अंगरेजी प्रभुत्व पर आत्ममंथन हो

Published at :24 Jul 2014 4:22 AM (IST)
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अंगरेजी प्रभुत्व पर आत्ममंथन हो

।। पवन के वर्मा ।। सांसद एवं पूर्व प्रशासक संघ लोक सेवा आयोग का काम एक प्रशासक के रूप में परीक्षार्थी की क्षमता का मूल्यांकन करना है. उसका काम अंगरेजी ज्ञान की थाह लगाना नहीं है. देश में कई राज्य हैं, जहां सारा सरकारी काम स्थानीय भाषा में ही होता है. मैंने पहले भी भारतीय […]

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।। पवन के वर्मा ।।

सांसद एवं पूर्व प्रशासक

संघ लोक सेवा आयोग का काम एक प्रशासक के रूप में परीक्षार्थी की क्षमता का मूल्यांकन करना है. उसका काम अंगरेजी ज्ञान की थाह लगाना नहीं है. देश में कई राज्य हैं, जहां सारा सरकारी काम स्थानीय भाषा में ही होता है.

मैंने पहले भी भारतीय भाषाओं के सवाल पर लिखा है, पर संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा लोक सेवा परीक्षा में संशोधन कर अंगरेजी के ज्ञान को परखनेवाले सवालों के अंक कम करने में कथित संकोच को देखते हुए मुझे इस विषय पर फिर से लिखना पड़ रहा है.

यूपीएससी के प्रति मेरा पूरा सम्मान है, पर अंगरेजी के प्रति उसके कथित पूर्वाग्रह का समर्थन करना कठिन है. जब 1975 में मैंने लोक सेवा की परीक्षा दी थी, तब परीक्षार्थी सिर्फ अंगरेजी में ही अपना जवाब लिख सकते थे. इससे अंगरेजी माध्यम से पढ़े परीक्षार्थियों को गैर-अंगरेजी माध्यम के लोगों की तुलना में अनुचित लाभ मिलता था. आश्चर्य नहीं कि भारतीय विदेश सेवा में मेरे बैच के लगभग आधे लोग सेंट स्टीफेंस कॉलेज से ही थे.

तब से इसमें कई सुधार किये गये हैं, ताकि उन लोगों को भी इन सेवाओं में आने का समान अवसर प्राप्त हो सके, जिनकी प्रतिभा व कौशल में कोई कमी नहीं है, पर उनका अंगरेजी का ज्ञान थोड़ा कम है.

लोक सेवा आयोग के भवन में बैठे लोगों को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा 1921 में कही गयी बात को याद करना चाहिए- ‘यह मेरा सुविचारित मत है कि अंगरेजी शिक्षा ने अंगरेजी-शिक्षित भारतीयों को अशक्त बना दिया है और इसने भारतीय छात्रों की ऊर्जा को दमित किया है. क्षेत्रीय भाषाओं को हटाने की प्रक्रिया ब्रिटिश दौर का सबसे दुखद अध्याय है.

कोई देश अनुवादकों की जाति पैदा कर राष्ट्र नहीं बन सकता है. भारत में व्याप्त अंधविश्वासों में सबसे बड़ा अंधविश्वास यह भी है कि अंगरेजी भाषा का ज्ञान स्वतंत्रता व विचार की सटीकता के लिए जरूरी है. अंगरेजी माध्यम में दी जानेवाली शिक्षा भ्रम की पैदाइश है, क्योंकि अंगरेजी शासकों को सही में ऐसा लगा कि पारंपरिक व्यवस्था बेकार व अनुपयोगी है. यह पाप से बनाया गया है, क्योंकि इसका उद्देश्य भारतीय शरीर, मस्तिष्क व आत्मा को बौना बनाना है.’

आजादी से कुछ वर्ष पूर्व 1944 में उन्होंने इसी बात को भविष्य पर पड़नेवाले इसके कुप्रभावों के संदर्भ में कहा था- ‘मातृभाषा पर अंगरेजी भाषा को तरजीह देने के हमारे प्रेम ने शिक्षित व राजनीतिक-सोच रखनेवाले वर्गो तथा आम जनता के बीच गहरी खाई पैदा कर दी है. जब हम दुरूह विचारों को मातृभाषा में व्यक्त करने की कोशिश करते हैं, तो गलतियां होती हैं. इसके परिणाम बड़े भयावह हुए हैं. इसकी महान भाषाओं की अवहेलना से हुए भारत के नुकसान का आकलन हम अपने निकट भविष्य में नहीं कर सकेंगे.’ महत्वपूर्ण है कि जवाहरलाल नेहरू, जिनकी पहली भाषा अंगरेजी थी और जो अपनी इच्छा के विरुद्ध शायद अंगरेजी-भाषी अभिजन के संरक्षक बन गये थे, के विचार भी बड़े दृढ़ थे- ‘कुछ लोगों की कल्पना है कि अंगरेजी भारत की आम भाषा बन जायेगी. यह गिने-चुने उच्चवर्गीय बौद्धिक समूह के अलावा एक कपोल-कल्पना ही है. सामूहिक शिक्षा व संस्कृति से इसका कोई संबंध नहीं है. अगर हम दुनिया के प्रति एक संतुलित दृष्टि रखना चाहते हैं, तो हमें स्वयं को अंगरेजी की चकाचौंध तक सीमित नहीं रखना चाहिए.’

हकीकत यह है कि अंगरेजी सामाजिक बहिष्कार की भाषा बन चुकी है. भारतीय मध्यवर्ग का ऊपरी तबका इस नस्लभेद का अगुवा है. शेष भारत इसका पीड़ित और आकांक्षी है. सही ढंग, उच्चारण व प्रवाह के साथ अंगरेजी बोलना प्रभुत्वशाली अभिजात्य के चमकते वृत्त में शामिल होने की अनिवार्य शर्त बन गयी है. राम मनोहर लोहिया ने एक बार कहा था कि प्रभु वर्ग में शामिल होने के लिए तीन चीजें होनी अनिवार्य हैं- ऊंची जाति, धन और अंगरेजी का ज्ञान. इसी तंत्र को तोड़ने के लिए कर्पूरी ठाकुर ने योग्य छात्रों को अंगरेजी में असफल होने के बावजूद अगली कक्षा में जाने की अनुमति दी थी.

यह समझना जरूरी है कि यह अंगरेजी के विरुद्ध विषवमन नहीं है. ऐतिहासिक कारणों से अंगरेजी वैश्विक दुनिया से संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बन गयी है. भाषा के रूप में इसकी अपनी सुंदरता और कुशलता है. भाषाएं सांस्कृतिक प्रभुत्व की दोषी नहीं होतीं, उनका उपयोग दोषी होता है. भारतीयों को एक जन-समूह, समाज और राष्ट्र के रूप में अंगरेजी के थोपे जाने पर आत्ममंथन की जरूरत है. लोक सेवा आयोग का काम परीक्षार्थी के प्रशासक के रूप में क्षमता का मूल्यांकन करना है. उसका काम अंगरेजी ज्ञान की थाह लगाना नहीं है. देश में कई राज्य हैं, जहां सारा सरकारी काम स्थानीय भाषा में होता है. उदाहरण के लिए, बिहार में सभी प्रशासनिक कार्य हिंदी भाषा में किये जाते हैं. लोक सेवा के लिए चयनित व्यक्ति को आवंटित किये गये राज्य की स्थानीय भाषा सीखनी पड़ती है. इसलिए संघ लोक सेवा आयोग को सभी परीक्षार्थियों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना चाहिए, ताकि वे अपनी क्षमता का सही प्रदर्शन कर सकें.

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