ऊंची कुरसी, लेकिन बौने लोग!

Published at :04 Aug 2014 12:35 AM (IST)
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ऊंची कुरसी, लेकिन बौने लोग!

यदि भाजपा विपक्ष के मुद्दे पर कांग्रेस के प्रति नरम रवैया अपनाती, तो माना जाता कि वह लोकतंत्र के हक में है. अफसोस, भाजपा भी बहुमत के अहंकार में देश के लोकतंत्र को वैसा ही विपक्षहीन देखना चाहती है, जैसा कभी कांग्रेस ने चाहा था. हर नीति को अपेक्षा होती है कि कोई नीतिप्रवण आदमी […]

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यदि भाजपा विपक्ष के मुद्दे पर कांग्रेस के प्रति नरम रवैया अपनाती, तो माना जाता कि वह लोकतंत्र के हक में है. अफसोस, भाजपा भी बहुमत के अहंकार में देश के लोकतंत्र को वैसा ही विपक्षहीन देखना चाहती है, जैसा कभी कांग्रेस ने चाहा था.

हर नीति को अपेक्षा होती है कि कोई नीतिप्रवण आदमी मिले. यह कोरा उपदेश नहीं है. आजाद भारत के शुरुआती राजनीतिक इतिहास के लिहाज से तो एकदम ही नहीं. याद करें, एक देश के रूप में हमारे साङो स्वप्नों को एक व्याकरण के भीतर बांधनेवाली उस पवित्र पुस्तक की रचना का इतिहास, जिसका नाम संविधान है. संविधान-सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद और प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ भीमराव आंबेडकर, दोनों अलग-अलग वैचारिक रुझान के व्यक्ति थे, तो भी दोनों इस बात पर एकमत थे कि देश को चलाने के लिए अगर अच्छे संविधान की जरूरत है, तो अच्छे इनसान की भी.

प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में 25 नवंबर, 1949 को डॉ आंबेडकर ने कहा था ‘कोई संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर संविधान पर अमल करनेवाले बुरे हुए तो यह संविधान बुरा साबित होगा और अगर संविधान पर अमल करनेवाले अच्छे हुए तो संविधान अच्छा ही साबित होगा. संविधान पर अमल सारा कुछ संविधान की प्रकृति पर ही निर्भर नहीं करता. इसलिए जनता और राजनीतिक दल की भूमिका का चर्चा किये बगैर संविधान पर कोई फैसला देना व्यर्थ है.’ कुछ ऐसा ही राजेंद्र प्रसाद को भी लगा था. उन्होंने कहा था, ‘यदि निर्वाचित सदस्य क्षमतावान और चरित्रवान हुए तो फिर वे एक त्रुटिपूर्ण संविधान को भी सर्वश्रेष्ठ बना लेंगे और यदि उनमें इन गुणों का अभाव हुआ तो फिर संविधान देश के लिए मददगार साबित नहीं हो सकता.’ कांग्रेस नियमों का हवाला देकर प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा मांग रही है और भाजपा नियमों के हवाले से ही इस मांग को नकार रही है, तो डॉ आंबेडकर और राजेंद्र प्रसाद की ये बातें सबसे पहले याद करने योग्य हैं. संविधान रचयिताओं की अपेक्षाओं को सामने रख कर दोनों दलों को तौलें, तो उनके कद बौने साबित हो रहे हैं. हक मांगने के लिए मुंह का ऊंचा होना जरूरी है, पर कांग्रेस के पास प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा मांगने लायक मुंह ही नहीं बचा है. दूसरी ओर भाजपा प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा देने में आनाकानी करके अपने को दिल का छोटा साबित कर रही है.

1984 में 414 सीट जीतनेवाली कांग्रेस 2014 में महज 44 सीटों पर सिमट गयी है. इतनी कम सीटें तो कांग्रेस को 1977 के चुनावों में भी नहीं मिली थीं. उस चुनाव में 197 सीटों का घाटा सहने के बाद भी कांग्रेस के पास 153 सीटें थीं. भले इंदिरा गांधी और संजय गांधी हार गये हों, लेकिन कांग्रेसी कुनबे के भीतर नेतृत्व की खिल्ली उड़ाने का साहस किसी को न था. इस बार कांग्रेस को 2009 के चुनावों के मुकाबले 162 सीटों का घाटा हुआ है और पार्टी सीटों का पचासा भी नहीं लगा सकी. भले सोनिया गांधी और राहुल गांधी यूपी का अपना किला बचाने में कामयाब रहे, लेकिन कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का इकबाल कुछ इस कदर घट गया है कि केरल से लेकर राजस्थान तक कोई कांग्रेसी राहुल को ‘जोकरों का एमडी’ कह रहा है, तो कोई सोनिया गांधी को छुट्टी लेने की सलाह दे रहा है. अब यदि कांग्रेस नेता-प्रतिपक्ष के वेतन-भत्ते से संबंधित पार्लियामेंट एक्ट, 1977 के बूते प्रमुख विपक्षी दल होने का दावा पेश कर रही है, तो यही कहा जायेगा कि नियम भले उसके पक्ष में हो, लेकिन नियम की दुहाई देने के लिए कांग्रेस के पास वह नैतिक तेज नहीं बचा है.

कांग्रेस ने 1980 और 1984 की सातवीं और आठवीं लोकसभा में संसद के प्रथम अध्यक्ष गणोश वासुदेव मावलंकर के नियम का हवाला देकर किसी भी दल को प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा देने से इनकार किया था. लेकिन, क्या 16वीं लोकसभा में भाजपा द्वारा कांग्रेस के साथ ठीक वही बरताव करना उचित है? ऐसा करना प्रतिशोधात्मक व्यवहार ज्यादा जान पड़ता है, नियम के प्रति निष्ठा का मामला कम. ठीक है कि मावलंकर के फामरूले के हिसाब से किसी पार्टी को संसदीय समूह को औपचारिक दर्जा तभी मिल सकता है, जब उसकी सीटें कुल सीटों के दसवें हिस्से से कम न हों. जाहिर है, कांग्रेस के पास इतनी सीटें नहीं हैं, लेकिन मावलंकर के नियम की मंशा और उसकी प्रासंगिकता भी देखी जानी चाहिए. दल-बदल विरोधी कानून लागू होने के बाद यह नियम प्रासंगिक ही नहीं रह गया है. आज कोई पार्टी चार सीटें भी जीते तो उसे दल-बदल विरोधी कानून के हिसाब से संसदीय पार्टी या समूह के रूप में स्वीकारना पड़ता है. यह देखते हुए कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष या फिर लोकपाल के चयन के लिए नेता प्रतिपक्ष का होना जरूरी है, नेता प्रतिपक्ष के वेतन-भत्ते से संबंधित पार्लियामेंट एक्ट 1977 भी विपक्षी दलों के बीच सर्वाधिक संख्या में सीट लानेवाले दल को प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा देने के पक्ष में है, यदि भाजपा इस मुद्दे पर कांग्रेस के प्रति नरम रवैया अपनाती, तो माना जाता कि वह लोकतंत्र के हक में है. अफसोस, भाजपा भी बहुमत के अहंकार में देश के लोकतंत्र को वैसा ही विपक्षहीन देखना चाहती है, जैसा कभी कांग्रेस ने चाहा था.

चंदन श्रीवास्तव

एसोसिएट फेलो, सीएसडीएस

chandanjnu1@gmail.com

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