‘मम्मी’ न हुई गूगल सर्च इंजन हो गयी

Published at :30 Jul 2014 4:07 AM (IST)
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‘मम्मी’ न हुई गूगल सर्च इंजन हो गयी

।। बृजेंद्र दुबे ।। प्रभात खबर, रांची बेटी होना सच में बहुत ही दुरूह है. जीवन के हर चरण में उन्हें परीक्षा देनी होती है. बचपन टोका-टोकी और थोपे गये परंपरागत संस्कारों के बीच बीतता है. घर के बड़े बुजुर्ग हमेशा यह याद दिलाते रहते हैं कि तुम लड़की हो, पराये घर जाना है.बेटी चाहे […]

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।। बृजेंद्र दुबे ।।

प्रभात खबर, रांची

बेटी होना सच में बहुत ही दुरूह है. जीवन के हर चरण में उन्हें परीक्षा देनी होती है. बचपन टोका-टोकी और थोपे गये परंपरागत संस्कारों के बीच बीतता है. घर के बड़े बुजुर्ग हमेशा यह याद दिलाते रहते हैं कि तुम लड़की हो, पराये घर जाना है.बेटी चाहे जितना भी पढ़-लिख जाये, लेकिन पूरे घर की नजर उस पर रहती है. वह क्या खा रही है, क्या पहन रही है और कहां जा रही है? इन सबका उसे खास ख्याल रखना होता है. इसके बाद जब शादी हो जाती है.. सास-ससुर, पति एवं परिवार की जिम्मेदारी आ जाती है. सबके सवालों का जवाब उसी के पास होता है.

जिसकी सेवा में कमी आये, वही मुंह फुला लेता है. अलादीन के जिन्न की तरह उसे सबकी फरमाइश पूरी करनी होती है. ससुर की चाय में देर हुई, तो सास की फटकार. पति का मोजा और रूमाल जगह पर नहीं मिले, तो ऑफिस जाते-जाते पति के ताने.. तुम्हारा तो काम में मन ही नहीं लगता.

आज कल तुम्हारा ध्यान कहीं और है. वही पत्नी जब मां बन जाती है, तो उसकी जिम्मेदारी दोहरी हो जाती है. पति के साथ बच्चों की एक-एक बात का ध्यान रखना पड़ता है, लेकिन करीब-करीब हर नारी इस दायित्व को हंसते-हंसते निभाती है. हां, कुछ अपवाद भी होते हैं. और वो होने भी चाहिए.

दिलचस्प बात ये है कि पति की उम्र बढ़ जाती है, बच्चे बड़े हो जाते हैं. लेकिन उस मां या पत्नी का सबकुछ यथावत रहता है. उसे बग्घी में बंधे घोड़े की तरह जुतना ही पड़ता है. मैं रोज अपने ही घर में देखता हूं.. खास कर बेटा जब कॉलेज जाने की तैयारी कर रहा होता है, तो मुङो लगता है कि उसकी मम्मी न हुई गूगल का सर्च इंजन है, जिससे आप किसी भी बात का उत्तर जान सकते हैं, मम्मी मेरा पेन कहां रखा है, मम्मी मेरे जूते नहीं मिल रहे हैं, मम्मी मैंने कहा था कि कॉलेज रोटी नहीं पराठा ले जाऊंगा.. दोस्त लोग हंसते हैं.

छोड़ दो मैं टिफिन ही नहीं ले जाऊंगा. अरे, ये क्या पानी की बोतल अभी खाली ही है. तुम तो हर बात भूल जाती हो. आदि-आदि. लेकिन मम्मी चुपचाप.. दौड़-दौड़ के एक के बाद एक फरमाइश पूरी करने में मशगूल रहती हैं. कहीं कोई शिकन नहीं. यही नहीं कॉलेज से लौट कर भी बेटा सवाल पर सवाल छोड़ता ही रहता है..

मम्मी इस शब्द का मतलब क्या है, मम्मी यह सवाल कैसे करें, मम्मी फलां जगह जाना है, तो कैसे जायें आदि-आदि. हर दिन मम्मी को ऐसे ही ना जाने कितने प्रश्नों का जवाब देना पड़ता है. यदि मम्मी किसी बात का जवाब ना जानती हों, तो वह किसी काम की नहीं. मम्मी को हर प्रश्न का उत्तर आना ही चाहिए.

कहते हैं की अगर कोई चीज घर मे गुम हो जाये, तो उसे केवल मम्मी ही ढूंढ़ सकती हैं. ‘तिस पर तुर्रा’, यह की मम्मी को ये सब तो पता होना ही चाहिए. आखिर सारा दिन घर पर करती क्या रहती है? मम्मी इतना सब सुन कर भी सबकी सेवा में खुश रहती है.. आखिर बचपन में दिये गये संस्कारों की उसे रक्षा जो करनी है.

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