्ड कायम जरूर रहा, लेकिन मुख्यमंत्री रघुवर दास, प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ एवं विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव भी चुनाव हार गये.
इनके अलावा तीन प्रमुख मंत्री भी हारे हैं. कहा जा सकता है कि भाजपा ने एक आदिवासी बहुल राज्य में एक गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री बनाने का प्रयोग किया था, जो विफल हुआ. इस बार गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री वाला मुद्दा ज्यादा गर्म रहा. 26.5 फीसदी आदिवासी आबादी वाले झारखंड में उनके लिए 28 सीटें आरक्षित हैं. बिरसा मुंडा की धरती पर आज भी आदिवासी अस्मिता सर्वप्रथम माना जाता है.
इस लिहाज से मुख्यमंत्री बनाम मुख्यमंत्री उम्मीदवार की लड़ाई में रघुवर दास को गैर-आदिवासी होने का खामियाजा भुगतना पड़ा. इससे इतर बतौर विपक्षी उम्मीदवार हेमंत सोरेन को आदिवासी होने का बड़ा लाभ मिला. जल, जमीन और जंगल के रक्षक के रूप में मूल निवासियों के बीच उनकी स्वीकार्यता असरदार रही.
आदिवासियों में रघुवर सरकार के प्रति नाराजगी इसलिए भी थी, क्योंकि उनकी हजारों एकड़ जमीन पावर प्लांट के लिए काॅरपोरेट को दे दिया गया था और उनके विरोध को बलपूर्वक दबाने तक का प्रयास भी किया गया था. इसके अलावा पारा शिक्षकों, आंगनबाड़ी सेविकाओं आदि की नाराजगी भी बड़ा स्थानीय मुद्दा बना रहा.
काश्तकारी कानून में बदलाव भी आदिवासियों को रास नहीं आया. छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट तथा संताल परगना टेनेंसी एक्ट में संशोधन का मुद्दा भी सर्वविदित है. इसी दौरान विपक्ष एकजुट होकर आदिवासियों के हक की मांग उठाने में कामयाब हुआ. नाराज आदिवासी मतदाता इस बार झामुमो के पाले में गये. गैर-आदिवासी मतदाता भी एकमुश्त होकर भाजपा के पाले में नहीं गये. यह वोट यदि एकमुश्त भाजपा को मिलता, तो शायद जीत संभव हो सकती थी. महत्वपूर्ण यह भी है कि हाल के विधानसभा चुनावों में भाजपा के प्रति नाराजगी का फायदा कांग्रेस को नहीं मिला, बल्कि क्षेत्रीय दलों को मिला.
महाराष्ट्र में एनसीपी की सफलता दर कांग्रेस से कहीं ज्यादा रही है, कांग्रेस की सफलता पर भी एनसीपी का प्रभाव दिखा. झारखंड में भी कांग्रेस को जेएमएम गठबंधन का फायदा मिला है. राजद बेवजह आत्ममुग्ध है, जबकि इसके विधायकों की संख्या व मत प्रतिशत में कमी आयी है. कभी सात सीट जीतनेवाले दल को मात्र एक सीट पर संतोष करना पड़ा.
एनडीए में छोटे दलों के साथ गठबंधन व सामंजस्य का अभाव भी हार का बड़ा कारण है.पिछड़ों के बीच आधार रखनेवाली पार्टी आजसू इस चुनाव में एनडीए से छिटक गयी. वहां महतो जाति की लगभग 13 फीसदी की भागीदारी निर्णायक हो सकती थी. यह समूह आजसू और जदयू का जनाधार माना जाता रहा है. आठ महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को झारखंड में 51 फीसदी वोट मिला था और 14 में से 12 लोकसभा सीटें भाजपा को मिली थीं, यानी राज्य में गठबंधन कायम होता, तो गणित कुछ और हो सकता था.
अमित शाह द्वारा यह घोषित किया जा चुका है कि चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ा जायेगा. राहतपूर्ण है कि 2019 के लोकसभा चुनाव आधारित आंकड़ों के अनुसार बिहार में एनडीए की लगभग 224 विधानसभा सीटों पर बढ़त है.
पिछले 15 वर्षों के विकास, सुशासन तथा जनहित कार्यों को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की स्वीकार्यता समाज के सभी वर्गों में है. केंद्र व राज्य के बेहतर संबंधों के कारण विकास कार्य को बल भी मिला है. बिजली, सड़क, शिक्षा, महिला सशक्तीकरण, शराबबंदी आदि विषयों पर बिहार की एक अलग पहचान बनी है. अल्पसंख्यकों के बीच भी नीतीश नाम पर भरोसा कायम है. दूसरी तरफ विपक्ष परिवारवाद, भ्रष्टाचार, आपसी मतभेद और लोकसभा में मिली करारी हार के कारण हतोत्साहित है. लालू प्रसाद के परिवार ने 15 वर्षों तक बिहार में शासन किया.
अपराध, भ्रष्ट आचरण, परिवारवाद, कुशासन, जातीय-सामाजिक दोहन आदि का असर आज भी राजद को बदनाम किये हुए है. इसके विपरीत नीतीश कुमार के नेतृत्व में दुर्बल-निर्बल और वंचित समूहों के सशक्तीकरण के साथ-साथ नूतन बिहार, नवीन बिहार तथा सुशासन वाला बिहार आदि प्रशासन के मुख्य मुद्दे बने. आज गठबंधन में अच्छी तालमेल है. इसलिए बिहार में सत्ता परिवर्तन की भविष्यवाणी कर रहे राजनीतिक पंडित फिर विफल साबित होंगे. (ये लेखक के निजी विचार हैं)
Prabhat Khabar Digital Desk
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