अवाम की निगाह में बिन गुठली के आम

Published at :26 Jul 2014 6:15 AM (IST)
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अवाम की निगाह में बिन गुठली के आम

कुछ दिनों पहले खबर आयी थी कि भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने आम की एक ऐसी प्रजाति विकसित की है, जिसमें गुठली नहीं होगी. सिर्फ आम ही आम होगा. यानी अब आम खाते वक्त गुठलियों की फिक्र नहीं करनी होगी.आम को छील कर सीधे मुंह में डालेंगे और उसके मधुर, रसीले स्वाद का आनंद लेंगे. इस […]

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कुछ दिनों पहले खबर आयी थी कि भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने आम की एक ऐसी प्रजाति विकसित की है, जिसमें गुठली नहीं होगी. सिर्फ आम ही आम होगा. यानी अब आम खाते वक्त गुठलियों की फिक्र नहीं करनी होगी.आम को छील कर सीधे मुंह में डालेंगे और उसके मधुर, रसीले स्वाद का आनंद लेंगे.

इस खबर को पढ़ कर सचमुच मुझे अच्छा लगा और जी में आया कि भारतीय कृषि वैज्ञानिकों को उनकी इस उपलब्धि के लिए धन्यवाद दूं. मगर हुआ यह कि इस खबर के बारे में मैंने अपने जिस-जिस मित्र को जानकारी दी, किसी ने मेरी तरह खुशी जाहिर नहीं की. एक मित्र ने कहा, ‘‘आयं. ऐसा कैसे हो सकता है?

आम में गुठली नहीं होगी तो आम के पेड़ कैसे उगेंगे?’’ मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि भाई, आजकल गुठलियों से आम के पेड़ उगाता ही कौन है, आम के पेड़ तो नर्सरी में बिकते हैं, खरीदिए और लगा लीजिए. मगर मित्र माने नहीं. कहा, ‘‘यह तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों की साजिश है. वे चाहते हैं कि लोगबाग गुठलियों से आम उगा ही न सकें और आम के पेड़ के लिए कंपनियों पर आश्रित हो जायें.’’

दूसरे मित्र ने कहा, ‘‘ऐसा हो ही नहीं सकता. अगर तुम्हें यह खबर फेसबुक से मिली है तो इसे सौ फीसदी झूठ मानो. बिना गुठली का आम कैसे हो सकता है?’’ यह सच है कि मुझे खबर फेसबुक से ही मिली.

मगर खबर का स्रोत कृषि शोध संस्थान की वेबसाइट था और उसे देश के जाने-माने कृषि वैज्ञानिक ने साझा किया था. खैर.. एक अन्य मित्र ने कहा, ‘‘मैं तो बिना गुठली के आम खाने की सोच ही नहीं सकता. गुठली से ही तो आम का बैलेंस बनता है. वरना आम मुंह में लो और सीधे गले के अंदर. ऐसे में आम का स्वाद ही नहीं आयेगा. गुठली रहती है तो आम खाने में वक्त लगता है.

आम का स्वाद धीरे-धीरे मुंह में घुलता है. फिर आम खत्म होने पर भी गुठलियों को चूसने का जो आनंद है, उसकी आप किसी और चीज से तुलना ही नहीं कर सकते. इसलिए बिना गुठली के आम की परिकल्पना ही गलत है. वैज्ञानिकों के पास भी कोई काम नहीं बचा. फालतू के प्रयोग करते रहते हैं. बिना गुठली का आम, बिना हड्डी का चिकेन और हरे रंग की गोभी.’’

मित्र की बात मुझे थोड़ी ठीक लगी, मगर सोचा एक और मित्र से पूछ लूं. उन्होंने बिल्कुल अलग तरीके से इस खबर का विरोध किया. उसने कहा, ‘‘आविष्कार तो ठीक है.. मगर टाइमिंग देखो. अब जब आम का सीजन बीत रहा है, लगभग समाप्ति पर है तब बिना गुठली का आम बना रहे हैं.

पहले बनाते तो हम चख कर भी देखते. अभी तो उस आविष्कार को दिल्ली से पटना आने में ही महीना गुजर जायेगा और सीजन बीत जायेगा. ये लोग ऐसी ही गड़बड़ियां करते हैं.’’ तमाम मित्रों के जवाब सुन कर मेरे ज्ञानचक्षु खुल गये. अब मैं देश के आम लोगों की सोच में आये इस नये बदलाव के बारे में सोच रहा हूं.

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