निजी स्कूलों की मनमानी पर चुप्पी क्यों?

हर साल अप्रैल-मई के महीने में अखबारों में निजी स्कूलों में किताब-कॉपी के नाम पर अभिभावकों से अधिक शुल्क वसूलने की खबरें छपती हैं. यही नहीं, स्कूल प्रशासन बच्चों की पेाशाक, उनके जूते-बैग इत्यादि पर भी भारी कमीशन खाते हैं. आम तौर पर ऐसे स्कूलों में छात्रों और उनके अभिभावकों को एक तय दुकान से […]
हर साल अप्रैल-मई के महीने में अखबारों में निजी स्कूलों में किताब-कॉपी के नाम पर अभिभावकों से अधिक शुल्क वसूलने की खबरें छपती हैं. यही नहीं, स्कूल प्रशासन बच्चों की पेाशाक, उनके जूते-बैग इत्यादि पर भी भारी कमीशन खाते हैं. आम तौर पर ऐसे स्कूलों में छात्रों और उनके अभिभावकों को एक तय दुकान से कपड़े, बैग, किताब-कॉपियां खरीदने की बात कही जाती है.
इन दुकानों की स्कूल के साथ कमीशन की सेटिंग रहती है. और जो सामान बाजार में सौ रुपये में मिल रहा होता है, उसे वे दो सौ रुपये का बेचते हैं. इस खेल में फायदा तो स्कूलवालों और दुकानदारों का तो पूरा होता है, लेकिन पिसते हैं अभिभावक और छात्र. लेकिन सवाल यह है कि जब इससे जुड़ी खबरें हर साल छपती हैं तो कोई इन स्कूलों की मनमानी पर लगाम क्यों नहीं लगाता है?
धीरज अग्रवाल, बोकारो स्टील सिटी
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