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देवघर विद्यापीठ : केवल जलती मशाल

।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र ।। वरिष्ठ साहित्यकार बीसवीं सदी के प्रारंभ तक देवघर में बांग्ला और अंगरेजी भाषा का ही वर्चस्व था. 1916 में ‘संताल परगना के मालवीय’ पंडित शिवराम झा के प्रयास से ‘शिक्षा-सभा’ की स्थापना हुई और 1929 में उसका नाम ‘हिंदी विद्यापीठ’ रखा गया. झारखंड का प्रसिद्ध तीर्थ देवघर सामान्यत: द्वादश ज्योतिर्लिगों […]

।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र ।।

वरिष्ठ साहित्यकार

बीसवीं सदी के प्रारंभ तक देवघर में बांग्ला और अंगरेजी भाषा का ही वर्चस्व था. 1916 में ‘संताल परगना के मालवीय’ पंडित शिवराम झा के प्रयास से ‘शिक्षा-सभा’ की स्थापना हुई और 1929 में उसका नाम ‘हिंदी विद्यापीठ’ रखा गया.

झारखंड का प्रसिद्ध तीर्थ देवघर सामान्यत: द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक बाबा वैद्यनाथ धाम के रूप में जाना जाता है. यह पहला महाश्मशान था (वैद्यनाथं चिताभूमौ), जहाँ तांत्रिक साधना होती थी. आज भी त्रिकूट पर्वत की गुफाओं में साधक उपासना करते हैं.

सावन में देश के विभिन्न हिस्सों से लाखों शिवभक्त कांवड़िये यहां बाबा को गंगाजल चढाने आते हैं. लगभग 105 किमी दूर सुलतानगंज से गंगाजल लाकर बाबा वैद्यनाथ को चढाना, वह भी सोमवार को, एक चमत्कार ही है, जो दैविक भावावेश से ही संभव है.

पूरा यात्रापथ गेरुए रंग के कांवड़ियों की अंतहीन श्रृंखला से इन दिनों गुलजार रहता है. आकाशमार्ग से देखने पर यह लाल चींटियों की पंक्तिबद्ध यात्रा जैसी दीखती है. कुछ हठयोगी कांवड़िये, जिन्हें ‘डाक बम’ कहते हैं, इतनी लंबी यात्रा बिना कहीं रुके पूरी करते हैं! आश्चर्य है कि वैद्यनाथ मंदिर में बस एक ही द्वार है.

उसमें लाखों भक्तों को प्रवेश कराना और जल चढाने के बाद उन्हें सकुशल निकालना वहां के पंडों और सिपाहियों के ही वश की बात है. कई बार मंदिर की दीवार तोड़ कर निकास द्वार बनाने की कोशिश की गयी, मगर सफलता नहीं मिली.

भक्तों की इच्छा पूरी करने में बाबा वैद्यनाथ आशुतोष हैं. मेरा भी जन्म बाबा से मनौती मानने के बाद ही हुआ था. विधान तो यह है कि जन्म के बाद ही बच्चे को बाबा की शरण में लाकर उसके सिर की लट कटा दी जाये, मगर भाग्य ने मुझे बचपन में ही दूसरे बाबा (काशी विश्वनाथ) के दरबार में पहुंचा दिया.

वहां अग्रेज रचनाकार ठाकुर प्रसाद सिंह के मुंह से देवघर की चर्चा तो बहुत सुनता था, मगर वे जिस दूसरे मंदिर का जिक्र करते थे, विद्या मंदिर था, जिसका नाम हिंदी विद्यापीठ था. ठाकुर भाई 1949 से 1951 तक इस विद्यापीठ के प्राचार्य रह चुके थे और उसके परिसर में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जैसी विभूतियों का स्वागत कर चुके थे.

इस तीन साल के प्रवास में उन्होंने राष्ट्रभाषा के सेनापति और महान स्वतंत्रता सेनानी पंडित विनोदानंद झा के साहचर्य में रह कर विद्यापीठ को चमकाया तथा वहां के विशेषज्ञ डोमन साहू ‘समीर’ की मदद से संताली लोकगीतों का मनन किया, जिससे ‘वंशी और मादल’ के आदिवासी परिप्रेक्ष्य के नवगीत हिंदी को मिले. देवघर के पुराने साहित्यकार आज भी उन्हें बडी आत्मीयता से याद करते हैं.

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पूरे देश की सामूहिक अभिव्यक्ति के लिए राष्ट्रभाषा हिंदी को पल्लवित करने के लिए देश भर में हिंदी की अनेक संस्थाएं बनायी गयीं, मगर उनमें से अधिकांश स्वाधीनता के बाद आयी भोगवादी प्रवृत्ति के कारण असमय काल-कवलित हो गयीं. कई संस्थाएं तो मेरे देखते-देखते राष्ट्रीय संपत्ति से निजी संपत्ति में परिवर्तित हो गयीं.

इसे बाबा वैद्यनाथ की विशेष कृपा मानी जानी चाहिए कि हिंदी विद्यापीठ, देवघर अपने जन्मकाल से ही कुशल हाथों से संचालित होता रहा है और आज पूर्वोत्तर राज्यों के युवक-युवतियों को हिंदी में निष्णात बना कर उन्हें अपने-अपने राज्यों में हिंदी का राजदूत बना कर भेजनेवाली एकमात्र संस्था है. प्रतिवर्ष पूर्वोत्तर के राज्यों से 75 छात्र-छात्राएं यहां बिलकुल नये परिवेश में, घर-परिवार छोड़ कर आती हैं, यहां के छात्रवासी जीवन, प्रचंड गर्मी और पृथक खान-पान से रूबरू होती हैं और पांच वर्षो में यहां के परिवेश, शिक्षकों के ममत्व और देवघर के आचार-विचार में ऐसा रम जाती हैं कि दीक्षांत के बाद घर लौटने में उन्हें कष्ट होता है.

यहां उनमें इतनी ऊर्जा भर दी जाती है कि वे अपने राज्य में जाकर अपनी जाति की युवा पीढ़ी को नि:शुल्क हिंदी सिखाने लग जाते हैं. विद्यापीठ से साहित्यालंकार की परीक्षा उत्तीर्ण हजारों छात्र-छात्राएं इस समय नागालैंड, मणिपुर आदि सुदूर प्रांतों में सजग हिंदी शिक्षक की भूमिका निभा रही हैं.

वर्तमान संचालक श्री कृष्णानंद झा की दूरदर्शिता से इन छात्रों को कंप्यूटर पर हिंदी में काम करना भी सिखाया जाता है, जिससे पूर्वोत्तर राज्यों के कार्यालयों में उनकी उपयोगिता बढ़ जाती है. विद्यापीठ से छात्र-छात्राएं एक नया अनुभव लेकर अपने घर जाती हैं, जिसे वे अपने जीवन की अमूल्य पूंजी मानती हैं. कुछ तो इस परिसर की सामासिक संस्कृति से प्रेरणा ग्रहण कर राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिष्ठित हुए.

बीसवीं सदी के प्रारंभ तक देवघर में बांग्ला और अंगरेजी भाषा का ही वर्चस्व था, शिक्षा का माध्यम भी यही दो भाषाएं थीं. 1916 में ‘संताल परगना के मालवीय’ पंडित शिवराम झा के प्रयास से ‘शिक्षा-सभा’ की स्थापना हुई और 1929 में उसका नाम ‘हिंदी विद्यापीठ’ रखा गया. प्रारंभ में हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग के पाठ्यक्रम के आधार पर शिक्षण कार्य शुरू हुआ.

1935 में गोवर्धन साहित्य महाविद्यालय की स्थापना हुई. उसके एक वर्ष बाद राष्ट्रीय शिक्षण संस्थान के रूप में हिंदी विद्यापीठ को मान्यता मिली. डॉ लक्ष्मी नारायण सुधांशु के आग्रह पर इसके प्रथम अध्यक्ष राजेंद्र बाबू बने और इस पद पर राष्ट्रपति बनने के बाद भी आजीवन आसीन रहे.

एक ओर जहां शिवनाथ झा, बुद्धिनाथ झा ‘कैरव’, जनार्दन झा ‘द्विज’, लक्ष्मीनारायण सुधांशु जैसे मनीषियों ने अपनी विद्वत्ता से इसकी नींव को पुख्ता किया, वहीं प्रसिद्ध गांधीवादी उद्योगपति मदन लाल कायां ने अपने पिता मिर्जापुर निवासी गोवर्धनदास की स्मृति में इसके विशाल भवन के निर्माण में ऐतिहासिक भूमिका निभायी. उन्होंने अपना निजी मुद्रणालय ‘साहित्य प्रेस’ भी इसे दान में दे दिया. ठाकुर भाई ने उन्हीं दिनो ‘हिंदी विद्यापीठ’ पत्रिका का सूत्रपात किया था, जो आज भी पंडित मोहनानंद मिश्र और डॉ शंकर झा निर्बाध रूप से संपादित कर रहे हैं.

पहले यहां बंगाल, ओड़िशा, असम के साथ-साथ सुदूर दक्षिणी राज्यों के भी अहिंदीभाषी छात्र पढ़ ने आते थे, मगर दक्षिण में हिंदी शिक्षण की उत्तरोत्तर सुदृढ़ होती स्थिति को देखते हुए बाबू गंगा शरण सिंह के कुलाधिपतित्व काल में 1975 से इस विद्यापीठ को पूर्वोत्तर राज्यों तक ही सीमित कर दिया गया, जिसमें भारत सरकार की हिंदी शिक्षण योजना के अंतर्गत छात्रवृत्ति पाकर छात्र-छात्राएं आती हैं.

विद्यापीठ को यह गौरव प्राप्त है कि इसके कुलाधिपति पद को राजेंद्र बाबू, डॉ सुधांशु, गंगा बाबू, पं विद्यानिवास मिश्र, प्रभाष जोशी जैसे विश्रुत विभूतियां सुशोभित कर चुकी हैं. संप्रति प्रसिद्ध साहित्यकार अशोक वाजपेयी इसके कुलाधिपति और डॉ पद्मनारायण आचार्य इसके कुलपति हैं.

लेकिन हिंदी विद्यापीठ को निरंतर प्रगतिशील बनाये रखने का सारा श्रेय इसके व्यवस्थापक कृष्णानंद झा को जाता है, जिनकी रगों में विनोद बाबू की सौर ऊर्जा प्रवाहित है.

Prabhat Khabar Digital Desk
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