जब मौन बोलता है
Updated at : 03 Sep 2019 7:45 AM (IST)
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मुकुल श्रीवास्तव टिप्पणीकार sri.mukul@gmail.com आपने कभी सन्नाटे की आवाज सुनी है क्या? सुनी तो जरूर होगी, पर समझ नहीं पाये होंगे. यूं तो अधिकता किसी भी चीज की बुरी होती है, पर लोग बिना बोले बहुत कुछ कह जाते हैं. वह गाना तो आपने भी सुना होगा न- बोले तुम न मैंने कुछ कहा… तो […]
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मुकुल श्रीवास्तव
टिप्पणीकार
sri.mukul@gmail.com
आपने कभी सन्नाटे की आवाज सुनी है क्या? सुनी तो जरूर होगी, पर समझ नहीं पाये होंगे. यूं तो अधिकता किसी भी चीज की बुरी होती है, पर लोग बिना बोले बहुत कुछ कह जाते हैं. वह गाना तो आपने भी सुना होगा न- बोले तुम न मैंने कुछ कहा… तो भैया, यह तो सिद्ध हुआ कि बगैर बोले भी बहुत कुछ कहा जा सकता है. मगर कैसे?
बोलने का काम सिर्फ जबान ही नहीं करती, बल्कि आंखों से लेकर पैर तक हमारे सभी अंग बोलते हैं. दुनिया के बहुत से अभिनेताओं की खासियत यही रही है कि वे अपनी आंखों से बहुत कुछ कह देते हैं.
प्रख्यात अभिनेता चार्ली चैपलिन को ही लें, जिन्होंने अपनी मूक फिल्मों ·के माध्यम से सालों तक लोगों का मनोरंजन किया. कई बार ज्यादा बोलने से शब्द अपना अर्थ खो देते हैं. अब ‘आई लव यू’ को ही लीजिये, फिल्मों में इस शब्द का इतना इस्तेमाल हुआ कि अब मैं रील लाइफ या रीयल लाइफ में यह शब्द सुनता हूं, तो हंसी आ जाती है. प्यार एक एहसास है, उसे एक शब्द में समेटा नहीं जा सकता. वैसे आजकल तो फीलिंग भी बल्ब जैसी हो गयी है, जो अचानक आती है और अचानक चली भी जाती है.
हम कुछ भी कहते हैं, तो उससे पहले सोचते हैं. यह बात अलग है कि यह प्रक्रिया इतना जल्दी होती है कि हमें पता ही नहीं पड़ता कि जो कुछ हम फटाफट बोले जा रहे हैं, वह पहले हमारा दिमाग सोच रहा है. उस सोच को शब्दों का लबादा ओढ़ा कर जब हम बोलते हैं, तो सुननेवाले पर असर होता है. लेकिन यह जरूरी भी नहीं कि हर फीलिंग को व्यक्त करने के लिए आपके पास शब्द हों ही. आप गुस्सा हैं, तो चीखकर आप गुस्सा निकाल सकते हैं. लेकिन आप खीजे हुए हैं, तो क्या बोलेंगे? तब आप जो बोलेंगे, उसका मतलब सामने वाला समझेगा भी कि नहीं, क्या पता! यहीं काम आता है मौन.
चुप्पी या सन्नाटा हमेशा कायरता नहीं होती है. यह तो भावनाओं की भाषा होती है, जो आप शब्दों से नहीं बोल सकते, वह आप अपने मौन से बोल सकते हैं.
वैसे भी पर्सनालिटी डेवलपमेंट के इस युग में हमें बोलना जरूर सिखाया जाता है, पर चुप रहना नहीं. वैसे भी जब मौन बोलता है, तो उसकी आवाज भले ही देर में सुनायी दे, पर बहुत दूर तक सुनायी देती है. हम जब बोर होते हैं, तो अपने आस-पास के शोर-शराबे से दूर भागने का मन करता है. किसी से भी आप बात नहीं करना चाहते. ऐसे में क्या आपने भी खुद को एकांत में रखा है?
अगर ऐसे समय में हम कहीं बिलकुल शांत जगह पर बैठ जायें, तो हम बिना ·कुछ कहे-सुने खुद से ही बातें करने लगते हैं और फिर अपने आप ही हमें हमारी समस्याओं का समाधान सूझने लगता है. प्यार-मुहब्बत के किस्सों में तो खामोशी से प्यार पैदा होने की बातें अक्सर होती रहती हैं.
एक बात साफ है कि हम बगैर बोले अपनी फीलिंग्स को व्यक्त कर सकते हैं. रिश्तों ·की गर्माहट तो खामोशियों ·के दौरान होनेवाले संचार से ही समझी जा सकती है. किसी ने क्या खूब कहा कि खामोशियां मुस्कुराने लगी… तन्हाइयां गुनगुनानी लगीं…!
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