दागी नेताओं पर शिकंजे की तैयारी

भारतीय राजनीति में अपराधी व भ्रष्ट तत्वों की मौजूदगी एक चिंताजनक सच्चाई है. इस पर अंकुश लगाने की कोशिश के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह व कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद को ऐसी रूपरेखा तैयार करने का निर्देश दिया है, जिसके तहत नेताओं के खिलाफ चल रहे मुकदमों का निपटारा […]
भारतीय राजनीति में अपराधी व भ्रष्ट तत्वों की मौजूदगी एक चिंताजनक सच्चाई है. इस पर अंकुश लगाने की कोशिश के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह व कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद को ऐसी रूपरेखा तैयार करने का निर्देश दिया है, जिसके तहत नेताओं के खिलाफ चल रहे मुकदमों का निपटारा एक वर्ष के भीतर किया जा सके.
चुनाव के दौरान मोदी ने ऐसा तंत्र स्थापित करने का वादा किया था. निश्चित रूप से प्रधानमंत्री का यह निर्देश स्वागतयोग्य है. इस वर्ष मार्च के महीने में विधि आयोग ने भी सर्वोच्च न्यायालय से यह सिफारिश की थी कि जिन मुकदमों में मौजूदा जन प्रतिनिधियों के विरुद्ध आरोप निर्धारित हो चुके हैं, उनकी सुनवाई एक वर्ष के भीतर पूरी हो जानी चाहिए.
न्यायालय पहले ही यह आदेश दे चुका है कि निचली अदालतों से सजायाफ्ता सांसदों व विधायकों की सदस्यता तुरंत प्रभाव से रद्द हो जायेगी. राजनेताओं के धन व आचरण का आकलन करनेवाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के अनुसार, मौजूदा लोकसभा के 185 सदस्यों के विरुद्ध आपराधिक आरोप हैं.
इनमें 112 सांसद ऐसे हैं, जिनके विरुद्ध हत्या, हत्या का प्रयास, महिलाओं के खिलाफ अपराध, अपहरण और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने जैसे गंभीर अपराधों के मामले दर्ज हैं. लोकसभा में 281 सदस्यों वाली सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के 97 सदस्य आपराधिक कृत्यों के आरोपी हैं, जिनमें 61 के विरुद्ध गंभीर आरोप हैं.
राज्यसभा और राज्यों की विधानसभाओं व विधान परिषदों में भी दागियों की बड़ी संख्या है. हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था अनेक कारणों से मामलों की सुनवाई में आम तौर पर देरी करती है, लेकिन राजनेता व अन्य प्रभावशाली लोग अपने रसूख का बेजा इस्तेमाल कर इस देरी को और भी लंबा कर लेते हैं तथा सुनवाई की प्रक्रिया को टालते रहते हैं.
इसका खामियाजा लोकतांत्रिक संस्थाओं व जनता को भुगतना पड़ता है. अगर मोदी सरकार इस मसले पर गंभीरता दिखाती है, तो यह राजनीति के अपराधीकरण पर लगाम लगाने की दिशा में बड़ी पहल होगी. इसके लिए सरकार में दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का होना अनिवार्य है और न्यायालयों को भी सक्रियता बरतनी होगी.
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