लफंगों ने किया सांसदों जैसा काम!

Published at :24 Jul 2014 5:29 AM (IST)
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लफंगों ने किया सांसदों जैसा काम!

।। रजनीश आनंद ।। प्रभात खबर.कॉम सावन का महीना और उस पर रिमङिाम बारिश. मेरा मन पकौड़े खाने को मचल उठा. सो ऑफिस से घर के लिए जल्दी-जल्दी निकली. तभी ध्यान आया कि घर में बेसन खत्म हो चुका है. मैंने सोचा कि ऑटो से उतर कर बेसन ले लूंगी. तभी ख्याल आया कि क्यों […]

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।। रजनीश आनंद ।।

प्रभात खबर.कॉम

सावन का महीना और उस पर रिमङिाम बारिश. मेरा मन पकौड़े खाने को मचल उठा. सो ऑफिस से घर के लिए जल्दी-जल्दी निकली. तभी ध्यान आया कि घर में बेसन खत्म हो चुका है. मैंने सोचा कि ऑटो से उतर कर बेसन ले लूंगी.

तभी ख्याल आया कि क्यों न अपने मित्र शर्माजी को बुला लिया जाये. मैंने उन्हें फोन किया. लेकिन जब मैंने शर्माजी को पकौड़ों का निमंत्रण दिया, तो उसे सहर्ष स्वीकारने की बजाय उन्होंने मना कर दिया. मैं भौंचक रह गयी. शर्माजी मेरा निमंत्रण ठुकरा देंगे, ऐसी मुझे उम्मीद नहीं थी.

मैं उनसे कारण पूछती, इससे पहले उन्होंने फोन काट दिया. पकौड़ों की ललक मेरे मन से काफूर हो गयी थी. मैं सोचने लगी कि आखिर बात क्या है? मेरी इच्छा हुई कि दोबारा से फोन करूं, लेकिन हिम्मत नहीं हुई. मैं यह समझ गयी थी कि कोई बड़ी बात है, अन्यथा शर्माजी मुझसे ऐसी बेरुखी नहीं दिखाते. मैंने फौरन यह निर्णय कर लिया कि मैं पहले शर्माजी के घर जाऊंगी. शर्माजी के दरवाजे पर मैंने दस्तक दी. दरवाजा उनकी पत्नी ने खोला, उनके चेहरे पर भी उदासी थी.

मैंने शर्माजी के बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि अंदर हैं. मैं सीधे शर्माजी के पास पहुंची, देखा कि वे चिंतित मुद्रा में बैठे हैं. मैंने उन्हें नमस्ते किया और पूछा, क्या हुआ शर्माजी? मेरे सहानुभूतिपूर्ण सवाल पर शर्माजी फफक उठे. मैं बिल्कुल घबरा गयी. उनकी पत्नी पानी लेकर लायीं. पानी पीकर शर्माजी थोड़ा संभले. तब उनकी पत्नी ने बताया, ‘‘कल इनके साथ कुछ अनहोनी हो गयी है. बेचारे शिवभक्त हैं और कुछ लोगों ने जबरदस्ती इनका व्रत भंग करवा दिया.’’

मैंने पूरी बात बताने के लिए शर्माजी से आग्रह किया. उन्होंने बताया कि आप तो जानती हैं कि मैं भोलेबाबा का भक्त हूं. हर बार की तरह ही मैंने सोमवारी का निजर्लाव्रत रखा था. मैं शिवजी को जल अर्पित कर मंदिर से निकल रहा था, तभी कुछ लफंगों ने जबरदस्ती मेरा व्रत भंग कर दिया.’’ ‘‘लेकिन कैसे?’’ ‘‘अरे वो लड़के वहां पर अपनी बड़ी सी नयी गाड़ी की पूजा करवा रहे थे. खुशी प्रदर्शित करते हुए वे मिठाइयां बांट रहे थे. मुझे भी उन्होंने प्रसाद दिया.

मैंने उनसे ले लिया. लेकिन, तभी उनमें से एक लड़के ने मुझसे कहा कि आप लड्डू खा लें. मैंने कहा मेरा व्रत है, मैं बाद में खा लूंगा. लेकिन वे नहीं माने और जबरदस्ती मेरे मुंह में लड्ड ठूंस दिया और उसे खाने के लिए मुझे बाध्य किया. मैंने लड्ड तो खा लिया, लेकिन मेरा व्रत टूट गया. मैं इस बात से बहुत दुखी हूं.

मुझे इस बात का दुख उतना नहीं है कि मेरा व्रत टूट गया, मुझे दुख ज्यादा इसका है कि क्या अब इस देश में मैं अपनी इच्छा से खा-पी भी नहीं सकता. लफंगेइतने हावी हो गये हैं कि एक आदमी अपनी इच्छा से कोई काम नहीं कर सकता.’’ शर्माजी का दुख देख कर मुझे उस लड़के के दुख का भी भान हो गया, जिसके मुंह में हमारे कुछ माननीय सांसदों ने रोजे के दौरान रोटी ठूंस दी थी.

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