भारतीय विदेश मंत्री की नेपाल यात्रा

Published at :26 Jul 2014 5:11 AM (IST)
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भारतीय विदेश मंत्री की नेपाल यात्रा

।। पुष्परंजन ।। ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक यूरोपीय दूत, नेपाली मीडिया और वहां के कुछ नेताओं को डर है कि भाजपा और विहिप नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए सक्रिय न हो जायें. इसलिए भूतपूर्व नरेश ज्ञानेंद्र, और उनके समर्थक दलों से दिल्ली की सत्ता दूरी बनाये हुए है. नेपाल […]

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।। पुष्परंजन ।।

ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक

यूरोपीय दूत, नेपाली मीडिया और वहां के कुछ नेताओं को डर है कि भाजपा और विहिप नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए सक्रिय न हो जायें. इसलिए भूतपूर्व नरेश ज्ञानेंद्र, और उनके समर्थक दलों से दिल्ली की सत्ता दूरी बनाये हुए है.

नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला फेफड़े में कैंसर के इलाज के बाद मंगलवार 22 जुलाई को अमेरिका से लौट आये हैं. तय यही हुआ था कि सुशील कोइराला के न्यूयॉर्क से आने के दो दिन बाद, भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज 25 से 27 जुलाई, 2014 को काठमांडो जायेंगी. कोइराला 16 जून को न्यूयॉर्क के मेमोरियल स्लोअन केटेरिंग कैंसर सेंटर में इलाज के लिए गये थे.

अस्वस्थ होने के बावजूद, प्रधानमंत्री सुशील कोइराला, चीन के यून्नान प्रांत की राजधानी कनमिंग में 6 से 10 जून को संपन्न ‘सेकेंड चाइना साउथ एशिया एक्सपो‘ के लिए प्रस्थान कर गये थे. कोइराला के कनमिंग जाने के पीछे यही कहा गया कि वे भारत-चीन के बीच रिश्तों में संतुलन बनाने के वास्ते गये थे.

लेकिन क्या चीन, कोइराला द्वारा संतुलन बनाने की कोशिश को सफल होने देगा? सुषमा की यात्रा से एक दिन पहले चीन ने घोषणा की कि 2020 तक ल्हासा से लुंबिनी तक उसकी रेल दौड़ने लगेगी, और चार साल में चीन की यह रेल भूटान सीमा के पार भी दिखेगी.

नेपाली ‘राष्ट्रवादी’ चीन की रेल के लिए ‘रेड कारपेट’ बिछा चुके हैं. उन्हें इससे नेपाल की संप्रभुता को कोई खतरा नजर नहीं आता, न ही उसके पर्यावरण, पहाड़ को कोई नुकसान होनेवाला है. 2012 में चीन की ‘थ्री गॉर्ज इंटरनेशनल कार्प’ नामक ऊर्जा कंपनी को पश्चिमी सेती नदी पर 750 मेगावॉट की जल विद्युत परियोजना का ठेका मिला. 1.6 अरब डॉलर की यह परियोजना 2019 में पूरी होगी.

इसे लेकर नेपाल में कोई हो-हल्ला नहीं मचा. नेपाल को संवारने से पहले मोदी जी को चाहिए कि नेपाल से लगे बिहार, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बंगाल और सिक्किम में इंफ्रास्ट्रर मजबूत करें. चीन से टक्कर लेना है, तो इन पांचों प्रदेशों को हर दृष्टि से ‘हाइ टेक’ बनाना होगा. शोर बरपा है कि नेपाल 40 हजार मेगावॉट विद्युत पैदा कर सकता है. पर जमीनी सच्चाई यह है कि नेपाल 20 छोटी-बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं से मात्र छह सौ मेगावॉट बिजली पैदा कर रहा है.

नेपाल के कई नगरों में 12 से 18 घंटे बल्ब नहीं जलते. नेपाल बिजली क्या बेचे, बल्कि मार्च 2012 तक वह भारत से 134 मेगावॉट बिजली खरीद रहा था, उसे डेढ़ सौ मेगावाट तक बढ़ाने का आग्रह नेपाल विद्युत प्राधिकरण के अधिकारी तभी कर चुके थे. नेपाल में इस समय 900 मेगावॉट बिजली की कमी हो रही है. इतने की पूर्ति हो जाये, तभी वह अतिरिक्त विद्युत बेचने की हालत में होगा.

लेकिन क्या नेपाल इसकी गारंटी देने की हालत में है कि भारत की किसी भी परियोजना के खिलाफ वहां के प्रतिक्रियावादी झंडा और डंडा नहीं उठायेंगे. माओवादी हिंसा के दौरान सबसे अधिक भारतीय परियोजनाओं को क्षति पहुंचायी गयी थी. फरवरी, 1996 में भारत-नेपाल के बीच महाकाली संधि हुई थी.

इसे पंचेश्वर बहुउद्देश्यीय परियोजना के नाम से भी लोग जानते हैं. पंचेश्वर परियोजना से 5,600 मेगावॉट बिजली पैदा करनी थी, और 17,818 वर्ग किलोमीटर भूमि की सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराना था. लेकिन नेपाल की अंदरूनी राजनीति ने इस परियोजना का बेड़ा गर्क कर दिया. 120 मेगावॉट के टनकपुर हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट का प्रतिरोध इस तरह से हुआ, जैसे भारत, नेपाल की जमीन हथिया रहा हो. आज टनकपुर परियोजना से नेपाल को ही फायदा मिल रहा है.

इस समय नेपाल के 75 जिलों में भारत की 450 छोटी-बड़ी परियोजनाएं चल रही हैं. लेकिन इन परियोजनाओं को ठप करने के लिए तथाकथित राष्ट्रवादी गाहे-ब-गाहे पंगेबाजी करते हैं. भारत में 60 लाख नेपाली काम कर रहे हैं, कोई तीन हजार नेपाली विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति दी जा रही है. लेकिन इसका कोई अहसान नहीं है. नेपाल की आर्थिक हालत इतनी खराब है कि नवंबर, 2014 में 18वें दक्षेस शिखर बैठक के आयोजन के लिए उसके पास पैसा नहीं है.

चीन ने ‘सार्क समिट’ के लिए पैसा देने की पेशकश की थी, लेकिन ‘ब्रिक्स’ में भारत से बगलगीर इस ‘नये दोस्त’ की नीयत को नेपाल में समझा जा सकता है. संकेत यही है कि इस बार काठमांडो दक्षेस शिखर सम्मेलन के लिए खर्च भारत उठायेगा.

23 साल बाद, भारत-नेपाल के विदेश मंत्री संयुक्त आयोग की बैठक कर रहे हैं. यह कोई सराहनेवाली बात नहीं है.

यह बैठक कम से कम हर दो साल पर होनी चाहिए थी. संयुक्त आयोग की बैठक में जल संसाधन, ऊर्जा सहयोग, व्यापार एवं पारेषण, सीमा प्रबंधन और सुरक्षा जैसे पांच अहम विषयों पर बातचीत होगी. 17 साल पहले इंद्र कुमार गुजराल बतौर प्रधानमंत्री नेपाल गये थे. 2014 में नरेंद्र मोदी का दो बार नेपाल जाना होगा. इसे लेकर माओवादियों के दोनों धड़ों से बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आ रही है. नेकपा माओवादी के नेता मोहन वैद्य किरण, मोदी के अभ्युदय को नेपाल के लिए खतरनाक मानते हैं.

राष्ट्रीय जनमोर्चा के चित्र बहादुर केसी कहते हैं कि पहले भी भारत, समझौते के नाम पर नेपाली नदियों पर एकाधिकार जमा चुका है. इसलिए ‘इंडियन ट्रिक’ से हमें सावधान रहना चाहिए. नेपाली जल संसाधन के जानकार रत्न संसार श्रेष्ठ को शक है कि ऊर्जा समझौते के नाम पर नेपाल की 600 नदियों का ‘सिक्किमीकरण’ न हो जाये. मधेसी जन अधिकार फोरम मधेस के अध्यक्ष प्रोफेसर भाग्यनाथ प्रसाद गुप्ता कहते हैं कि नेपाल की पनबिजली परियोजनाओं को भारत को देने में ही इस देश की भलाई है.

पर प्रश्न यह है कि तीन माह पहले भेजे जल विद्युत प्रस्ताव को इतना प्रच्छन्न क्यों रखा गया? उसे लेकर भ्रम की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है. मोदी का भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे पड़ोसियों को साथ लेकर ‘साझा पावरग्रिड’ बनाने की योजना साकार करे, इसका समय आ गया है.

मगर, नेपाल में बढ़ते ‘मोदीफोबिया’ को रोकने में हमारा दूतावास असहाय क्यों है? मोदी जी के लिए पशुपतिनाथ मंदिर को चमकाया जा रहा है. शिवसेना नेपाल, विश्व हिंदू महासंघ, हिंदू स्वयं सेवक संघ जैसे संगठनों का रक्तचाप बढ़ा हुआ है. यूरोपीय दूत, नेपाली मीडिया और वहां के कुछ नेताओं को डर है कि भाजपा और विहिप इस देश को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए सक्रिय न हो जायें.

शायद इसलिए भूतपूर्व नरेश ज्ञानेंद्र, और उनके समर्थक दलों से दिल्ली का सत्ता प्रतिष्ठान दूरी बनाये हुए है. यूरोपीय संसद में स्पेन के एक सदस्य इजास्कुन बरांडिका ने गुरुवार को कहा कि मोदी के कारण दक्षिण एशिया के अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं. क्या ऐसे बयानों से भारत को उसके पड़ोसी शक की नजर से नहीं देखेंगे, क्या उसकी ऊर्जा कूटनीति को क्षति नहीं पहुंचेगी?

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