वैश्विक कूटनीति में परास्त पाक

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 30 Sep 2019 7:17 AM

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प्रो सतीश कुमार अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार singhsatis@gmail.com प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता एक नेता के रूप में भारत के किसी भी प्रधानमंत्री से अधिक बन गयी है. जिस तरीके से अमेरिका के तमाम प्रतिष्ठित अखबारों में हौदी मोदी की खबर छपी, वह भारत-अमेरिका संबंध को एक नये शिखर पर ले जाता है. भारत की […]

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प्रो सतीश कुमार
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
singhsatis@gmail.com
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता एक नेता के रूप में भारत के किसी भी प्रधानमंत्री से अधिक बन गयी है. जिस तरीके से अमेरिका के तमाम प्रतिष्ठित अखबारों में हौदी मोदी की खबर छपी, वह भारत-अमेरिका संबंध को एक नये शिखर पर ले जाता है. भारत की कूटनीतिक सफलता से घबरा कर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने विश्व समुदाय को भला-बुरा कहना शुरू कर दिया है. विश्व राजनीति काबिलियत के बूते चलती है, न कि याचना करने से. इमरान खान संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर में हुए बदलाव को लेकर दुनिया के सामने याचना की मुद्रा में है.
भारत ने स्पष्ट कह दिया है कि यह भारत का अंदरूनी बदलाव है, इसमें किसी की भी दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं. पाकिस्तान के पास दूसरा उपाय आतंकवाद का है, उस पर अमेरिका ने तीखी प्रतिक्रिया करते हुए उसे इस्लामिक आतंक से जोड़ दिया है.
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा इस्लामिक आतंकवाद शब्द के प्रयोग ने दुनिया की निगाहें फिर से उस बिंदु पर टिक गयी हैं, जिस पर साल 1980 के दशक में बातें होती थीं. हालांकि, इसका आगाज 2001 में अमेरिका में आतंकी हमले के बाद हुआ था. इस्लामिक आतंकवाद की परिभाषा पश्चिमी दृष्टिकोण का रहा है. भारत आज भी पाकिस्तान केंद्रित आतंक की व्याख्या करता है. जब पाकिस्तान ने आण्विक बम का परीक्षण किया था, तो मुस्लिम देशों ने इस्लामिक बम की अवधारणा की पुष्टि की थी. इस्लामिक देशों में दरअसल इस्लाम के अंतर्गत इस्लामिक रिजीम की बात कही गयी है. साल 1980 के दशक में अफगानिस्तान में रूस की सेना के हस्तक्षेप के बाद इस्लामिक तेवर दिखायी दिया था.
अब ताजा सवाल यह है कि क्या अमेरिका आतंक से लड़ने की कोशिश में है या वह सिर्फ अपनी रोटी सेंक रहा है? संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के हाफिज सईद को छूट देने की बात अमेरिका मान चुका है. इसलिए अमेरिका को लेकर भारत के मन में संशय उत्पन्न होना स्वाभाविक है.
पाकिस्तान से लेकर मध्य एशिया तक आतंकवाद के तार बिछे हुए हैं, जिसके निशाने पर भारत है. पाकिस्तान और अफगानिस्तान की लंबी और बेतरतीब सीमा आतंकवाद का गढ़ है. अफगानिस्तान से मध्य एशिया के तीन देशों की सीमा मिलती है, जिसमें ताजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और किर्गिजस्तान शामिल हैं. पिछले दो वर्षों में चार हजार से ज्यादा जेहादी इराक और सीरिया में लड़ने के लिए मध्य एशिया के देशों से गये थे. पुनः वे लौटकर अपने देश में वापस आ गये.
उनको फिर से किसी मुहिम में भेजना है. पाकिस्तान की कोशिश है कि अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनाने के बाद भारत के विरुद्ध आतंकी गतिविधियों को तेज किया जा सकता है. जम्मू-कश्मीर में भारत द्वारा किये गये आंतरिक परिवर्तन से बौखला कर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने जेहाद का आह्वान किया था, उन्हें उम्मीद है कि मध्य एशिया जेहादी लड़ाकू कश्मीर में जेहाद को अंजाम देंगे.
आतंकी गिरोह की बात करें, तो पाकिस्तान में कई संगठन हैं, जिनका मूल उद्देश्य भारत केंद्रित है. तालिबान और आइएस की पृष्ठभूमि अलग-अलग है.
तालिबान अफगानिस्तान तक सीमित है, लेकिन आइएस इसको व्यापक बनाना चाहता है. यानी जहां पर भी इस्लामिक समुदाय के साथ भेदभाव और रंजिश का माहौल बनेगा, वहां पर जेहाद होगा.
अर्थात भारत के कश्मीर और इस्राइल और पश्चिमी देश इस फॉर्मूले के अनुरूप खतरे के घेरे में हैं. चीन ने इससे अपने को बचा रखा है. शिनजियांग में जब पाकिस्तानी आतंकी द्वारा 2015 में हमला किया गया, तब चीन का तेवर काफी तीखा हो गया और 15 दिनों के भीतर सभी आतंकियों को चीन के हाथों सुपुर्द कर दिया गया.
फिर चीन और पाकिस्तान के बीच अलिखित समझौता हुआ कि किसी भी तरह से पाकिस्तान द्वारा आतंकी हमला चीन के भीतर नहीं होगा. चीन की सीमा भी एशिया के तीन देशों से मिलती है. अगर पाकिस्तान से लेकर मध्य एशिया तक आतंकी लाइन का विस्तार होता है और कमांड पाकिस्तान से खिसक कर मध्य एशिया में सक्रिय आतंकी संगठनों के हाथों में चला जाता है, तो चीन भी उसके रडार में आ जायेगा.
भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थिति मजबूत जरूर है, लेकिन आतंक की लड़ाई भारत को अपने बूते पर ही लड़ना होगा. कश्मीर भारत के लिए पहले चुनौती था, जो अब खत्म हो चुकी है. लेकिन पाकिस्तान की धरती से पनपा आतंक आज भी कांटे की तरह चुभता है. अगर अफगानिस्तान और मध्य एशिया के देश इसमें शामिल हो जायेंगे, तो भारत की तकलीफ और भी बढ़ जायेगी.
प्रधानमंत्री की अमेरिकी यात्रा कूटनीतिक दृष्टि से काफी फायदे का रहा है, लेकिन यह मान लेना कि हमारी ओर से लड़ाई अमेरिका लड़ेगा, तो बात बिगड़ जायेगी. उधर रूस भी तालिबान से बातचीत की हिमायत कर चुका है. स्पष्ट है कि आतंकी संगठनों को लेकर पश्चिमी देशों की निगाहें बदलती रहती हैं.
मुस्लिम देश भी आज पाकिस्तान से मुंह मोड़ रहे हैं. पाकिस्तान के सामने अब अस्तित्व का प्रश्न है. पाकिस्तान आज भारत के विरुद्ध आतंकी गतिविधियों को बढ़ा कर अपनी भद्द पिटवाना चाहता है या भारत के साथ अच्छे संबंध रखते हुए अपनी शाख बचाना चाहता है?
दोनों विकल्प उसके सामने है. दुनिया में भारत का कद पाकिस्तान से कई गुना बड़ा है. चीन को छोड़ कर सभी देश पाकिस्तान से पल्ला झाड़ चुके हैं. खैर, चीन भी अपने स्वार्थ की वजह से ही उसके साथ है.
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