सिकुड़ रहा है समाज का कॉमन स्पेस

Published at :30 Jul 2014 4:38 AM (IST)
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सिकुड़ रहा है समाज का कॉमन स्पेस

।। राजेंद्र तिवारी ।। कॉरपोरेट एडिटर प्रभात खबर यह सही है कि सोशल मीडिया प्रभावी संवाद का प्लेटफार्म बन सकता है. लेकिन संवाद की गुणवत्ता क्या होगी? सोशल मीडिया पर चल रही जानकारियों का स्तर क्या है, यह समझने के लिए जरूरी है कि आप एक बार उन पर सवाल खड़ा करके देखिए. अपने देश […]

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।। राजेंद्र तिवारी ।।

कॉरपोरेट एडिटर

प्रभात खबर

यह सही है कि सोशल मीडिया प्रभावी संवाद का प्लेटफार्म बन सकता है. लेकिन संवाद की गुणवत्ता क्या होगी? सोशल मीडिया पर चल रही जानकारियों का स्तर क्या है, यह समझने के लिए जरूरी है कि आप एक बार उन पर सवाल खड़ा करके देखिए.

अपने देश में पिछले एक साल से कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन समाज की सतह पर मजबूती से उभर रहे हैं. ये परिवर्तन उस कॉमन स्पेस को खत्म करते जा रहे हैं जहां पर बड़ी संख्या में लोग खड़े दिखाई देते थे, बिना किसी वैचारिक दुराग्रह के. लेकिन अब यह स्पेस तेजी से सिकुड़ रहा है. या तो आप साथ हैं या नहीं हैं. यह स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती. लेकिन इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है?

सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि यह सब ऐसे समय में देखने को मिल रहा है जब सोशल मीडिया तेजी से बढ़ रहा है. राजनीतिक और दूसरे स्तरों पर यह माना जा रहा है कि सोशल मीडिया लोगों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान का एक बहुत ही प्रभावी माध्यम बन गया है.

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक वेबसाइट का भी उद्घाटन किया, जिसके जरिये सरकार को लोगों से जोड़ने की योजना है, जिससे कि देश के नागरिक देश के विकास में अपना योगदान दे सकें. इसके तुरंत बाद केंद्रीय कानून, टेलीकम्युनिकेशन और आइटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पटना में ‘प्रभात खबर’ के ‘प्रतिभा सम्मान कार्यक्रम’ में छात्र-छात्राओं का आह्वान किया कि वे फेसबुक पर अपना पन्ना बनाएं और वहां अपने विचार लोगों से शेयर करें.

उन्होंने अभिभावकों को भी सलाह दी कि वे बच्चों को फेसबुक पर जाने से रोकें नहीं. यह सही है कि सोशल मीडिया प्रभावी संवाद का प्लेटफार्म बन सकता है. लेकिन सवाल यह है कि संवाद की गुणवत्ता क्या होगी?

कुछ दिन पहले मैंने अमर चित्रकथा के सीइओ मानस मोहन की फेसबुक वाल पर पेरी महेश्वर का स्टेटस अपडेट पढ़ा था. इसमें उन्होंने लिखा कि उनको पिछले हफ्ते कुछ एमबीए और सीए कंडीडेट्स का इंटरव्यू करने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा. इनमें कई लोग थे ऐसे थे, जिनकी जानकारी के स्तर ने मुझे ही अवसाद में ला दिया.

न तो उनकी कोई तैयारी थी, न वे जागरूक थे और न ही उनका सामान्य ज्ञान ठीक था. वे फेसबुक के मेंढक थे. पेरी लिखते हैं कि हमारे पाठ्यक्रम, हमारे शिक्षक, हमारे स्कूल, ये सभी समाज की जरूरतों को पूरा करने के मामले में विफल हो रहे हैं. इसके लिए बहुत हद तक जिम्मेवारी हमारे नीति-निर्माताओं की ही है.

खैर, पेरी ने जिन लोगों का इंटरव्यू किया, उनके कुछ जवाब भी पोस्ट किये –

एक ने बताया कि वह मीडियॉकर कंपनी में काम करती है. (दरअसल, वह कहना चाहती थी कि वह मझोली यानी मिड साइज कंपनी में काम करती है.)

एक कंडीडेट ने कहा कि वह दुनिया भर की सूचनाओं के लिए फेसबुक पर निर्भर है.

किसी एमबीए कंडीडेट को यह पता नहीं था कि इस साल केंद्रीय बजट जुलाई में क्यों पेश किया गया!

किसी सीए कंडीडेट को इनकम टैक्स में हुए बदलाव के अलावा दूसरे टैक्स प्रावधानों की जानकारी नहीं थी.

उनमें से कोई न तो आर्थिक अखबार पढ़नेवाला था और न ही न्यूज चैनल देखनेवाला.

एक ने कहा कि न्यूज मीडिया पेड न्यूज देता है, जबकि सोशल मीडिया सही और विश्वनीय जानकारी देता है.

सोशल मीडिया पर चल रही जानकारियों का स्तर क्या है, यह समझने के लिए जरूरी है कि आप एक बार उन जानकारियों पर सवाल खड़ा करके देखिये. पिछले दिनों फेसबुक पर एक मैसेज बहुत तेजी से चला, जिसमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में पेट्रोल एवं डीजल की फुटकर कीमतें दी गयीं थीं और यह कहा गया था कि देखिये पाकिस्तान में पेट्रोल 21 रुपये लीटर मिलता है, जबकि अपने यहां उससे कई गुना ज्यादा कीमत पर.

मैंने उस मैसेज को अपनी फेसबुक वाल पर शेयर करके पूछा कि क्या पाकिस्तान से कोई फेसबुक मित्र बतायेगा कि वहां डीजल और पेट्रोल के भाव क्या हैं? इस पर एक कमेंट आया, जिसमें पाकिस्तान के एक अखबार का लिंक दिया हुआ था. इस लिंक पर जाकर देखा तो पता चला कि वहां पेट्रोल के भाव प्रति लीटर 120 पाकिस्तानी रुपये हैं. उस प्रोपेगैंडा पोस्ट को हजारों लोगों ने देखा होगा और विश्वास किया होगा.

मुझे आश्चर्य नहीं कि यह कॉलम पढ़ रहे आप लोगों में से कई लोग इसी बात को सच मानते हों कि भारत में पेट्रोल की कीमतें बहुत ज्यादा हैं और हमारे पड़ोसी देशों में बहुत कम.

पिछले दिनों एक फोटो सोशल मीडिया पर चला, जिसमें गांधी जी एक यूरोपीय युवती की ओर बहुत ध्यान से देख रहे हैं. पता करने पर मालूम हुआ कि गांधी-नेहरू की प्रसिद्ध फोटो में नेहरू की जगह युवती का फोटो फिट करके सोशल मीडिया पर चला दिया गया. दिक्कत यह नहीं है कि सोशल मीडिया पर कुछ लोग भ्रम फैला रहे हैं, दिक्कत यह है कि ढेर सारे लोग इस झूठ को ही सच मान कर चल रहे हैं.

यदि आपने उनका विरोध करने की कोशिश की, तो ये ढेर सारे लोग आपको न जाने क्या-क्या करार दे देंगे.

जिस कॉमन स्पेस की बात मैंने शुरुआत में की है, उस स्पेस को लोकतंत्र में लोग तय करते हैं. इसके सिकुड़ने का मतलब है आपसी विश्वास और संवाद का सिकुड़ना. प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इसी स्पेस में फलती-फूलती है और इसी स्पेस में लोकतंत्र भी बढ़ता-मजबूत होता है.

लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव नहीं है. लोकतंत्र का मतलब है लोगों की राय और मत को सम्मान देने का तरीका और सलीका. कोई जरूरी नहीं कि सरकार ही इस स्पेस को सीमित करे तभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में आये, दूसरे कारक भी जिम्मेवार हो सकते हैं इस प्रक्रिया के लिए. लेकिन लोकतांत्रिक मूल्य, लोकतांत्रिक समाजशैली, लोकतांत्रिक जीवनशैली अपनी जड़ें गहरी कर सके, इसके लिए तो प्रयास सरकार और समाज यानी दोनों के स्तर पर करने ही होंगे.

..और अंत में.

सोशल मीडिया की बात चल रही है तो अंत में सोशल मीडिया से ही एक टिप्पणी. पढ़िये यह ट्विट- ‘यदि पाकिस्तान इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में भ्रामक तथ्य दे सकता है, तो भारत को ऐसा करने से किसने रोका है? हम उनसे किसी बात में कम तो हैं नहीं. वास्तव में तो हम उनसे हर मामले में आगे हैं.’

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